समय की कीमत, साहस, आस्था और त्याग की 4 हिंदी कहानियाँ

📅 Published on July 5, 2026
🔄 Updated on July 4, 2026
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जीवन में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जब न बुद्धि काम करती है, न धन तब काम आती है आस्था, साहस और सच्चे लोगों का साथ। इस संग्रह में 4 ऐसी inspiration aur aastha ki kahani Hindi प्रस्तुत की गई हैं जो दिखाती हैं कि स्वामी विवेकानंद ने कैसे डर का सामना किया, एक चिड़े की जिद ने पूरे गाँव को एकजुट किया, एक शिष्य ने सीखा कि लालच त्यागने पर ही विद्या मिलती है, और सच्चा दोस्त वही होता है जो मुश्किल वक्त में साथ खड़ा रहे। ये कहानियाँ बच्चों और युवाओं को आस्था, त्याग और एकता का असली अर्थ सिखाती हैं।

1. त्याग के बिना विद्या नहीं मिलती:

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किसी जंगल में एक ऋषि रहते थे। उनके आश्रम में बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। उन्ही बच्चों में एक लालची बच्चा था। उसकी नजर गुरुजी की कीमती चीजों पर रहती थी। एक बार गुरुजी और बच्चे किसी यात्रा पर निकले थे। रास्ते में गुरुजी को एक पारस पत्थर मिला। गुरुजी ने बच्चों से कहा, “देखो बच्चों! यह कोई साधारण पत्थर नहीं हैं।”

तभी एक शिष्य ने कहा, “गुरुजी! इस पत्थर की खासियत क्या हैं? गुरुजी ने कहा, “इस पत्थर को हम पारस पत्थर के नाम से जानते हैं।” यह पत्थर लोहे के संपर्क में आने से उस लोहे को सोना बना देता हैं। इतना सुनते ही वह शिष्य आश्चर्यचकित हो गया। उस पत्थर को लेकर गुरुजी और सभी शिष्य वापस आश्रम आ गए।

गुरुजी ने उस पत्थर को कपड़े की पोटली में बांधकर एक बॉक्स में रख दिया। वह शिष्य उस पत्थर को चुराना चाहता था। एक दिन गुरुजी कहीं गए हुए थे। शिष्य गुरुजी की झोपड़ी में जाकर पारस पत्थर को खोजने लगा। बहुत खोजने के बाद उसे एक बॉक्स मिला, जिसमें एक ताला लगा हुआ था।

चाभी न होने की वजह से वह ताला तोड़ने की कोशिश करने लगा। लेकिन, वह उस ताले को तोड़ नहीं सका। तभी अचानक उसके दिमाग में एक बात आई कि अगर इस बॉक्स में पारस पत्थर रखा होता तो यह लोहे का बॉक्स सोने का बन चुका होता। वह उस बॉक्स को वही पर छोड़कर अन्य जगहों पर पारस पत्थर को खोजने लगा।

शिष्य थक हारकर बैठ गया। उसे वह पारस पत्थर नहीं मिला। एक दिन गुरुजी अपने शिष्यों से आश्रम की सफाई करवा रहे थे। तभी गुरु जी ने उस बॉक्स को खोलते हुए, पारस पत्थर को बाहर निकाला। जिसे देख शिष्य ने पूछा, “मुनिवर! यह पत्थर लोहे के बॉक्स में ही रखा था। लेकिन लोहे का यह बॉक्स सोना नहीं बना! ऐसा क्यों?

गुरुजी ने शिष्य को समझाते हुए कहा, “जिस तरह इस पत्थर और बॉक्स के बीच में कपड़े की यह पोटली लोहे के बॉक्स को सोना नहीं बनने दे रहा हैं। ठीक इसी प्रकार से, विद्या और विद्यार्थी के बीच में लालच, लोभ, मोह उसे शिक्षा प्राप्त नहीं करने देती। जबकि, कपड़ा हटा देने पर बॉक्स सोना बन जाता। इसी तरह से लालच, लोभ, मोह का त्याग करने पर ही विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर सकता हैं।

नैतिक सीख:

शिक्षा प्राप्त करने के लिए आलस, निद्रा और बहाने को अपने दिमाग से निकालना होगा।

2. स्वामी विवेकानंद और बंदर:

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महान व्यक्तित्व के धनी स्वामी विवेकानंद अपने आप में एक महापुरुष थे। उनका जीवन लोगों को सही मार्ग बतलाने के लिए समर्पित था। एक बार स्वामी विवेकानंद तीर्थ यात्रा पर निकले थे। कई मंदिरों के दर्शन करने के बाद वे बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचे। वहाँ दर्शन और पूजा-पाठ करके निकले ही थे तो उनके पीछे कुछ बंदर पड़ गए।

क्योंकि, स्वामी विवेकानंद के वस्त्र बड़े तथा उनके गुठनों तक थे। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था। इसलिए, वे अपने साथ हमेशा एक थैले किताबें भी लिए होते थे। इस तरह से बंदरों को लगता हैं की स्वामी विवेकानंद के थैले में कुछ खाने की चीज हैं। जिसके लिए वे उनके पीछे पड़ गए। वें धीरे-धीरे आगे चल रहे थे कि बंदरों ने उनका पीछा किए जा रहे थे।

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कुछ दूर तक बदरों ने उनका पीछा करना नहीं छोड़ तो वें अधिक डर गए। स्वामी विवेकानंद अब तेज से भागने लगे बंदरों ने भी उनके पीछे और तेज-तेज भागना शुरू कर दिया। स्वामी जी पीछे मुड़कर देखा तो उनके पीछे कई सारे बंदर पड़े थे। लेकिन, उन्हें कोई बचाने वाला नहीं था। सभी लोग खड़े होकर सिर्फ तमाशा देख रहे थे। कोई उनकी सहायता के लिए नहीं आ रहा था।

अचानक किसी व्यक्ति की स्वामी जी को आवाज सुनाई देती हैं। ‘रुको’ डटकर सामना करो भागो मत, जैसे ही स्वामी के कान में यह आवाज पड़ी। वह तुरंत रुक गए, वें देखते हैं की बंदर भी रुक गए तथा कुछ तो पीछे लौटना शुरू कर देते हैं। स्वामी जी को याद आया कि “जब हम मुसीबत से डरकर भागते हैं तो, मुसीबत और पीछा करती हैं।” उस घटना से स्वामी जी का विश्वास और दृढ़ हो गया। उन्होंने जहाँ-जहाँ पर बुराइयाँ देखी उसका डटकर सामना किया न की उसको छोड़कर पीछे भागे।

नैतिक सीख:

मुसीबतों से डरने के बजाय अपनी पूरी क्षमता के साथ उसका सामना करना चाहिए।

3. सलाह नहीं, मदद करो:

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बहुत समय पहले की बात हैं। एक तालाब में एक चिड़िया का परिवार डूब गया। उस परिवार में केवल घर का मुखिया ‘चिड़ा’ ही बच था। अब वह बहुत दुखी रहने लगा। उसका सब कुछ उजाड़ चुका था। एक दिन गुस्से में आकर उसने तालाब को सुखाने की कसम खा ली। उस दिन से उसने उस तालाब के पानी को अपनी चोंच में भर-भर कर आसपास के खेतों और नदियों में ले जाकर डालने लगा।

‘चिड़ा’ को ऐसा करता देख एक चिड़िया ने पूछा, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? “उसने अपने साथ हुए घटना को बताया” चिड़िया बोली तुम कितने बडे मूर्ख व्यक्ति हो, ऐसा करने से तुम कई जन्मों में तालाब के पानी को नहीं सूखा सकते। ‘चिड़ा’ बोला, “मदद करनी हैं तो करो, वरना सलाह मत दो!” उस चिड़िया ने ‘चिड़ा’ की मदद करनी शुरू कर दी। देखते-देखते लाखों की संख्या में चिड़िया उस ‘चिड़ा’ के साथ आ गए।

सभी चिड़िया को तलाब के पानी को दूर ले जाते देख, एक औरत ने चिड़िया से पूछा तुम लोग ऐसा क्यों कर रहे हो। चिड़िया, ने उस औरत को सारी बात बता दी। औरत ने कहा, ‘तुम लोग ऐसा कब तक कारोगे?’ चिड़िया बोली, “मदद करनी हैं तो करो, वरना सलाह मत दो!”

औरत घर जाकर अपने पति से सारी बात बताती हैं। उसका पति कहता हैं, “चिड़िया ऐसा कब तक करेंगी। औरत अपने पति से कहती हैं, “मदद करनी हैं तो करो, वरना सलाह मत दो!” उस व्यक्ति ने यह बात सभी गाँव वालों से बता दिया। गाँव वाले पानी निकालने वाले इंजन को अपने साथ लेकर उस तलाब के पानी को खाली कर दिया। चिड़िया को सूखे तालाब में अपने परिवार के लोगों का अथिर-पंजर दिखाई दिया। जिसे देखकर वह बहुत रोई।

कहानी से सीख:

सलाह देना से अच्छा हैं मदद करो।

4. समय की कीमत:

मोहित, वैभव, अभिषेक और अरुण चार दोस्त थे। चारों दोस्त हमेशा एक साथ रहते थे। चारों दोस्तों में अरुण बहुत ही गरीब था। उसके पास ठीक से खाने को नहीं हो पाता था। एक दिन अरुण ने मोहित से कहा, “भाई मोहित मेरे घर की स्थिति ठीक नहीं हैं। हम लोग ऐसे ही घूमते रहते हैं। चलो हम कुछ काम सीख ले जिससे हमें नौकरी भी मिल जाए।”

मोहित ने कहा, “मेरे पापा इस गाँव के सबसे धनी व्यक्ति हैं। मुझे कोई नौकरी करने की जरूरत नहीं हैं।” और हाँ अगर तुम्हें करना हो तो तुम कर सकते हो। अगले दिन अरुण ने वैभव से पूँछा, “क्यों भाई वैभव अगर हम कही नौकरी करना शुरू कर दे तो कैसा रहेगा।” अरुण ने कहा, “क्या जरूरत हैं नौकरी करने की सब कुछ ठीक तो चल रहा हैं। मैं तो नहीं करूंगा, तुम्हें करना हो तो कर लो।

अरुण ने कहा, “मेरा पूछने का मकसद हैं कि तुम लोगों को भी कुछ न कुछ करना चाहिए। ऐसे कब तक खाली बैठे रहोगे। रही बात नौकरी करने की तो मैं अकले भी नौकरी कर सकता हूँ। मुझे कोई दिक्कत नहीं हैं। लेकिन दोस्ती के नाते मेरा फर्ज बनता हैं कि एक बार मैं तुमसे भी पूछ लूँ।

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अरुण अपने दोनों दोस्तों की बातों को सुनकर निराश था। वह जनता था कि उसका तीसरा दोस्त अभिषेक भी वही जबाब देगा। फिर भी उसने सोचा चलो एक बार पूछ लेता हूँ। देखो अभिषेक क्या कहता हैं। अरुण ने जैसे अपनी बात अभिषेक के समाने रखी। उसने कहा, “तुम्हारी अच्छी सोच हैं। खाली बैठने से अच्छा हैं कुछ न कुछ करते रहना चाहिए।”

लेकिन समस्या यह हैं की मुझे मेरे घर वाले अभी नौकरी नहीं करने देंगे। मैं अपने घर वालों को यह कहते हुए राजी करा लूँगा कि मैं अपने दोस्त अरुण के साथ कुछ स्किल सीख रहा हूँ। दोनों अगले दिन से नौकरी की खोज ने लग गए। एक दिन दोनों किसी अच्छी कंपनी में नैकारी मिल गई। कंपनी ने दोनों को ट्रेनिग के लिए सिंगापुर भेजी। इस तरह से दोनों अच्छे पैसे कमाने लगे।

अरुण और अभिषेक की मुलाकात मोहित, वैभव से हुई जोकि अभी भी कोई काम नहीं कर रहे थे। लेकिन घर और गाँव वालों के नजर में उनकी कोई इज्जत नहीं थी। जबकि, अरुण और अभिषेक का सभी सम्मान करते थे। उसे दोनों दोस्त ने कहा, क्या आप की कंपनी में हम दोनों को कोई नौकरी मिल सकती हैं। अरुण जिसने एक दिन उन दोनों को नौकरी करने के लिए कहा था। उसने कहा, “क्या करोगे नौकरी करके वैसे भी तुम दोनों के पिता इस गाँव के सबसे धनी व्यक्ति हैं। इतना कहकर अरुण और अभिषेक चले गए।

कहानी से सीख:

एक बार समय निकल गया तो फिर पछताना पड़ता हैं।

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