बच्चों के मोहित करने वाली 8 छोटी प्रेरणादायक कहानियाँ हिंदी में

📅 Published on June 25, 2026
🔄 Updated on June 21, 2026
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बच्चों को प्रेरणादायक कहानियाँ सुनाने का प्रमुख उद्देश्य बच्चों के अंदर के आत्मविश्वास को जगाना होता हैं। हिन्दी कहानियाँ जोकि बच्चों को आसानी से समझ में आ जाती हैं। इसलिए हम बच्चों के मानसिक विकास के लिए उन्हें छोटी प्रेरणादायक कहानियाँ हिन्दी में सुना सकते हैं। जिससे बच्चे के अंदर जज्बा पैदा हो सके। तो चलिए आज की जबरदस्त मोटिवेशनल कहानियाँ देखते हैं। जोकि निम्न प्रकार से लिखित हैं:

1. राजा और सेवक की कहानी:

एक बार की बात हैं राजा का सेवक बूढ़ा हो चुका था। उसने अपने मंत्री को आदेश दिया कि कोई दूसरा सेवक खोजा जाए। राजा के मंत्री ने पूरे राज्य में फरमान जारी करवा दिया कि उन्हें राजा के सेवक की जरूरत हैं। जो भी सेवक बनेगा उसे अधिक धनराशि मिलेगी। राजा के दरबार में कई लोग सेवक बनाने के लिए आए लेकिन मंत्री को कोई सेवक पसंद नहीं आया।

एक दिन एक व्यक्ति राजा के दरबार में आया। जिसका रंग रूप अच्छा नहीं था। उसने मंत्री जी से राजा का सेवक बनाने का प्रस्ताव दिया। मंत्री ने उसकी कई परीक्षाएं ली। वह व्यक्ति मंत्री के सभी वसूलो पर खरा उतरा। मंत्री ने उस व्यक्ति से कहा, “आज से तुम राजा के सेवक हो।” लेकिन राजा को अपने सेवक का रूप, रंग देखकर बिल्कुल पसंद नहीं आया।

गर्मी का मौसम था अगले दिन दरबार में राजा ने पानी मंगाया। सेवक ने राजा को सोने के पात्र में पीने का पानी दिया। राजा ने जैसे ही पानी का एक घूंट पिया उसने पानी को थूक दिया। उसने अपने सेवक को कहा इस गर्मी में इतना गर्म पानी। राजा का मंत्री सब देख रहा था। उसने सेवक को मिट्टी के घड़े से पानी लाने के लिए कहा, “राजा ठंडा पानी पी कर तृप्त हो उठा।”

मंत्री राजा के पास गया। उसने कहा, “महाराज! सोने के पात्र सुंदर, मूल्यवान और अच्छा भी हैं। लेकिन इसके अंदर शीतलता प्रदान करने के गुण नहीं हैं। ठीक इसी प्रकार, मिट्टी का बर्तन साधारण हैं। लेकिन उसके अंदर शीतलता प्रदान करने के गुण हैं। मंत्री ने राजा से कहा, “महराज! इसी तरह से हमें रूप, रंग के चक्कर में न पड़कर उसके अंदर के गुणों के बारें में जानना चाहिए। मंत्री की बात सुनकर राजा का ऐहसास हुआ कि उसकी सोच गलत थी।

कहानी से सीख:

बाहरी गुणों को न देखकर आंतरिक गुणों को देखना चाहिए।

2. अंधा और राजा की कहानी:

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एक बार राजा रंजीत सिंह अपने मंत्रियों और सिपाहियों के साथ जंगल में शिकार करने निकलने थे। शिकार खेलकर राजा वापस महल को जा रहे थे। राजा को जोरों की प्यास लगी। रास्ते में एक झोपड़ी दिखाई दी। झोपड़ी में एक अंधा व्यक्ति रहता था। राजा ने झोपड़ी से एक लोटा पानी लाने के लिए अपने सिपाही को भेजा।

सिपाही ने झोपड़ी में पहुंचकर अंधे व्यक्ति से कहा, “ओ अंधे! एक लोटा पीने के लिए पानी देना।” अंधे ने कहा, “जा…जा तू सिपाही होगा अपने घर का, तेरे जैसे लोग को एक बूंद पानी न दूँ। सिपाही खाली हाथ वापस राजा के पास लौट आया। राजा ने अपने मंत्री को पानी लेने के लिए झोपड़ी में भेजा। मंत्री झोपड़ी में पहुंचकर बोला, काना महाराज! क्या मुझे एक लोटा पानी मिलेगा?

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अंधे ने कहा, “क्षमा करे! मंत्री जी मैं आपको पानी नहीं पीला सकता। कहीं और पानी का जतन करने की कोशिश करें। झोपड़ी से मंत्री भी खाली हाथ वापस चले आए। राजा खुद झोपड़ी में पहुँचे, उन्होंने अपने दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा, “महात्मन! क्या मुझ जैसे तुच्छ प्राणी को एक लोटा पीने का जल मिल जाएगा।” प्यास के कारण मेरे कंठ सूखे जा रहे हैं। मुझ पर आपका बहुत बड़ा ऐहसान होगा।

राजा की बातों को सुनकर अंधे व्यक्ति ने राजा से कहा, “हे राजन! आपके लिए मेरा सर्वश निछावर हैं।” उसने राजा को एक लोटा जल पिलाकर कहा, “महाराज! मेरे लिए कोई और सेवा हो तो बताए।” राजा ने कहा, आप मेरे सिपाही और मंत्री को कैसे पहचान गए? अंधे व्यक्ति ने कहा, वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति की वास्तविकता का पता चल जाता हैं।

कहानी से सीख:

इंसान का परिचय उसकी भाषा करवा देती हैं।

3. सच्चा दोस्त कैसे बने:

एक रात किसी धर्मशाला में कई लोग ठहरे हुए थे। उनमें एक भला और सुलझे दिमाग का आदमी भी था। उसने अपनी रोचक बातों से सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। फिर उसने एक सवाल किया, “यहाँ कोई ऐसा है जिसका कोई सच्चा दोस्त हो?” सवाल सुनकर वहाँ कुछ पल के लिए शांति छा गई।

फिर एक व्यक्ति ने कहा, “इस कलयुग में हनुमान की तरह सच्चा दोस्त कहाँ मिलता है।” आजकल के दोस्त तो मतलबी होते हैं। वहाँ बैठे सभी लोग उसके हाँ में हाँ मिला रहे थे। उसे व्यक्ति ने कहा, “फिर तो मैं खुशनसीब हूँ, छोटे बड़े मेरे कई सच्चे दोस्त हैं।” उसकी बात सुनकर सब चौंक उठे। उनमें से एक ने कहा, “आज के जमाने में जहाँ अधिकतर आदमी स्वार्थ से घिरे होते हैं। ऐसे में आपको कई सच्चे दोस्त कैसे मिल गए?

भले आदमी ने कहा, “इसमें कोई अचरज की बात नहीं है। आज भी सच्चे दोस्तों की कमी नहीं है।” हमारे पास सच्चे दोस्त पाने का सरल तरीका भी है। “क्या तरीका हैं पूछते हुए?” सभी उत्सुक हो उठे। उस भले आदमी ने कहा, हमें यह देखने की जरा भी जरूरत नहीं है कि जिसे हम दोस्त बनाना चाहते हैं, वह कैसा है?” हम जैसा दोस्त चाहते हैं, पहले हम स्वयं दूसरे को वैसा बनकर दिखाएं।

जब दूसरों का सच्चा दोस्त बनेंगे तो एक दिन हमारी अच्छाई बुरे व्यक्ति को जरूर प्रभावित करेगी और उसे सच्चा दोस्त बनने पर मजबूर कर देगी। बस थोड़े धैर्य की जरूरत है। साथ ही अपनी सच्चाई पर हमें भरोसा भी होना चाहिए। भले व्यक्ति ने आगे कहा, “याद रहे, स्वार्थी व्यक्ति को ही सच्चे और अच्छे दोस्त नहीं मिलते। वहाँ बैठे लोगों ने भले व्यक्ति के विचार से बहुत प्रभावित हुए।

कहानी से सीख:

जैसा आप चाहते हैं, पहले वैसे खुद को बनाए।

4. गुस्से का परिणाम:

बहुत समय पहले की बात हैं। श्रीनगर में ‘क्रोधीराम’ नाम का एक गुस्सैल व्यापारी रहता था। जिसे बात-बात में गुस्सा आ जाता था। उस व्यापारी से ग्राहक और उसके परिवार के सभी लोग बहुत डरते थे। अगर व्यापारी को उसके व्यापार में घाटा लग जाता था तो वह अपने गुस्से को अपने परिवार के लोगों के ऊपर निकालता था।

व्यापारी जब बोलना शुरू करता था तो वह किसी और की बातों को नहीं सुनता था। धीरे-धीरे अपने गुस्से के कारण वह बहुत चिड़चिड़ा हो जाता था। और वह अपने आसपास रखी चीजों को भी उठा-उठा कर फेंकने लगता था। एक दिन व्यापारी रात्रि का भोजन कर रहा था। खाने में उसे एक लंबा बाल मिला, जिससे वह बहुत क्रोधित हो गया।

उसने अपनी पत्नी को बुलाकर उसे कड़ी आवाज में समझाया कि यह तुम्हारी पहली और आखिरी गलती हैं। आगे से अगर मेरे खाने में एक भी बाल मिला तो मैं तुम्हें कड़ी से कड़ी सजा दूंगा और इस घर से बाहर निकाल दूंगा। उसकी पत्नी उससे दबी आवाज में कहती हैं- “आगे से ऐसी गलती नहीं होगी, कृपया मुझे माँफ कर दें।” क्रोधीराम की पत्नी ने फिर से उसे दूसरी थाली में भोजन लाकर दिया।

कुछ दिन बाद एक बार क्रोधीराम की पत्नी उसे खाना परोस कर, कुछ समान लाने रसोई में चली गई। क्रोधीराम अचानक देखता हैं कि उसके खाने में बाल पड़ा हुआ हैं। वह गुस्से से लाल-पीला होकर चिल्लाते हुए उठता हैं और उसे सजा देने के लिए उसको गंजी करवाना चाहता हैं। जिसके लिए वह गाँव के नाई को बुलाने के लिए चला गया।

उसकी पत्नी ने सोचा अगर आज मैंने हिम्मत से काम नहीं लिया तो अनर्थ हो जाएगा। क्रोधीराम की पत्नी ने इस घटना की खबर अपने भाइयों तक पहुँचवा दी। जब तक क्रोधीराम नाई को लेकर आता, उसके भाइयों ने उसे बचाने की योजना बना ली। जब क्रोधीराम नाई को लेकर घर पहुँचा तो देखा कि उसके घर के सामने एक चिता बनी हुई थी तथा दाह-संस्कार करने का समान भी रखे हुए थे।

उसने अपने घर पर लोगों को इकट्ठा हुए देख पत्नी के भाइयों से पूँछा – “इतने सारे लोग यहाँ क्या करने के लिए आए हुए हैं?” उसके भाइयों ने बताया कि किसी भी इंसान की पत्नी को गंजी तभी करते हैं, जब उस औरत का पति मर चुका हो। आपकों अपनी पत्नी को गंजी करने से पहले इस चिता पर बैठना होगा।

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उन लोगों को बातों को सुनकर क्रोधीराम हक्का-बक्का हो गया। वह सभी के सामने दोनों हाथों को जोड़कर नतमस्तक हो गया और अपनी गलतियों को कबूलने लगा। व्यापारी ने कहा – “मेरे व्यापार में बहुत अधिक नुकसान हो जाने से, मैंने अपना धैर्य खो दिया था। जिससे मैं बहुत ज्यादा क्रोधित हो गया” जिसकी सजा मैं अपनी पत्नी को देने जा रहा था। आप लोग मुझे माँफ कर दो।

मैं आप लोगों को वचन देता हूँ कि आगे से अब मैं कभी भी किसी के ऊपर गुस्सा नहीं करूंगा। उसकी बातों को सुनकर वहाँ के लोगों ने क्रोधीराम को माँफ कर दिया।

कहानी से सीख:

क्रोध में लिया गया निर्णय अक्सर पछतावे का कारण बनता है।

5. ईमानदार रामू और लालची दुकानदार:

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हरीराम बीच बाजार में चाट-समोसे का एक ठेला लगाता था। उसके ठेले पर खाने वाले लोगों की भीड़ लगी रहती थी। हरीराम चाट-समोसे बेचता था। लेकिन, उसकी चाहत बहुत बड़ी थी। वह बहुत जल्द बड़ा आदमी बनना चाहता था। जिसके कारण वह ग्राहकों के साथ हेरा-फेरी भी किया करता था।

अगर कोई ग्राहक समोसे खाने से पहले उसे पैसे दे दिया तो वह उसके समोसे खाने के बाद दुबारा से पैसे माँगने लगता था। यहाँ तक की वह बात-बात में लड़ाई भी कर लेता था। हरीराम का रवैया ग्राहकों के प्रति बहुत खराब था। लेकिन, बाजार में चाट-समोसे की एक ही दुकान होने के कारण उसके पास ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी।

एक दिन हरीराम ने अपनी दुकान सुबह-सुबह खोल दी। उस दिन उसकी बेटी को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे थे। वह सुबह से दोपहर तक सौ रुपये कमा लिया था। उसने पास की मिठाई की दुकान से सारे खुल्ले पैसे दे कर एक सौ रुपये का कडक नोट ले लिया। अब वह अपनी दुकान बंद करके रिश्तेदार की खातिरी के लिए सामान लेने के लिए निकलने वाला ही था कि उसकी दुकान पर फटे-पुराने कपड़े पहने रामू नाम का एक लड़का आया।

उसने दो रुपये का नोट देते हुए एक रुपये का समोसा लिया। पूरे दिन की बिक्री के पैसे हरीराम के हाथ में ही थे। जब वह रामू को समोसा पकड़ा रहा था तो वह सौ रुपये का नोट भी उसके हाथ में चला गया। लेकिन, रामू उसके पैसों से बिल्कुल अंजान था। जब उसने अपने एक रुपये वापस मांगे तो हरीराम गुस्से से भरी आवाज में बोला – “एक रुपये का नोट देकर, एक रुपये और मांग रहा हैं। चला जा यहाँ से, नहीं तो तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा।

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हरीराम की डांट भरी आवाज सुनकर रामू डर गया। वह समोसे लेकर अपने घर को चला गया। इधर हरीराम मेहमानों के लिए सामान की खरीदारी करने चला गया। सामान लेने के लिए दुकान पर पहुंचकर देखता हैं कि उसके पास सौ रुपये का नोट नहीं था। अब वह परेशान हो उठा। उसने अपने जेब और थैलों को टटोल कर देखा उसे कुछ नहीं मिला।

वह भागते हुए अपनी दुकान पर पहुंचकर इधर-उधर खोजबीन करने लगा। लेकिन, उसे वहाँ भी कुछ नहीं मिला। अब वह चिंतित होकर अपनी दुकान पर बैठ गया। तभी रामू फिर से उसके पास आया। इसके पहले रामू उससे कुछ कहता “हरीराम रामू के ऊपर जोर-जोर से यह कहते हुए चिल्लाने लगा कि मैंने तुम्हें कह दिया कि तुमने मुझे एक रुपये दिए थे। फिर भी तुम पैसे मांगने आ गए।”

रामू ने सौ रुपये का कडक नोट उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा – “अंकल मैं अपने एक रुपये मांगने नहीं, मैं यह सौ रुपये आपको देने आया हूँ। जोकि, आपके समोसे पकड़ाते समय समोसे के साथ मेरे पास आ गया था।” पैसा देख उसकी आँखें चमक उठी। उसने गल्ले से एक रुपये का नोट देते हुए कहा – रामू अगर आज तुम भी मेरी तरह बेईमान होते तो मेरी इज्जत का क्या होता।

हरीराम ने रामू का माथा चूमते हुए यह कसम खाई की भविष्य में वह कभी भी बेईमानी नहीं करेगा, और वह सामान लेने बाजार को चला गया।

कहानी से सीख:

ईमानदारी सबसे बड़ी पूंजी होती है।

6. कर्म का महत्व:

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किसी गाँव में एक नाई और पंडित रहते थे। उस गाँव के आसपास कई गाँवों में और कोई नाई और पंडित नहीं था। लोग किसी भी आयोजन में अपने घर पर उन्ही दोनों नाई और पंडित को बुलाते थे। इस तरह से दोनों हर जगह एक साथ आते-जाते थे। जिससे दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी। नाई जब भी पंडित से मिलता था तो वह पंडित से तरह-तरह के सवाल किया करता था। जिसका जबाब पंडित जरूर देता था।

एक बार नाई और पंडित किसी आयोजन से वपास अपने घर जा रहे थे। नाई पंडित से सवाल किया – “लोग कितने परेशान हैं, लोगों को नौकरी नहीं मिल रही हैं, लोग भूखे मर रहे हैं, लोगों के पास खाने-पीने के लिए कुछ नहीं हैं। भगवान को कुछ दिखाई क्यों नहीं देता। उस समय पंडित नाई को कुछ जबाब नहीं दिया। दोनों पैदल चलते चला जा रहा था।

अचानक रास्ते में उन्हें एक भिखारी मिला। पंडित, भिखारी को दिखाते हुए नाई से कहा- “इसके दाढ़ी और बाल इतने बड़े-बड़े हैं, तुम नाई हो तुम्हारा फर्ज हैं इसके बाल काटना, तुम्हारे होने से क्या फ़ायदा? नाई ने पंडित को जबाब दिया- ”महाराज, यह इंसान जब मेरे पास आएगा, तभी तो मैं इसके बाल काटूँगा।”

पंडितजी ने कहा- “यही बात तो मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ कि किसी भी इंसान को अपने कष्टों को दूर करने के लिए उसे कुछ न कुछ करना पड़ेगा।” परेशान वही होते हैं जो कर्म नहीं करना चाहते। जो भी व्यक्ति मेहनत और लगन से अपने कर्म कर रहा हैं। वह सफलता कि सीढ़ी पर दिन प्रतिदिन चढ़ता जाएगा।

कहानी से सीख:

कर्म ही सफलता का असली आधार है।

7. मजबूत आत्मविश्वास:

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किसी राज्य में एक राजा उदयभान सिंह रहते थे। राजा बहुत ही साहसी निडर और निर्भीक था। उसने कई राज्य को परास्त करके उस पर अपना कब्जा जमा चुका था। उनका नाम सुनते ही दूसरे राज्य के राजा काँप उठते थे। लेकिन, राजा उदयभान सिंह को एक बात की चिंता थी। क्योंकि, उसके राज्य को संभालने के लिए कोई उत्तराधिकारी नहीं था।

राजा की उम्र बढ़ती चली जा रही थी। एक बार राजा उदयभान सिंह ने अपने राज्य के ऋषि-मुनि को बुलाया। सभी के सामने अपने राज्य को संभालने के लिए उत्तराधिकारी का प्रस्ताव रखा। एक ऋषि ने राजा को एक औषधि दिया, जिससे उन्हें राजकुमार की प्राप्ति हुई। राजकुमार धीरे-धीरे बड़ा हो गया। लेकिन राजकुमार हमेशा बहुत भयभीत रहता था। उसके अंदर डर और भय समा चुका था।

राजा अपने राजकुमार का वार्ताव देखकर बहुत चिंतित रहने लगा। राजा उसी ऋषि से मिलने गया। ऋषि ने राजा की बात सुनकर कहा, “क्या आप राजकुमार को कुछ दिन के लिए हमारे आश्रम में छोड़ सकते हैं। राजा ने हाँ कहा और अपने राजकुमार को आश्रम में छोड़ दिया। ऋषि राजकुमार को हमेशा अपने साथ रखते और उसे प्रेरणादयक बातें बताते थे। जिससे राजकुमार के अंदर आत्मविश्वास बढ़ता गया।

एक दिन महात्मा जी राजकुमार को लेकर जंगल जा रहे थे। महात्मा जी ने राजकुमार को उसके पिता की बहादुरी के सारी कहानी सुना चुके थे। जिससे राजकुमार के अंदर का आत्मविश्वास मजबूत हो चुका था। अचानक ऋषि महात्मा के ऊपर कुछ जंगली आदिवासी हमला कर दिए। जिसे देख राजकुमार ने अपनी तलवार निकलकर ढेर कर दिया। राजकुमार का आत्मविश्वाश देख महात्मा जी राजा के पास संदेश भेजवा दिया कि आपका राजकुमार अब क्षत्रिय बन चुका हैं।

कहानी से सीख:

आसमान छूने की हिम्मत सब के अंदर होती हैं। बशर्ते अपने अंदर छिपे हुए जज़्बों को समझने की जरूरत हैं।

8. किस्मत के भरोसे मत बैठो:

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दूधनाथ नाम का एक किसान था। उसके पास बहुत सारी उपजाऊ जमीन थी। लेकिन दूधनाथ बहुत आलसी था। वह ठीक से खेती नहीं करता था। जिसके कारण उसके घर की स्थिति दयनीय बनी रहती थी। दूधनाथ हमेशा भगवान के भरोसे बैठा रहता था। उसे लगता था कि रातों रात कोई ऐसा चमत्कार होगा जिससे उसके खेतों में लहलहाते फसल लग जाएंगे।

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लेकिन, ऐसा कभी नहीं हो सका। एक दिन दूधनाथ अपने खेत में बैठे-बैठे सोच रहा था कि अपनी गरीबी कैसे दूर करें। तभी उसे सामने से एक फकीर आता हुआ दिखाई दिया। फकीर गाँव से भिक्षा मांगकर वापस अपने घर को जा रहा था। फकीर बहुत खुश नजर आ रहा था। तभी दूधनाथ ने उस फकीर से पूछा, “बाबा आप इतना खुश क्यों हो।” फकीर ने कहा, “आज मुझे अधिक भिक्षा मिली हैं इसलिए।

फकीर ने पूछा तुम दुखी क्यों हो? दूधनाथ ने अपनी कहानी फकीर से बता दी। फकीर ने कहा, “तुम भगवान के भरोसे क्यों बैठे हो। भगवान भी उसी का साथ देते हैं जो खुद कुछ करना चाहता हैं। क्योंकि हमारे माता-पिता को भी हमसे उम्मीद होती हैं कि एक दिन हमारा बेटा हमारा सहारा बनेगा। इसलिए तुम्हारे पास इतनी ज्यादा जमीन हैं उस पर खेती क्यों नहीं करते।

फकीर की बात किसान दूधनाथ के समझ में आ गई उसने उस दिन से अपने खेतों में मेहनत करना शुरू कर दिया। बारिश भी अच्छी हो गई देखते-देखते उसके खेतों में फसल लहलहाने लगे। किसान दूधनाथ को विश्वास हो गया कि भगवान भी बहादुरों का साथ देते हैं, न की कायरों का।

कहानी से सीख:

आलस व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु हैं।

🙋‍♂️ FAQs – Short Motivational Story in Hindi with Moral

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