10 मेहनत और सफलता की राह दिखाने वाली प्रेरणादायक कहानियाँ

📅 Published on June 19, 2026
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क्या आपने कभी सोचा है कि सफलता की राह में सबसे बड़ी रुकावट कौन होती है? जवाब है – हम खुद! आलस, डर और “कल करेंगे” की सोच हमें हमारे सपनों से दूर रखती है। लेकिन जब मेहनत, लगन और मजबूत इच्छाशक्ति साथ होती है, तो हर मुश्किल रास्ता आसान लगने लगता है। इस लेख में हम लाए हैं सफलता की 10 ऐसी motivational kahani in hindi जो आपको अंदर से झकझोर देंगी। चाहे आप एक विद्यार्थी हों, नौकरीपेशा हों या जीवन में नई शुरुआत करना चाहते हों – ये कहानियाँ हर किसी के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत हैं।

1. गरीबी से जिलाधिकारी बनने तक का संघर्ष:

यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहने वाले विशाल की हैं। जिसका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। उसके पिता रामलाल मोची का काम किया करते थे। बड़ी मुश्किलों के बाद उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब होता था। कभी-कभी तो उसका परिवार भूखे पेट ही सो जाता था। एक दिन रामलाल सुबह-सुबह अपनी दुकान खोलकर बैठा था। वह अपने घर के हालात से बहुत मायूस था।

अचानक गाड़ियों का काफिला उसके सामने आकर रुका। काफिले के बीच में चमचमाती कार से एक अधिकारी निकला। उसके साथ कई पुलिस वाले भी थे। वे सभी रामलाल की दुकान की ओर आ रहा थे। उसे लगा शायद मैंने कोई गलती कर दी। अधिकारी रामलाल के पास आकर बहुत नम्र आवाज में कहा, “क्या आप मेरे जूते पॉलिश कर देंगे।” रामलाल ने कहा- “जी साहब! क्यों नहीं।”

रामलाल जूते पॉलिश करने लगा। वह अंदर से बहुत डरा हुआ था। उसने उस अधिकारी के जूते को बहुत अच्छे से पॉलिश किया। अधिकारी खुश होकर उसे सौ रुपये दिया। रामलाल ने कहा- “साहब जूते पॉलिश करने के सिर्फ दस रुपये हुए। हमारे पास छुट्टे नहीं हैं। कृपया दस रुपये दीजिए।” अधिकारी ने कहा, “पूरे पैसे रख लो, मुझे वापस नहीं चाहिए।” इतना कहकर अधिकारी अपने काफिले के साथ निकल गया।

रामलाल अपने आसपास के लोगों से पूछा- “ये अधिकारी कौन हैं।” सभी ने उसे बताया कि वह अपने जिले का मजिस्ट्रेट हैं। उसने सोचा ऐसी जिंदगी हमारी क्यों नहीं हो सकती। उसके दिमाग में वह अधिकारी और उसका काफिला घूमता रहा। शाम को खाना खाते समय उसने अपने पत्नी और बच्चे उस अधिकारी की कहानी सुनाते हुए भावुक हो गया, उसकी आँखों में आँसू भर आए। अंत में उसने अपनी पत्नी और बेटे के सामने एक लाइन बोली- “भगवान! क्या हमारी जिंदगी में सिर्फ जूते पोलिश करना ही लिखा हैं?

पास में बैठा विशाल खाना छोड़कर अपने पिता की आँसू पोंछते हुए कहा- “पापा आपके सपने को मैं हकीकत में बदल कर रहूँगा।” उस दिन से विशाल अपने जीवन में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बनने का एक मात्र लक्ष्य निर्धारित कर लिया। उसने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दिन रात एक करके मेहनत करना शुरू कर दिया। कभी-कभी वह अपने शहर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के ऑफिस के सामने जाकर कई घंटे तक उन्हें देखता रहता था।

वह मजिस्ट्रेट के काफिले को देखने का इंतजार करता था। जिससे उसे बहुत ज्यादा प्रेरणा मिलती थी। उसने अपने आपको मजिस्ट्रेट के रूप में देखना शुरू कर दिया। वह अपना हाव-भाव सब बदल चुका था। जिसके कारण उसे लगने लगा था कि वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर चुका हो। उसके सामने पैसों को लेकर कई तरह की परेशानियाँ आई। लेकिन उसके माता-पिता ने उन समस्यों का डटकर सामना किया।

विशाल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पद के लिए आवेदन कर चुका था। उसकी तैयारी भी बहुत शानदार थी। उसने परीक्षा हाल में घुसते ही निर्धारित कर लिया था कि यह मेरी पहली और आखिरी परीक्षा होगी। उसकी परीक्षा बहुत शानदार हुई थी। उसने उसी दिन ही अपने माता-पिता को कह दिया था कि आपके बेटे को डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बनने से कोई नहीं रोक सकता।

महीनों बाद रिजल्ट घोषित हुआ। विशाल का नाम उस परीक्षा में टॉप 10 में था। उसके गाँव वालों ने विशाल को अपने कंधे पर बैठाकर पूरे गाँव में घुमाया और खुशियां मनाई। विशाल के पिता उसकी सफलता से गदगद थे। उस दिन उन्हें विश्वास हो गया कि सफलता पाने के लिए सपने देखना बहुत जरूरी होता हैं। इस तरह से एक दिन विशाल अपने माता पिता का नाम रोशन करते हुए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बन गया।

अब विशाल गरीब दबे हुए बच्चों को प्रेरित करता और उन्हें भी अपना लक्ष्य निर्धारित करने तथा उसके लिए सपने देखने को कहता था। वह हमेशा एक ही बात सभी बच्चों को समझाता था कि सपने सच होते हैं, बशर्ते उसे पाने के लिए तुम्हारे अंदर किस प्रकार की जिद्द हैं। विशाल की सफलता उसके गाँव के बच्चों को बहुत प्रेरित करती थी।

कहानी से सीख:

बड़े सपने और अटूट संकल्प से किस्मत बदली जा सकती हैं।

2. एक कुएँ ने बदल दी पूरे गाँव की तकदीर:

सोमपुर गाँव में रामू नाम का एक धोबी रहता था। वह अपने परिवार का गुजर-बसर लोगों के कपड़े धुलकर करता था। लेकिन, उसके गाँव में पानी की सबसे बड़ी समस्या थी। उस गाँव के लोग तीन किलोमीटर दूर दूसरे गाँव के कुएं से पानी भरकर लाते थे। दूसरे गाँव से पानी लाना किसी को अच्छा नहीं लगता था। लेकिन उनकी मजबूर थी उनके पास कोई और साधन नहीं थे।

पानी का संकट दिनों-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। नदी भी सूख चुकी थी। जिससे रामलाल को कपड़े धुलने में और अधिक परेशानी होने लगी। अब रामलाल और उसके परिवार को पानी लाने के लिए दूसरे गाँव के कई चक्कर लगाने पड़ रहे थे। एक दिन रामलाल और उसके परिवार के लोग घड़े लेकर दूसरे गाँव के कुएं पर पानी भरने के लिए पहुँचे। उस कुएं पर उसी गाँव के लोग पानी भर रहे थे। तभी किसी ने रामलाल से कहा, “तुम लोग इंतजार करो, पहले इस गाँव के लोग पानी भरेंगे। उसके बाद तुम लोग पानी भरोगे।

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इस बात का रामलाल ने विरोध किया तो दूसरे गाँव वालों ने कहा, “इतनी जल्दी रहती हैं तो तुम लोग अपने गाँव में पानी का बंदोबस्त क्यों नहीं कर लेते।” उन लोगों की बात रामलाल के दिल से लग गई। उसी दिन रामलाल ने निश्चय किया कि चाहे जो हो जाए। वह गाँव में कुआँ खोदकर ही मानेगा। उसने अपने घर के सामने कुआँ खोदना शुरू कर दिया। गाँव वालों ने कहा, “रामलाल तुम्हारा दिमाग तो ठीक हैं न, अपने गाँव की जमीन कंकड़ और पत्थर से भरी हुई हैं। यहाँ पर कुआँ खोदना आसान नहीं होगा।

रामलाल ने किसी की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने अपनी मेहनत और लगन से कुएं की खुदाई करता रहा। उसके घर वालों ने रामलाल का साथ दिया। जिससे रामलाल का काम कुछ आसान होता चला गया। धीरे-धीरे उस गाँव के नवजवान लड़को ने भी रामलाल का साथ देना शुरू कर दिया। जिससे रामलाल को साहस और बल मिलने लगा।

कई दिनों के अथक प्रयास और जिद्द के कारण उसकी मेहनत रंग लाई। लोग जिस काम को असंभव समझ रहे थे। वह रामलाल की कोशिशों से संभव हो गया। क्योंकि उसे कुएं में पानी मिल गया था। इस बात से पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ पडी। अब रामलाल को पानी भरने के लिए दूसरे गाँव जाने की जरूरत नहीं थी। उस गाँव के लोगों ने रामलाल की मेहनत और सफलता को खूब सराहा।

नैतिक सीख:

आत्मविश्वास और सामूहिक प्रयास असंभव कार्य को भी संभव बना देते हैं।

3. मेहनत से बदली गरीबी:

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एक गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी को दूर करने के लिए संत हरीदास के पास गया। उसने महात्मा से आशीर्वाद की कामना करते हुए कहा, “हमारी गरीबी दूर हो जाए।” लेकिन संत हरीदास उस व्यक्ति से कुछ नहीं कहा। जबकि, अन्य लोगों को आशीर्वचन देते हुए कहते थे – “धनवान बनो, लक्ष्मी आपके घर में वास करें।” गरीब व्यक्ति अगले दिन फिर से संत हरीदास से आशीर्वाद लेने के लिए उनके आश्रम में आया।

लेकिन, उस दिन भी हरीदास बिना कुछ बोले उससे आगे चले गए तथा अन्य लोगों को अपना आशीर्वाद देते हैं। गरीब व्यक्ति सोचता हैं कि महात्मा जी मुझे क्यों आशीर्वाद नहीं दे रहे हैं। बल्कि वहाँ बैठे अन्य लोगों को कहते हैं – “धनवान बनो, आपके घर में लक्ष्मी का वास हो”। अब वह गरीब व्यक्ति महात्मा जी के पास जाना छोड़ दिया।

एक दिन संत हरीदास कही से प्रवचन देकर वापस अपने आश्रम को जा रहे थे। बीच रास्ते में उन्हें वही गरीब व्यक्ति मिला। जोकि, ठेले पर सब्जियाँ बेच रहा था। अपने पास संत हरीदास को देखकर गरीब व्यक्ति ने महात्मा जी के पैर छूए और आशीर्वाद की कामना की। महात्मा जी ने उसे अपने मुखर शब्दों से कहा “धनवान बनो, लक्ष्मी आपके घर में वास करें!”

उस व्यक्ति ने संत हरीदास से पूँछा, “महाराज! जब मैं आपके आश्रम में आता था तो आप मुझे आशीर्वाद नहीं देते थे। आज आपने बिना मांगे आशीर्वाद दे दिया।” महात्मा जी ने उसे समझाते हुए कहा, “मुझे पता था कि तुम गरीब हो, तुम्हारे पास लक्ष्मी नहीं हैं। जिसका प्रमुख कारण तुम्हारा आलसी होना था। तुम मेहनत करने से भागते थे। इसलिए लक्ष्मी तुम्हारे पास नहीं रहती थी।

अब तुम मेहनत कर रहे हो जिसके कारण तुम्हारे पास धन का आना शुरू हो चुका हैं। महात्मा जी की बातों को सुन वह व्यक्ति अपने द्वारा किए गए आलस के लिए अपने आप को कोसता हैं। महात्मा जी को वचन देता हैं। “अब मैं अपने जीवन में आलस को कभी भी आने नहीं दूंगा तथा अपनी मेहनत के बल पर पैसे कमाऊँगा। महात्मा जी उसको कहते हैं- “धनवान बनो, आपके घर में लक्ष्मी वास करें” कह कर चले गए।”

नैतिक सीख:

आलस सफलता का सबसे बड़ा शत्रु है।

4. छोटी दुकान से बड़े व्यापार तक का सफर:

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किसी गाँव में राजू नाम का एक लड़का रहता था। जिसकी उम्र लगभग दस साल रही होगी। राजू एक गरीब परिवार से था। लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे। उसकी सोच बहुत ऊंची थी। वह एक बड़ा व्यापारी बनना चाहता था। लेकिन उसके पास न तो बहुत पैसे थे और न ही उसका कोई मार्गदर्शन करने वाला था।

एक दिन राजू अपने गाँव के किनारे लगे एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था। वह उदास था, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा हैं। एक बूढ़ा व्यक्ति उसी रास्ते से गुजर रहा था। उसने देखा कि राजू मायूस होकर सिर झुकाए पेड़ के नीचे बैठा हैं।

बूढ़ा व्यक्ति राजू के पास आया। उसने पूछा, क्या बात हैं बेटा! तुम बहुत उदास लग रहे हो। राजू ने कहा, “बाबा मैं जीवन में कुछ करना चाहता हूँ। लेकिन मुझे कोई सही मार्ग दिखाने वाला नहीं हैं न ही मेरे पास पैसे हैं। उस व्यक्ति ने राजू से कहा, “बेटा! सफलता, पैसों और सही मार्ग दिखलाने से नही आती बल्कि सफलता मजबूत इच्छाशक्ति के कारण मिलती हैं।

बूढ़े व्यक्ति ने राजू को एक कहानी सुनाते हुए कहा, “बेटा तुम जिस पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हो यह पेड़ ऐसे ही नहीं बड़ा हुआ हैं। इसने भी बहुत आंधी, तूफान, बारिश और गर्मियों की तपन को झेला हैं तभी आज इतना बड़ा विशाल पेड़ बन सका। ठीक इसीप्रकार से आज तुम अपने जीवन में सघर्ष कर रहे हो।

अगर तुम एक व्यापारी बनान चाहते हो तो कोई भी छोटी-मोटी दुकान खोलकर बैठ जाओ। अब तुम्हें सोचना होगा की उस दुकान को हम बड़ा कैसे करें। देखना तुम्हारी मेहनत और लगन एक दिन जरूर तुम्हें ऊंचाइयों पर ले जाएगी। बूढ़े बाबा की बात राजू को दिल से लग गई। उसी दिन से राजू एक छोटी सी दुकान खोल दी।

राजू अपने अथक मेहनत और प्रयास से बहुत कम समय में उस दुकान को एक बड़े स्टोर के रूप में बदल दिया। अब राजू को हमेशा बाबा की बातें याद रहती। जो उसे प्रेरित करती रहती थी कि सफलता के लिए निरंतर प्रयास और मेहनत चाहिए होती हैं।

नैतिक सीख:

दृढ़ इच्छाशक्ति हर बाधा को अवसर में बदल देती है।

5. दूध बेचने वाले बेटे की सफलता की कहानी:

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रोहन एक चतुर बुद्धिमान और मेहनती लड़का था। वह कभी मुश्किल परिस्थितियों में पीछे नहीं हटता था। बल्कि उसका डटकर सामना करता था। रोहन के पिता दूधिया का काम करते थे। वे घर-घर जाकर दूध पहुँचाते थे। रोहन अपनी पढ़ाई से समय निकालकर अपने पिता की मदद करता था। अचानक कुछ समय बाद उसके पिता की मृत्यु हो गई। अब घर की जिम्मेदारी रोहन पर आ चुकी थी।

यहाँ देखें: प्रेरणादायक कहानी हिन्दी में

लेकिन रोहन इन सभी मुश्किलों को चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उसने गाय और भैंस के दूध को बेचना शुरू कर दिया। देखते-देखते उसके ग्राहक दिन-प्रतिदिन बढ़ते गए। एक समय ऐसा आया कि उसके दूध की मांग अधिक बढ़ गई। उसने भैंस के ताबेला को बड़ा बना दिया। अब रोहन दूध बेचने के अलावा डेयरी उत्पाद जैसे: दूध, दही, मक्खन, घी आदि बेचना शुरू कर दिया।

रोहन अपने दिमाग में पिता की बताई एक बात हमेशा ध्यान में रखता था कि हमें कभी भी गुणवत्ता से समझौता नहीं करना हैं। पिता के इसी मंत्र ने रोहन को उचाइयों के शिखर पर पहुँचा दिया। इस तरह रोहन ने साबित कर दिया कि अथक प्रयास और मेहनत के बल पर उचाइयों पर पहुँचा जा सकता हैं।

नैतिक सीख:

गुणवत्ता और मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है।

6. जादुई छड़ी नहीं, मेहनत करती है कमाल:

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रिंकू अपने परिवार का एकलौता बच्चा था। उसका ध्यान खेलकूद में अधिक रहता था। जिसके कारण उसके माता-पिता बहुत अधिक चिंतित रहते थे। वे लोग रिंकू को कई बार समझा चुके थे कि पढ़ाई-लिखाई में भी ध्यान दिया करो। लेकिन, वह अपने माता-पिता की बातों को टाल देता था।

एक दिन सुबह-सुबह रिंकू के पापा उसे समझाते हुए कहा- “बेटा कल तुम्हारे स्कूल से फोन आया था।” तुम स्कूल में मन लगा कर पढ़ाई क्यों नहीं करते हो? रिंकू अपने पापा से सॉरी बोलकर अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए निकल गया। रिंकू की मम्मी के दिमाग में एक विचार आया। उसने उसके टेबल पर एक छड़ी और चिट्ठी रख दी।

जब रिंकू वापस घर को लौटा तो उसने अपनी टेबल पर रखी चिठ्ठी खोलकर देखी तो उसमें लिखा था। “प्रिय रिंकू! मुझे पता हैं कि तुम्हारा मन पढ़ाई में नहीं लग रहा हैं। लेकिन तुम घबराओ मत, तुम इस जादुई छड़ी को अपने पास रखकर पढ़ाई करोगे तो तुम्हें सब कुछ याद हो जाएगा और अपनी कक्षा में प्रथम भी आओगे।” – तुम्हारी प्यारी दीदी!

उस दिन से रिंकू उस छड़ी को अपने साथ लेकर जीतोड़ मेहनत करने लगा और वह जो भी पढ़ता उसे याद भी हो जाता था। इस तरह से उसका आत्मविश्वास और बढ़ने लगा। इस बार उसने अपनी कक्षा में प्रथम स्थान भी हासिल किया। परीक्षा परिणाम लेकर वह अपनी माँ के पास आकर कहा- “देखो मम्मी मैंने इस जादू की छड़ी की वजह से अपनी कक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया हैं।

उसकी माँ ने कहा- “यह कोई जादू की छड़ी नहीं हैं यह एक मामूली छड़ी हैं, जिसे मैंने तुम्हें सुधारने के लिए रखा था। तुमने अपनी मेहनत के बल पर अपनी कक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया हैं। रिंकू ने कहा- “माँ मैं समझ गया, मेहनत से सफलता मिलती हैं, न की जादू की छड़ी से। अब से मैं अपनी पढ़ाई में और अधिक मेहनत करूँगा।”

नैतिक शिक्षा:

सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।

7. ईंट के भट्टे से सपनों की उड़ान तक:

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रोहन एक गरीब परिवार में पैदा हुआ था। उसके पिता ईंट के भट्टे पर मजदूरी किया करते थे। उसकी माँ अक्सर बीमार रहती थी। उसके दो छोटे भाई-बहन भी थे। रोहन की उम्र लगभग बारह साल रही होगी। वह अपने माता-पिता की भरसक मदद करने की कोशिश करता था। एक दिन उसके पिता सुबह-सुबह जल्दी काम पर निकल गए। जिसके कारण वे दोपहर का खाना नहीं ले जा सके।

रोहन दोपहर में खाना लेकर अपने पिता के पास गया। वह ईंट के भट्टे पर अपने पिता के साथ खाना खा ही रहा था कि एक चमचमाती कार उसके सामने आकर रुकी। उस कार से एक व्यक्ति उसकी पत्नी और दो बच्चे निकले। उन्हें देख रोहन आश्चर्यचकित हो उठा। रोहन ने अपने पिता से पूछा, “पापा इस कार में कौन हैं। रोहन के पिता ने कहा, “बेटा वे इस भट्टे के मालिक हैं।” उनके साथ उनकी पत्नी और बच्चे हैं। उसने फिर पूछा, “हमारे पास ऐसी कार क्यों नहीं हैं।”

उसके पिता ने अपने बेटे को समझाते हुए कहा, “हम गरीब हैं, वे अमीर हैं। इसलिए वे कार में चलते है और हम मजदूरी कर रहे हैं।” इस तरह से रोहन रोटी को अपने हाथ में पकड़े हुए भट्टे के मालिक के बारें में कई सवाल पूछता रहा। उसे समझ में आ गया कि सफलता का मूल मंत्र क्या हैं। उसने उसी दिन से अपना लक्ष्य निर्धारित करके अथाह मेहनत करना शुरू कर दिया।

उसके पास पढ़ाई ही एक मात्र साधन से जिससे वह कुछ बड़ा कर सकता था। रोहन अब पूरी तरह से पढ़ाई में खो चुका था। उसे खाने पीने तक का बिल्कुल ध्यान नहीं रहता था। देखते-देखते रोहन अपने से दो-तीन क्लास आगे की सारी किताबों को पढ़कर खत्म कर चुका था। धीरे-धीरे वह अपने स्कूल में सबसे होनहार बच्चा बन चुका था। उसकी महेनत और लगन देख उसके अध्यापक उसे बहुत प्रोत्साहित करते थे।

इस तरह से उसने अपनी पढ़ाई पूरी कर अपने आप को सफलता की बुलंदियों पर खड़ा कर दिया। एक दिन वह अपने बचपन में ईंट के भट्टे पर देखी कार खरीदकर उसी भट्टे पर गया और उस भट्टे के मालिक का बहुत आभार व्यक्त किया। उसने सारी कहानी उस मालिक को सुना दिया। मालिक ने कहा, “आज तुमने साबित कर दिया कि अगर किसी के अंदर कुछ करने की दिली इच्छा हो तो वह इस दुनिया की कोई भी चीज हासिल कर सकता हैं।

कहानी से सीख:

सही दिशा में की गई मेहनत सफलता का रास्ता बनाती है।

8. मेहनत का सही मतलब:

यह बात बहुत ज्यादा पुरानी नहीं हैं। जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। मेरे पापा गाँव के रोहित भैया के पास ट्यूशन के लिए जाने को कहा। अगले दिन से मैं ट्यूशन पढ़ने जाना शुरू दिया। मुझे आते-जाते देख मोहल्ले की आंटी, अंकल, बड़े भैया और दीदी सभी लोगों बार-बार एक ही सवाल पूछ रहे थे- “मुकेश क्या तुम पढ़ाई में कमजोर हो जो ट्यूशन पढ़ने जा जाते हो?” लेकिन मैंने किसी को जबाब नहीं दिया। मैं चुपचाप घर लौटा आया और माँ की गोद में सिर रखकर बहुत रोया कि सब मुझे पढ़ाई में कमजोर कह रहे हैं।

उस दिन से मैंने रोहित भैया के पास जाना बंद कर दिया। और मैं खुद अपनी अपनी पढ़ाई करने लगा। मुझे जो भी समझ में नहीं आता था। उसे मैं अपने स्कूल के अध्यापक से पूछता था। यही वह कारण हैं कि मैंने अपने दोनों बोर्ड परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उस समय ट्यूशन जाकर पढ़ना शर्म की बात मानी जाती थी। आज ट्यूशन जाना शर्म की बात नहीं गौरव की बात समझी जाने लगी है।

आजकल ट्यूशन क्लासेस का चलन बढ़ता जा रहा है। माता-पिता और छात्र की यह सोच बनती जा रही है कि बिना ट्यूशन के टॉप पर पहुंचा नहीं जा सकता। लेकिन, हकीकत यही है कि कितनी भी ट्यूशन क्लासेस जॉइन की जाए। लेकिन, बिना सेल्फ स्टडी या मेहनत के अच्छे परिणाम प्राप्त कर पाना आसान नहीं है।

इससे ज्यादा महत्व इस बात को दिया जाना चाहिए की पढ़ाई का तरीका क्या है। पढ़ाई के लिए सही तरीका अपनाया जाना चाहिए। अगर सही तरीके से यदि अध्ययन किया जाए तो परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक ही होगा। स्वयं अध्ययन करने का क्रमबद्ध तरीका क्या होना चाहिए? इस पर विचार करें। 

और भी देखें: शिक्षाप्रद कहानियाँ

पढ़ाई विद्यार्थी जीवन का ऐसा हिस्सा हैं, जहाँ भविष्य की तैयारी होती हैं। इसलिए, इसे सही तरीके से पूरा करना हर विद्यार्थी की पहली जिम्मेदारी हैं। और यह तभी संभव हैं, जब पूरे वर्ष सही तरीके से पढ़ाई की जाए। सफलता-असफलता हमारे द्वारा की गई मेहनत का फल हैं।

जिनका कर्म में विश्वास होता हैं वे फल की चिंता नहीं करते। ‘मेहनत के बिना सपने पूरे नहीं होते।’ श्रम के बिना कुछ हासिल नहीं होता। सोचो, बीज को भी अंकुरित होने के लिए हमें नियमित खाद-पानी देना पड़ता हैं। इसके बिना बीज मर जाएगा। सफलता विश्वास से शुरू होती हैं। आविश्वास पर खत्म हो जाती हैं।

कहानी से सीख:

आत्मविश्वास और नियमित अध्ययन सफलता की कुंजी हैं।

9. पंचर की दुकान से सफलता का सबक

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सुरेश के पिता साइकिल का पंचर बनाने का काम किया करते थे। सुरेश कभी-कभी अपने पिता की दुकान पर जाया करता था। दुकान पर बैठे-बैठे उसके पिता उसे व्यवहारिक ज्ञान दिया करते थे। जिससे उसकी अच्छे-बुरे में पहचान करने की समझ विकसित होती थी। इसके साथ-साथ वह लोगों की बोली भाषा और उनके रहन-सहन को भी सीखता था। सुरेश बहुत ही होनहार बच्चा था। वह किसी भी चीज को एक बार में ही सीख जाता था।

अपने पिता के साथ रहते हुए उसने साइकिल पंचर बनाना भी सीख लिया था। एक दिन उसके पिता की तबीयत खराब हो गई। जिसके कारण वे दुकान पर नहीं जा सके। सुरेश शाम को जब स्कूल से घर आया तो उसने देखा कि उसके पिता की तबीयत ठीक नहीं थी। उसने सोचा क्यों न मैं ही जाकर दुकान खोल देता हूँ। वह अपनी दुकान खोलकर बैठा था। तभी एक व्यक्ति सुरेश के पास आया।

उसने कहा, “मेरी साइकिल में पंचर लगा दो, सुरेश उसकी साइकिल ठीक करने लगा।” दोनों आपस में बात कर रहे थे कि एक व्यक्ति कार से बगल वाली दुकान पर कुछ समान लेने के लिए रुका। अचानक दोनों निगाह मिली, दोनों पास आकर गले मिले और खूब सारी बातें की। कुछ समय बाद जब वह व्यक्ति अपनी कार से चला गया।

दूसरे व्यक्ति ने पूछा क्या आपने मेरी साइकिल में पंचर लगा दिया। सुरेश ने कहा दो मिनट और लगेंगे। तभी सुरेश ने कहा भैया एक बात पूछूँ। हाँ,सुरेश पूँछों क्या पूछना चाहते हो। सुरेश ने कार वाले व्यक्ति के बारें में पूछा। उस व्यक्ति ने कहा, “वह मेरे बचनपन का दोस्त हैं। जोकि मेरे साथ पढ़ता था।” वह पढ़ने में बहुत तेज था आज वह किसी विदेशी कंपनी में काम करता हैं। वह अधिक पैसे कमाता हैं।

काश! बचपन में मैं भी मेहनत किया होता तो आज साइकिल से नहीं मैं भी कार से घूमता। उसकी बातें सुरेश की दिमाग में जाकर बैठ गई। उस दिन से सुरेश काम के साथ-साथ पढ़ाई में भी और अधिक मेहनत करने लगा। इस तरह से एक सुरेश भी अपनी बनाए लक्ष्य को प्राप्त कर लिया।

नैतिक सीख:

शिक्षा जीवन का सबसे मूल्यवान निवेश है।

10. रस्सी के निशान से मिली जीवन की सीख:

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बहुत समय पहले की बात हैं गुरुकुल में बहुत से बच्चे शिक्षा लेने आते थे। उस गुरुकुल में मंगेश नाम का एक सहपाठी भी शिक्षा ले रहा था। लेकिन उसका मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था। जिसके कारण उसे आचार्य के सामने लज्जित होना पड़ता था। जबकि, उसके साथ के सहपाठी उसे बुद्धू, मूर्खराज कहकर बुलाते थे। जब कक्षा में गुरुजी उसे समझाते थे तो उसे कुछ समझ नहीं आता था।

जिसका प्रमुख कारण यह था कि वह अपने आपको सबसे कमजोर समझता था। एक दिन जब बहुत समझाने के बाद भी उसे कुछ समझ नहीं आ रह था तो आचार्य ने कहा- “बेटा मंगेश जब तुम्हारा मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता तो तुम गुरुकुल छोड़कर अपने गाँव चले जाओ। वहाँ पर अपने माता-पिता के काम में भी हाथ बंटा सकते हो।

मुझे ऐसा लगा रहा हैं कि तुम्हारे भाग्य में शिक्षा नहीं लिखी हुई हैं। मंगेश अपने गुरुदेव के चरणों को स्पर्श करता हैं और वह वापस अपने गाँव की तरफ चल पड़ा। कुछ दूर पैदल चलने के बाद उसे थकान और भूखा महसूस होने लगी। उसे एक कुंआ दिखाई दिया। वह सोचता हैं कि चलो मेरे पास जो सत्तू हैं उसे यहीं पर खा लेता हूँ और कुंए से पानी भी पी लूँगा।

उसी कुंए से एक औरत पानी भर रही थी। मंगेश की निगाह कुएं कि जगत पर हुए गड्ढे पर पड़ती हैं। वह उस औरत से कहता हैं कि आपने घड़े रखने के लिए अच्छे गड्ढे बनवाएं हैं। औरत उसकी बात को सुनकर कहती हैं। जगत पर यह गड्ढे बनाए नहीं गए हैं। बल्कि यह घड़े को रखते-रखते बन गए हैं। इसी प्रकार से आप इस पत्थर को देखो जिसपर रस्सी के आते-जाते निशान बन गए हैं।

मंगेश ने सोचा, जब मिट्टी का घड़ा रखते-रखते यहाँ पर गड्ढा बन सकता हैं तो मैं किसी भी चीज को बार-बार अभ्यास करने से उसे क्यों नहीं सीख सकता। वह वापस फिर से गुरुकुल गया। वह अपने मन की बात को अपने गुरुदेव को बताता हैं। इस तरह से वह फिर से विद्या सीखना शुरू कर दिया। आगे चलकर वह बालक मंगेश एक बहुत बड़ा संस्कृत का विद्वान बना।

नैतिक सीख:

निरंतर अभ्यास साधारण व्यक्ति को भी असाधारण बना देता है।

सभी कहनियों से मिलने वाली सीख:

इन 10 motivational kahani in hindi से यह बात स्पष्ट होती है कि सफलता किसी एक की बपौती नहीं है। चाहे आप एक गरीब मोची के बेटे हों या गाँव के एक साधारण धोबी – अगर आपके अंदर मेहनत करने की जिद्द है, लक्ष्य तय करने का हौसला है, और आत्मविश्वास है, तो कोई भी मुश्किल आपको रोक नहीं सकती। जैसा मंगेश ने सीखा “निरंतर अभ्यास पत्थर को भी घिस देता है।” आज से ही अपना लक्ष्य तय करें और मेहनत में जुट जाएँ – सफलता आपका इंतजार कर रही है।

🙋‍♂️ FAQs – Motivational kahani in hindi

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