3 प्रेरणादायक कहानियाँ – जब बुरी संगत छूटी और सच्चाई का रास्ता मिला

📅 Published on June 18, 2026
🔄 Updated on June 16, 2026
You are currently viewing 3 प्रेरणादायक कहानियाँ – जब बुरी संगत छूटी और सच्चाई का रास्ता मिला
AI generated illustration

क्या कोई चोर भी संत बन सकता है? क्या एक लालची इंसान को उसकी गलती का एहसास हो सकता है? और क्या एक साधारण पुजारी ईश्वर की कृपा पा सकता है – सिर्फ एक भिखारी की सेवा करके? इन तीनों सवालों का जवाब आज कहानीज़ोन की इन 3 प्रेरणादायक कहानियों में मिलेगा। पहली कहानी में दो चोर एक सत्संग सुनकर अपनी जिंदगी बदल लेते हैं, दूसरी में एक गरीब पंडित का लालच उसे बर्बाद कर देता है और तीसरी में एक पुजारी की सेवा भावना उसे ईश्वरीय दर्शन करा देती है। ये कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि परिवर्तन हमेशा संभव है बस सही सोच और सही संगत चाहिए। तो चलिए देखते हैं कहानियों को:

1. चोर और सत्संग (परिवर्तन की कहानी)

एक समय की बात हैं, किसी पहाड़ी पर चोरों का एक बड़ा ग्रुप रहता था। उनका काम किसी भी गाँव में जाकर चोरी करना होता था। लूटे हुए धन को चोर अपने सरदार को लाकर देते थे। चोरों का सरदार उस सामान को चोर बाजार में बेचकर सभी के लिए खाने-पीने का इंतजाम करता था। तथा उन्हें कुछ पैसे भी दे देता था। प्रतिदिन ऐसा ही चलता रहता था।

चोरों के ग्रुप में दो दोस्त रहते थे। जिनका नाम सुखदेव सिंह और सुखचयन सिंह था। दोनों दोस्त कहीं भी चोरी करने एक साथ जाते थे। एक दिन दोनों को चोरी करने के लिए पहाड़ी से दूर रहमतपुर नामक गाँव में भेजा गया। वह गाँव पहाड़ी से बहुत दूर होने के कारण दोनों दोस्त चोरी करने के लिए जल्दी निकल गए।

रहमतपुर गाँव में पहुंचकर दोनों ने देखा कि उस गाँव में एक सत्संग चल रहा था। जिसके कारण गाँव के सभी लोग जग रहे थे। दोनों दोस्तों ने सोचा कि अभी किसी घर में चोरी करना खतरे से खाली नहीं होगा। हम लोग पकड़े जा सकते हैं, जिसके कारण हमारी पिटाई भी हो सकती हैं। सुखदेव और सुखचयन कुछ देर वही बैठ कर सत्संग सुनने लगे।

सत्संग में गुरुजी अच्छी-अच्छी बातें सुना रहे थे। गुरुजी की बातें दोनों चोरों को बहुत अच्छी लग रही थी। सत्संग आधी रात को खत्म हुई। सभी लोग अपने-अपने घर चले गए। दोनों दोस्त भी चोरी करने के लिए घर की तलाश में लग गए। उन दोनों को एक ऐसा घर दिखाई दिया जहाँ पर सभी लोग सो गए थे। उस घर में घुसने के लिए उनको एक आसान रास्ता भी मिल गया था।

दोनों दोस्त जल्दी से उस घर में घुस गए और बहुत सारा समान एकठ्ठा करके बांध लिया। जब दोनों दोस्त उस घर से बाहर निकल रहे थे, तभी सुखदेव को रसोई घर दिखाई दिया, जहाँ पर अच्छे-अच्छे पकवान बना कर रखे हुए थे। दोनों दोस्त को जोरों की भूख भी लगी थी। जिसके कारण रसोई घर में जाकर खूब सारा खाना खा लिया।

सुखदेव ने कहा, चलो अब जल्दी समान उठाओ, यहाँ से निकलते हैं। तभी सुखचयन को सत्संग में बताई गई गुरुजी की बातें याद आई। उसने कहा, “जो खाना हमने खाया हैं उसमे नमक था। सत्संग में गुरुजी बोल रहे थे कि हम जिसका नामक खाते हैं, उसके साथ नमक हरामी नहीं करनी चाहिए।”

दोनों दोस्तों ने हाँ में हाँ भरी और चोरी किया हुआ गट्ठर उसी घर में छोड़कर पहाड़ी के लिए चले गए। चोरों का सरदार दोनों को खाली हाथ देख कारण जानना चाहा। सुखदेव और सुखचयन ने अपने सरदार से सारी बातें सच-सच बता दी। उन दोनों की बातों को सुनकर उसे बहुत गुस्सा आया। उसने दोनों को अपने गिरोह से निकाल दिया। अब दोनों दोस्त बहुत परेशान हो गये। वे दोनों सोच में पड़ गए कि अब हमारे खाने-पीने का बंदोबस्त कौन करेगा।

Image sources: bing.com

सुखदेव सिंह ने कहा, “घबराओ मत जो भी होगा अच्छा होगा। दोनों दोस्त फिर से उसी गाँव में गए और महात्मा से मिलकर सारी बातें सच-सच बता दी। उन दोनों की बातें सुनकर गुरुजी बहुत खुश हुए। दोनों को अपने सेवादार के रूप में रख लिए, जहाँ पर उनको अच्छा-अच्छा खाने-पीने को मिलने लगा। इस तरह से दोनों दोस्तों ने सच्चाई का दामन थाम लिया और अपना पूरा जीवन भक्ति में लगा दिया।

नैतिक सीख:

गलत संगत इंसान को नीचे गिराती है, जबकि अच्छी संगत व्यक्ति को ऊँचाइयों के शिखर पर ले जाती है।

2. पंडित और डाकू (लालच का बुरा अंत)

motivational kahani hindi
Image sources: bing.com

एक बार की बात हैं, सोमपुर गाँव में एक पंडित रहता था। वह बहुत गरीब था। किसी तरह गाँव के बच्चों को शिक्षा-दीक्षा देकर थोड़े-बहुत पैसे कमा लेता था। वह अपना जीवन गरीबी में यापन कर रहा था। लेकिन, पंडित के अंदर एक खूबी यह थी कि उसे वैदर्भ मंत्र का ज्ञान था।

पंडित के वैदर्भ मंत्र पढ़ने से आकाश से हीरे-मोती, सोना-चांदी जैसे जवाहरातों की वर्षा होती थी। लेकिन, समस्या यह थी कि वैदर्भ मंत्र तभी पढ़ा जा सकता था, जब नक्षत्र चाँद सितारों का योग बनता हो। जबकि, पंडित के लिए यह पता कर पान कठिन था कि ऐसा योग कब बनता हैं। क्योंकि, इस तरह के योग साल भर में एक बार कुछ ही मिनटों के लिए बनता था।

पंडित अपनी गरीबी दूर करने के लिए कई महीनों से आकाश की तरफ निगाहे लगाए राहत था। जिससे वह वैदर्भ मंत्र की सहायता से जावहरात को इकट्ठा करके धनवान बन जाए। लेकिन, उसे वह योग पता नहीं चला सका। जिससे आभूषणों की वर्षा करवा सके।

एक दिन पंडित बैठे-बैठे सोच रहा था कि मेरी किस्मत में गरीबी ही लिखी हैं। मैं ऐसे योग के चक्कर में कब तक आकाश को ही देखता रहूँगा। गरीबी से तंग आकर उसने शहर जाने का मन बन लिया। उसके साथ उसका एक परम शिष्य भी चल दिया।

शहर जाने के लिए जंगल के रास्ते से होकर जाना पड़ता था। उसी जंगल में डाकुओं का एक गिरोह रहता था। जो मौका पाते ही उधर से जाने वाले लोगों को लूट लेते थे। एक डाकू के दल की नजर जंगल से जाते हुए पंडित और उसके शिष्य पर पड़ी।

motivational kahani hindi
Image sources: bing.com

फिर क्या, सभी डाकू उन दोनों पर टूट पड़े और उनकी तलासी लेना शुरू कर दिया। लेकिन, पंडित और उसके शिष्य के पास एक पोटली में सिवाय चने के सत्तू और आचार के आलवा कुछ भी नहीं मिला।

पंडित डाकुओं के सामने दोनों हाथ जोड़कर बोला- “मेरे पास कुछ नहीं हैं, मैं बहुत गरीब हूँ मुझे जाने दो। डाकुओं के सरदार ने कहा, “मेरा नाम डाकू माधो सिंह हैं, मेरा नाम सुनते ही दूर-दूर के लोग काँप जाते हैं। मैं, पत्थर से भी पैसा निकाल लेता हूँ। अगर अपनी सलामती चाहते हो तो तुम अपने चेले को घर भेजकर एक हजार रुपये माँगा लो।

डाकुओं ने पंडित को खुले आसमान में एक पेड़ से बांध दिया। चेले ने पंडित को धैर्य दिलाते हुए कहा, “गुरु जी आप चिंता मत करो। मैं गाँव जाकर पैसों का इंतजाम करके आता हूँ। लेकिन, ध्यान रहे आप वैदर्भ मंत्र के बारें में डाकुओं से मत बताना नहीं तो वे आपको सदा के लिए बंदी बना लेंगे। इतना कहकर शिष्य गाँव की तरफ चला गया।

उजाली रात थी पंडित खुले आसमान में बैठा था। वह बहुत मायूस था। उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर ऊपर देखते हुए कहा, ”हे भगवान मुझे किस जन्म की परीक्षा ले रहे हो? अब मैं बहुत टूट चुका हूँ।” मुझे कोई मार्ग दिखलाओ। तभी उसने आकाश में देख कि चाँद सितारों का नक्षत्र योग बन रहा था। उसने डाकुओं के सरदार से कहा, “अगर में सोने, चांदी और हीरे जवाहरात की वर्षा करवा दूँ तो तुम मुझे छोड़ दोगे।”

पंडित की बातों को सुनकर डाकुओं का सरदार जोर-जोर से हंसने लगा। उसने कहा, “चल पंडित जल्दी से ऐसी बारिश करवा दे। पंडित ने वैदर्भ मंत्र पढ़ा और हीरे जवाहरात के आभूषणों की बारिश हो गई।” यह सब देख डाकुओं का सरदार माधो सिंह आश्चर्यचकित हो उठा। तभी दूसरे जंगल का डाकू रंजीतसिंह अपने साथियों के लेकर वहाँ आ गया। उसने कीमती आभूषण फैला देख अपने साथियों से उठाने के लिए कहा।

इतने में डाकू माधो सिंह ने कहा भाई रंजीतसिंह तुम ये आभूषण मत उठाओ। तुम इस पंडित को अपने साथ ले जाओ इसी ने इन कीमती आभूषणों की वर्षा कारवाई हैं। रंजीतसिंह ने कहा, “चल पंडित फिर से आभूषणों की वर्षा करवा। पंडित ने कहा अब ऐसा नहीं हो सकता। इसके लिए अब एक साल तक इंतजार करना होगा। पंडित की बातों को सुनकर डाकू रंजीतसिंह गुस्से से भर गया। उसने पंडित के पेट में अपनी तलवार घुसा दी जिससे पंडित की मृत्यु हो गई।

अब आभूषणों के लेकर डाकू माधो सिंह और रंजीत सिंह में लड़ाई शुरू हो गई दोनों के सिपाही मारे जा चुके थे। तभी माधो सिंह ने कहा, भाई रंजीत सिंह अगर हम दोनों ऐसे लड़ते रहे तो यह आभूषण कोई और ले जाएगा। इसलिए हम दोनों को इसे आधा-आधा बाँट लेना चाहिए।

kids story in hindi with moral
Image sources: bing.com

दोनों ने आभूषण को एक पोटली में बांध लिया। रंजीतसिंह ने कहा, “भूख जोरों को लगी हैं। पहले चलो कुछ खा लेते हैं फिर आभूषण का बँटवारा करेंगे।” माधो सिंह खाना लाने के लिए पास के ढाबे पर चल गया। उसने वही पर जमकर खाना खा लिया और रंजीत सिंह के खाने में जहर मिला दिया जिससे उसे आभूषणों में बंटवारा न करना पड़े।

उधर रंजीत सिंह तलवार लेकर एक झाड़ी में छिप गया। उसने सोच माधो सिंह के ऊपर पीछे से वार कर दूँगा। जिससे सारे जवाहरात मुझे मिल जाएगा। जैसे ही माधो सिंह वहाँ पहुँचा रंजीत सिंह ने पीछे से तलवार से वार कर दिया। जिससे वह गिर पड़ा और दम तोड़ दिया। उसे मारकर रंजीत सिंह बहुत खुश हुआ।

उसने सोचा, अब तो सारा धन मेरा हो गया। चलो कुछ खाना खा लेते हैं। फिर घर चलेंगे जैसे उसने खाना खाया उस खाने में जहर मिले होने के कारण वह तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। कुछ समय बाद पंडित का शिष्य एक हजार रुपये लेकर अपने गुरु को छुड़ाने वहाँ पहुँचा। उसने यह सब नजारा देखकर समझ गया कि गुरुजी ने डाकुओं को वैदर्भ मंत्र से जवाहरात की वर्षा कराने की गलती कर दी।

नैतिक शिक्षा:

लालच इंसान को बहुत बडे गड्ढे में गिराती हैं, जहाँ से उसका निकल पाना आसान नहीं होता।

3. पुजारी और भिखारी (नर सेवा = नारायण सेवा)

panchtantra-stories-in-hindi-pujaaree-aur-bhikhaaree
Image sources: bing.com

किसी मंदिर में एक पुजारी रहता था। वह उस मंदिर की देखभाल और पूजा-पाठ करता था। एक दिन कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। पुजारी सुबह-सुबह मंदिर की सफाई कर रहा था। एक भिखारी कही से टहलते हुए मंदिर के पास आ पहुँचा। उसने देखा कि पुजारी मंदिर की धुलाई कर रहा हैं। भिखारी के तन पर फटे पुराने कपड़े थे। वह ठंड से काँप रहा था। उसने पुजारी से खाने के लिए कुछ माँगा।

पुजारी ने उसे अलाव जलाकर आग के सामने बैठा दिया। पुजारी तुरंत उस भिखारी के लिए चाय बनाकर लाया। और उसे तन ढकने के लिए एक कंबल दिया। इस तरह से पुजारी उस भिखारी की खूब सेवा की। उसकी खिदमत देख भिखारी बहुत खुश हुआ। उसने अपना रूप किसी देवता के रूप में बदलते हुए कहा, “आज आपने यह साबित कर दिया कि “नर पूजा, नारायण पूजा” होती हैं। क्योंकि नर के अंदर ही नारायण का वास होता हैं।

देवता का रूप देखते ही पुजारी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। उसने कहा, “हे प्रभु इस तरह हमारी परीक्षा मत लिया करो।” मैं आपकी परीक्षा में सफल नहीं हो पाऊँगा। उस देवता ने पुजारी को बहुत आशीर्वाद दिया। उस दिन से पुजारी का विश्वास प्रभु-परमात्मा के प्रति और बढ़ गया। वह अपने द्वार पर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी का हमेशा आदर-सत्कार करता था।

नैतिक सीख:

हमें बच्चे, बड़े और बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए।

🙋‍♂️ FAQs – प्रेरणादायक हिंदी कहानियाँ

Leave a Reply