ईमानदारी, दया और परिवार पर आधारित 7 हिंदी कहानियाँ – जो सिखाएं असली जीवन का मूल्य

📅 Published on June 28, 2026
🔄 Updated on June 23, 2026

जीवन में सफलता केवल पैसे या पद से नहीं मापी जाती — असली सफलता वह है जब हम सही मूल्यों के साथ जीते हैं। इस संग्रह में 7 ऐसी moral values story in Hindi प्रस्तुत की गई हैं जो बताती हैं कि ईमानदारी कैसे इंसान को ऊँचाई पर ले जाती है, दया का स्वभाव दिलों पर कैसे राज करता है, लालच का रास्ता कहाँ खत्म होता है, और परिवार के बुज़ुर्गों की अहमियत क्या होती है। ये कहानियाँ बच्चों के चरित्र निर्माण और बड़ों के आत्मचिंतन दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी हैं।

1. ऐसी जिंदगी का क्या फ़ायदा:

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एक बार की बात हैं, एक व्यापारी अपने व्यापर को बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे गाँवों में कंपनियां खोल रहा था। क्योंकि, गाँव में उसे कम तनख़्वाह लेने वाले मजदूर भी आसानी से मिल जाते थे। एक दिन व्यापारी कंपनी खोलने के लिए किसी ऐसे गाँव में जा रहा था। जहाँ पर उसे नदी में नाव के सहारे जाना था।

अगर वह, सड़क के रास्ते जाता तो उसे लंबा सफर तय करना पड़ता। उसने सोचा समय बहुत कीमती हैं। क्यों न मैं नदी के रास्ते नाव से निकल जाऊँ। व्यापारी नदी के किनारे जाकर देखा तो एक नाव वाला जिसे (मल्लाह) कहते हैं। वह चप्पू और नाव लेकर नदी के तट पर बैठा था। व्यापारी मल्लाह के पास गया।

उसने कहा, “अरे भाई! क्या तुम मुझे नदी के उस पार ले चलोगे? मल्लाह ने कहा, क्यों नहीं साहब! मैं तो आपकी सेवा के लिए ही बैठा हूँ।” व्यापारी नाव में बैठ गया, मल्लाह अपने चप्पू से नाव को पानी चलाने लगा। दूसरा किनारा दूर था, व्यापारी मल्लाह से बातें करते हुए जा रहा था। उसने मल्लाह से कहा, “भाई क्या तुम, मुझे पहचानते हो? मल्लाह ने कहा “नहीं साहब! मैं आपको नहीं पहचानता।”

व्यापारी ने हँसते हुए कहा, “तुम अखबार नहीं पढ़ते क्या? आए दिन मेरी फ़ोटो अखबार में छपती रहती हैं।” मल्लाह ने कहा, “साहब! जब मैं छोटा था तो मेरे माता-पिता जल्दी ही गुजर गए। जिसके कारण मैं पढ़ाई नहीं कर सका।” व्यापारी ने हँसते हुए कहा, “अच्छा! तो तुम अनपढ़ हो? ‘ऐसी जिंदगी का क्या फ़ायदा।’ उसकी बातों को सुनकर मल्लाह को बुरा लगा।

व्यापारी ने कहा, क्या तुम्हें पता हैं, मैं तुम्हारे गाँव के पास खाली पडे जमीन पर अपनी कंपनी लगाने के सिलसिले में जा रहा हूँ? एक दिन मैं तुम जैसे लोगों को नौकरी दूँगा। हमारी कंपनी यहाँ पर नदी के पानी से मिनरल वॉटर बनाएगी। उसकी बातों को सुनकर मल्लाह ने कहा, “साहब यह मिनरल वॉटर क्या होता हैं।” मल्लाह की बातों को सुनकर व्यापारी चिढ़ सा गया। उसने कहा, “तुम्हें मिनरल वॉटर के बारें में नहीं पता।”

मल्लाह ने कहा, “नहीं साहब मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता।” तुम शहरों में देखे होंगे। एक लीटर की छोटी-छोटी बोतल में जो पानी बिकता हैं। उसे मिनरल वॉटर कहते हैं। यह पानी पीने में बहुत अच्छा और लाभदायक होता हैं। मल्लाह ने व्यापारी से कहा, “साहब! मैं तो कभी शहर गया ही नहीं इसलिए ऐसे बोतल में पानी बिकते हुए कभी नहीं देखा।” व्यापारी उसे आश्चर्य से देखा और उसके ऊपर जोर-जोर से हँसते हुए कहा, फिर तो ‘ऐसी जिंदगी का क्या फ़ायदा।’

व्यापारी की बातों को सुनकर मल्लाह बहुत दुखी हुआ। उसे सच में लगने लगा की मेरी जिंदगी बेकार हैं। मुझे इस नदी और नाव के अलावा कुछ और नहीं पता, वह चिंतित हो उठा। उसने अपना चप्पू चलाना भी बंद कर चुका था। तभी उसकी नाव एक बडे टीले से टकरा गई। जिससे उस नाव में पानी भरने लगा। उस स्थान पर नदी की गहराई बहुत अधिक थी। उसे समझ आ गए कि यहाँ से नाव के साथ निकल पाना असंभव हैं।

मल्लाह, घबराते हुए तेज आवाज में व्यापारी से कहा, “साहब नाव डूबने वाली हैं, आपको तैरना तो आता हैं ना?” व्यापारी ने कहा, “तुम यह क्या कह रहे हो? मुझे बिल्कुल तैरना नहीं आता” मल्लाह ने हँसते हुए कहा, “साहब ऐसी जिंदगी का क्या फ़ायदा” आपको तैरना नहीं आता। व्यापारी उसकी बातों को सुनकर लज्जित महसूस करने लगा। व्यापारी ने कहा, “मैं तुम्हें दुनिया का हर वह चीज दूँगा जो तुम माँगोगे। प्लीज! मेरी जान बचा लो।”

मल्लाह ने कहा, “साहब, घबराओ मत! मुझे और कुछ नहीं आता लेकिन, मुझे तैरना अच्छे से आता हैं। मुझ पर विश्वास रखो, मैं आपको डूबने नहीं दूँगा।” मल्लाह व्यापारी को डूबने से बचा लिया। वह बाहर आकर मल्लाह से कहा, “मुझे आपके साथ ऐसी बातें नहीं करनी थी। जिससे तुम्हें दुख पहुचे। आपका यह ऐहसान मेरे ऊपर कर्ज रहेगा।

नैतिक सीख:

हर इंसान के अंदर एक न एक अच्छाई जरूर होती है।

2. नीलू और उसके दादा-दादी:

नीलू मुंबई में अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ रहता था। नीलू को अपने दादा-दादी से अत्याधिक लगाव हो गया था। वह अपने दादा-दादी के बिना नहीं रह पता था। नीलू के दादा को भी अपने पोते से अधिक लगाव था। पूरा परिवार खुश रहता था। लेकिन, नीलू की मम्मी को लगने लगा की उसके दादा-दादी के रहने से उनकी स्वतंत्रता खत्म हो गई हैं।

नीलू की मम्मी सप्ताह में एक बार बाहर किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने जाना चाहती थी। जोकि, दादा-दादी को पसंद नहीं था। उनका मनना था कि घर का फ्रेश खाना, खाना चाहिए। इसलिए, नीलू की मम्मी अपनी मर्जी से जिंदगी नहीं जी पा रही थी। किसी तरह से उन्होंने अपने पति को मना कर दादा-दादी को गाँव भिजवा दिया। उस दिन जब नीलू स्कूल से घर आया तो उसने घर पर दादा-दादी को नहीं देखा।

उसने अपनी मम्मी से उनके बारें में पूछा। उसकी मम्मी ने कहा, “बेटा! आपके दादा-दादी को गाँव में कुछ काम हैं। इसलिए, वे वापिस गाँव चले गए हैं। कुछ दिन बाद फिर आ जाएंगे। धीरे-धीरे गाँव में दादा-दादी को कई महीने बीत गए। उन्हें जब भी अपने पोते की याद आती वे फोन पर बात कर लेते थे। नीलू को भी दादा-दादी की बहुत याद आती थी।

रविवार के दिन नीलू घर पर अपने कमरे में मायूस बैठा हुआ था। रसोई से उसकी मम्मी उसे खाने के लिए आवाज लगाए जा रही थी। लेकिन, वह अपनी मम्मी की आवज पर ध्यान नहीं दे रहा था। नीलू की मम्मी रसोई से उसके कमरे में आकर देखती हैं कि नीलू मायूस बैठा हैं। मम्मी ने पूछा, ‘नीलू क्या हुआ? मायूस क्यों बैठे हो’? मैं तुम्हें खाना, खाने के लिए बुला रही थी।

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नीलू ने अपनी मम्मी से कहा, “दादा-दादी कब आएंगे? आपने कहा था, “गाँव में कुछ काम हैं उसे करके जल्दी वापिस आ जाएंगे, लेकिन अभी तक नहीं आए।” मुझे दादा-दादी की बहुत याद आ रही हैं। नीलू की मम्मी ने गुस्से से कहा, “अब तुम्हारे दादा-दादी कभी वापिस नहीं आएंगे। वे अब गाँव में ही रहेंगे।” यह बात सुनकर नीलू की आँखों में आँसू भर आए। क्योंकि, वह अपने दादा-दादी से बहुत प्यार करता था।

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लेकिन, वह अपनी मम्मी का विरोध भी नहीं कर सकता था। नीलू बहुत ही होनहार और मेहनती बच्चा था। वह हर काम को बड़ी मेहनत और लगन से करता था। एक दिन शाम को नीलू कुर्सी मेज पर बैठकर पढ़ाई कर रहा था। उसके पास उसकी मम्मी भी बैठी थी।

तभी उसके पापा ऑफिस से आए और देखा कि नीलू पढ़ाई कर रहा था। वे खुश होकर बोले, “नीलू बेटा! इस बार तुम कक्षा में प्रथम आए तो हम तुम्हें तुम्हारी पसंद की चीज दिलाएंगे।

नीलू ने कहा, “ठीक हैं! जब मैं अपनी कक्षा में प्रथम आऊँगा तो आपको बताऊँगा कि मुझे क्या चाहिए। कुछ दिन बाद परीक्षा हुई, नीलू ने जमकर मेहनत की। परीक्षा का परिणाम आया और नीलू ने परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया। नीलू को स्कूल में सम्मानित किया गया। उसके अध्यापक ने कहा- “नीलू बहुत होनहार बच्चा हैं। एक दिन जरुर अपने माता-पिता और इस शहर का नाम रोशन करेगा।”

शाम को जब नीलू स्कूल से घर आया तो देखा उसका घर सजा हुआ था। उसके कुछ दोस्त और माता-पिता ने घर पर उसके स्वागत के लिए अच्छी तैयारी की थी। सभी ने नीलू का भव्य स्वागत किया। नीलू की मम्मी बोली, “नीलू बेटा हमने तुमसे वादा किया था कि जब तुम प्रथम आओगे तो हम तुम्हें तुम्हारा मनचाहा उपहार देंगे। बताओ तुम्हें क्या चाहिए।

नीलू ने अपने मम्मी-पापा से पूछा- “क्या आप सच में मुझे मेरी पसंद का उपहार देंगे, जो मुझे चाहिए?” ‘हाँ,… हाँ क्यों नहीं बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?” नीलू ने अपने दोनों हाथों को जोड़कर कहा, “अगर आप मुझे कुछ देना चाहते हैं तो, आप दादा दादी को वापिस घर पर बुला लीजिए।” उन्हें गाँव में कितनी मुश्किलें उठानी पड़ रही होगी। वहाँ पर उनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं हैं।

नीलू की बात सुनकर उसके मम्मी-पापा का सिर शर्म से नीचे झुक गया। उन्होंने नीलू से वादा किया कि कल वे दोनों दादा-दादी को लेने गाँव जाएंगे। अगले दिन नीलू के पापा-मम्मी, दादा-दादी को गाँव से लेकर वापिस शहर लेकर आ गए। नीलू अपने सामने दादा-दादी को देख खुशी से उछल पड़ा और जाकर उनके गले से लग गया। नीलू की खुशी देख उसके माता पिता की आँखें भर आई।

नैतिक सीख:

हमारे बुजुर्ग घर में एक वृक्ष के समान होते हैं। जिनकी छाया में बैठकर हमें ठंडक मिलती हैं।

3. कुछ भी असंभव नहीं हैं:

सुंदरपुर एक छोटा और खुशहाल गाँव था। उस गाँव के लोग हमेशा एक दूसरे की मदद करने के लिए तैयार रहते थे। क्योंकि उस गाँव का हर व्यक्ति एक दूसरे को अपने परिवार जैसे मानते थे। उसी गाँव में धरमा नाम की एक औरत अपने पाँच साल के बच्चे के साथ रहती थी। उसके बच्चे का नाम विशाल था। धरमा का उस बच्चे के अलावा उसके परिवार में कोई नहीं था। बीमारी के कारण उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी।

धरमा अपने बच्चे को एक नेक इंसान बनाना चाहती थी। जिसके लिए वह सुबह शाम अपने गाँव से दूर शहर जाकर घरों में झाड़ू-पोंछा का काम करती थी। धीरे-धीरे उसका बच्चा बड़ा हुआ। धरमा उसे अच्छे-से-अच्छे स्कूल में पढ़ना चाहती थी। एक दिन विशाल अपनी माँ से कहा, “माँ मुझे पढ़ाई करना अच्छा नहीं लगता, मैं पढ़ाई नहीं करूंगा। मैं आपके साथ काम करूंगा।”

उसकी बातों को सुनकर धरमा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे ऐसे लगा मानो उसके उम्मीदों पर किसी ने पानी फेर दिया हो। लेकिन धरमा बहुत ही साहसी औरत थी। वह अपने बेटे को पढ़ाई के बारे में बताई। लेकिन उसने एक ही जिद्द लगा रखी थी कि मैं स्कूल नहीं जाऊंगा। उसकी माँ ने कहा ठीक हैं! आज स्कूल मत जाओ घर बैठकर सोचो, तुम्हें स्कूल क्यों नहीं जाना हैं।

उसकी माँ काम पर चली गई। पूरे दिन उसका काम में मन नहीं लगा। जिसके कारण उसे मालकिन की बात भी सुननी पड़ी। धरमा बिल्कुल खोई-खोई लग रही थी। वह शाम को घर आकर अपने बेटे से पूछी क्या हुआ विशाल क्या फैसला लिया तुमने। विशाल ने कहा, मैंने फैसला कर लिए हैं। मैं आपके साथ काम पर जाऊंगा, स्कूल नहीं जाऊंगा। अगले दिन विशाल को उसकी माँ अपने साथ शहर काम पर ले गई।

विशाल एक चौक पर खड़ा था। उसके साथ बहुत सारे मजदूर काम की तलाश में खड़े थे। जब भी कोई व्यक्ति आता तो उसे मजदूर यह कहते हुए घेर लेते कि “मुझे ले चलो, मुझे ले चलो।” विशाल की उम्र कम थी इसलिए उसे कोई काम पर ले जाने को तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी मुश्किल से एक व्यक्ति ईटें उठवाने के लिए विशाल को अपने साथ ले गया।

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पूरे दिन उसने विशाल से काम करवाया शाम को आते समय दस रुपये दिए। विशाल घर आकर खूब रोया। उसने उसी दिन उसने निर्णय कर लिया चाहे कुछ भी हो जाए स्कूल जाना नहीं छोड़ूँगा। अगले दिन से विशाल स्कूल जाना शुरू कर दिया। वह खूब मेहनत करता था। धीरे-धीरे विशाल की गिनती उसके क्लास के सबसे तेज छात्रों में होने लगी।

उसकी मेहनत और लगन देखकर उसे आगे की पढ़ाई के लिए उसकी माँ ने अपने गहने और जमीन तक बेच दिए। विशाल पढ़ाई में सबकुछ लगा चुका था। वह किसी भी परिस्थितियों में वापस पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता था। आगे चलकर विशाल एक दिन डॉक्टर बना। उसे डॉक्टर बने देख उसकी माँ के दिल को तसल्ली मिली। उसने कहा, “बेटा विशाल आज तुमने कर दिखाया कि इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं हैं।”

नैतिक सीख:

मेहनत के बल पर कोई भी उपलब्धि हासिल की जा सकती हैं।

4. ईमानदार लड़का:

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रोहन नाम का एक लड़का था। जिसकी उम्र लगभग सोलह साल थी। उसके घर में उसकी माँ और एक बहन रहती थी। रोहन अपने घर का खर्च चलाने के लिए गाँव-गाँव में जाकर खिलौने और स्टेशनरी के सामान बेचता था। एक दिन रोहन सामान बेचने किसी गाँव में जा रहा था। बीच रास्ते में उसे कुछ बच्चे दिखाई दिए, जोकि स्कूल जा रहे थे। रोहन ने सोचा क्यों न बच्चों को खिलौने और स्टेशनरी दिखाए।

रोहन उन बच्चों को रोककर उन्हें सामान दिखाने लगा। उन्ही बच्चों में रवि नाम का एक बच्चा था। उसने रोहन से पूछा, “मेरी और तुम्हारी उम्र लगभग सामान हैं, फिर तुम स्कूल क्यों नहीं जाते हो। रोहन ने रवि को सारी बात बता दी। रवि ने कहा, “तुम्हें एक बार हमारे गाँव के सरपंच जी से मिलना चाहिए वे बहुत नेक इंसान हैं। वे जरूर तुम्हें कोई रास्ता बताएंगे।

रोहन रवि के गाँव में ही जा रहा था। गाँव पहुंचकर उसकी मुलाकात उस गाँव के सरपंच से हुई। रोहन ने अपनी सारी कहानी सरपंच जी से बता दी। सरपंच जी ने कहा, “तुम प्रतिदिन कितने पैसे कमा लेते हो।” रोहन ने कहा, “यही कोई सौ रुपये के आसपास।” सरपंच जी ने कहा, “क्या तुम मेरे खेत की रखवाली करोगे, मैं तुम्हें दो सौ रुपये दूंगा। रवि खेत की रखवाली करने के लिए तैयार हो गया।

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उसी रात खेत में कुछ चोर आए। वे खेत में लगे सब्जियां चुराने लगे। रोहन डंडा लेकर खेत की तरफ गया। उसने देखा कि कुछ लोग सब्जियां चोरी कर रहे थे। रोहन ने कड़क आवाज में पूछा, कौन हो तुम लोग? सब्जियां क्यों चोरी कर रहे हो। उन्होंने रोहन को समझाते हुए कहा, “तुम्हारे पहले जो व्यक्ति खेत की रखवाली करता था उसे हम लोग कुछ पैसे देते थे।” तुम भी अपने हिस्से का पैसा ले लिया करो।

रोहन ने कहा, मैं किसी भी प्रकार का रिश्वत नहीं लेता। तुम्हारे लिए अच्छा यही होगा कि सारी सब्जियां यही छोड़कर चले जाओ नहीं तो मैं तुम्हें मार-मार कर लहलुहान कर दूंगा। उसकी कड़क आवाज सुनकर चोर सब्जियां छोड़कर वहाँ से चले गए। अगले दिन रोहन ने सरपंच जी को रात की सारी घटना बता दी। सरपंच जी ने रोहन की बहादुरी के लिए पुरस्कृत किया और उसे कुछ पैसे और भी देना शुरू कर दिया।

नैतिक सीख:

ईमानदारी व्यक्ति को उचाइयों के शिखर पर ले जाती हैं।

5. क्रूर जागीरदार और दयालु बेटा:

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काफी समय पहले की बात हैं। राजपूताना क्षेत्र में मान सिंह नाम का एक जागीरदार था। उसका एक पुत्र था जिसका नाम शेरसिंह था। शेरसिंह बड़ा होनहार और दयालु स्वभाव का था। एक बार राजपूताना में बरसात नहीं हुई, अकाल पड़ गया। किसान जागीरदार को लगान नहीं दे सके।

जागीरदार के कर्मचारियों ने जबरदस्ती किसानों के घरों में जो कुछ भी था वह उठा लाए और किसानों को पकड़कर जागीरदार के सामने पेश किया। शेरसिंह ने देखा की उन गरीब और लाचार किसानों को सताया जा रहा हैं। उन्हें देखकर उसे दया आई। उसने उनकी मदद करने की सोची। शेरसिंह उन दिनों घुड़सवारी सीख रहा था।

जागीरदार अपने बेटे शेरसिंह से कहा- “जिस दिन तुम घुड़सवारी अच्छी तरह सीख लोगों मैं तुम्हें मुँह-माँगा ईनाम दूंगा।” शेरसिंह ने अभ्यास करके घुड़सवारी में निपुणता हासिल कर ली। एक दिन उसने जागीरदार के सामने अपनी घुड़सवारी का प्रदर्शन किया। जागीरदार ने खुश होते हुए कहा- “बेटा! मैं बहुत खुश हूँ, बोलो क्या ईनाम चाहते हो?

शेरसिंह ने कहा- पिताजी! इस वर्ष वर्षा न होने से किसानों के पास खाने को कुछ नहीं हैं तो लगान कहाँ से दे? इन किसानों का लगान माँफ कर दीजिए और हो सके तो इन गरीब किसानों की मदद भी कीजिए। शेरसिंह की बात सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। ये सब तो मैं अभी कर देता हूँ। परंतु बेटा, तुमने अपने लिए तो कुछ नहीं मांगा, कुछ तो मांगों। 

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इस पर शेरसिंह ने कहा- पिताजी! आप प्रसन्न है तो यह नियम बना दें कि जिस वर्ष फसल अच्छी न हो उस वर्ष लगान न लिया जाए। जागीरदार ने ऐसा ही किया, किसानों की जब्त की हुई चीजें लौटा दी और भविष्य में फसल न होने पर लगान न लेने का नियम बना दिया। शेरसिंह जैसे दयालु स्वभाव के लोग दिलों पर राज करते हैं। जबकि, शक्ति वाले लोग डरा-धमका कर क्रूर व्यवहार से लोगों को केवल डरा सकते हैं।

नैतिक शिक्षा:

विनम्र स्वभाव के लोग सभी के दिलों पर राज करते हैं।

6. जल्दी अमीर बनने की लालच:

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अलगू चौधरी का एक बैल मर गया था। खेती-बाड़ी के लिए उसको एक बैल की बहुत जरूरत थी। अतएव एक दिन वह पाँच हजार रुपये लेकर घर से बैल खरीदने के लिए निकला। रास्ते में उसे कुछ ठग मिल गये। उनमें से एक ने उससे कहा- “तुरंत अमीर बनने का एक अच्छा तरीका है।” 

अलगू चौधरी उत्सुक होकर पूछा वह कौन सा तरीका हैं। आओ मेरे साथ- कहकर ठग ने उसे एक ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ जुए का खेल हो रहा था। कई खिलाड़ी वहाँ मौजूद थे। अलगू चौधरी ने देखा, तुरंत कुछ खिलाड़ियों के रुपये दोगने हो गये। तभी ठग ने उससे कहा- “अगर तुम्हारे पास भी रुपये हैं तो अपनी तकदीर को आजमा लो।”

अगर तकदीर ने साथ दिया तो अमीर बनते देर नहीं लगेगी। खेती-बाड़ी करते-करते मर जाओगे, मगर अमीर कभी नहीं बन पाओगे। बस, किसी तरह पेट भर सकोगे। जैसे-तैसे दिन काटेंगे। ठग की बात अलगू चौधरी के दिमाग में बैठ गई। वह बोला- ‘ठीक कहते हो भाई।’ फिर देर क्यों करते हो। निकालो रुपये और आजमा लो अपनी तकदीर! ठग ने उसे प्रेरित किया। 

रुपये निकाल कर अलगू चौधरी जुआ खेलने बैठ गया। शुरू में उसकी जीत होती रही। मनोबल खूब बढ़ गया। खुशी भी हुई, मगर लालच ने उसका पीछा नहीं छोड़ा, नतीजा हुआ कि आखिर में वह सभी रुपये हार गया। खूब पछताया, उसके पास सिर्फ पाँच रुपये बचे थे। 

सिर पीटते हुए वह वहाँ से निकला। समय काफी हो चुका था। उसे ज़ोर से भूख लगी थी। मगर खाने के लिए पास में कुछ नहीं था। आसपास कोई दुकान भी नहीं थी। निराश होकर वह घर लौट रहा था। एक आदमी बेल नामक फल बेचता हुआ उसके करीब से गुजरा उसने उसे रोका दो बेल पाँच रुपए देकर खरीदें।

पास ही एक घने पेड़ की छांव में बैठकर उसने एक बेल खाया। बेल खूब मीठा और स्वादिष्ट था। पास के कुएं पर जाकर उसने हाथ-मुँह धोया। बेल खाकर उसकी भूख शांत हुई। बचा हुआ एक बेल लेकर वह अपने घर पहुँचा। 

तब तक संध्या हो चुकी थी, घर पर उसका दोस्त सोहन इंतजार कर रहा था। अलगु चौधरी की नजर पड़ते ही वह चहक उठा। उसने कहा- “घर में पूछने पर मालूम हुआ कि तुम कोई बैल खरीदने गए हो, मगर देखता हूँ खाली हाथ लौट रहे हो, बैल नहीं मिला क्या?

गया तो था जरूर बैल खरीदने मगर लौटा हूँ एक बेल लेकर। कह कर अलगू चौधरी ने आपबीती सुनाई। सुनकर सोहन जोर से हँसा फिर गंभीर होकर बोला- भाई लालच कभी अच्छा नहीं होता। जुआ खेलना अच्छी बात नहीं है। जो मेहनत और ईमान की कमाई से अमीर नहीं हो पाया, वह जुए से कभी नहीं हो पाएगा। अलगू चौधरी को सोहन की बात को गांठ बांध लिया।

नैतिक शिक्षा:

सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता। उसके लिए मेहनत करनी पड़ती हैं।

7. अमीर और गरीब दोस्त:

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मोहित और सर्वेश दोनों बहुत अच्छे मित्र थे। मोहित के पिता बहुत अमीर थे। जबकि, सर्वेश के पिता उस गाँव के एक किसान थे। मोहित और सर्वेश हमेशा एक साथ रहते थे। जिसके कारण स्कूल में भी उनकी दोस्ती की चर्चा अधिक होती थी। एक बार मोहित और सर्वेश दोनों को एक साथ बुखार आ गया। सर्वेश के पिता उसे गाँव के एक डॉक्टर के पास ले गए।

डॉक्टर ने सर्वेश का चेकअप करके उसे दवाइयाँ दी। डॉक्टर ने उसके इलाज का खर्च 500 रुपए बताया। सर्वेश के पिता डॉक्टर के सामने हाथ जोड़कर कहने लगे हमारे पास कुछ पैसे कम हैं। डॉक्टर ने सर्वेश के पिता से तेज आवाज में कहा- “आगे से पूरा पैसा लेकर आया करो।” इतने में मोहित को लेकर उसके पिता भी आ गए।

मोहित डॉक्टर के पास अपने दोस्त सर्वेश को देखकर उससे बात करना चाहा, लेकिन वह किसी कारण वश अपने दोस्त सर्वेश से बात नहीं कर पाया। मोहित के पिता को देखकर डॉक्टर अपनी सीट से खड़ा होते हुए कहा- “कैसे आना हुआ प्रधानजी? बताओ मैं आपकी कैसी मदद कर सकता हूँ। मोहित के पिता अपने बच्चे को दिखाते हुए कहते हैं- “मेरे बच्चे को कल रात से बुखार आ गया। कृपया आप इसका इलाज करो।”

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डॉक्टर ने कहा- “प्रधानजी आपने यहाँ आने का कष्ट क्यों किया, मुझे संदेशा भिजवा देते तो मैं आपके घर आकर बच्चे को देख लेता। डॉक्टर ने मोहित का अच्छे से इलाज किया। मोहित के पिताजी ने डॉक्टर से दवाइयों और फीस के पैसे पूछे तो डॉक्टर ने पैसा लेने से मना करते हुए कहा- “कोई बात नहीं प्रधानजी आपका बच्चा हमारा बच्चा हैं।”

जब मोहित घर पर आया तो बुखार की हालत में बिना किसी से बताए अपने मित्र सर्वेश के घर जाकर उसका हालचाल लिया। इसके अलावा, उसके पिता को कुछ पैसे भी दिए। जब वह वापस घर लौटा तो उसे अपने मित्र की और चिंता होने लगी। इस तरह से धीरे-धीरे उसकी तबीयत और खराब होती चली गई।

गाँव के डॉक्टर ने उसके पिता को उसे शहर के किसी बड़े अस्पताल में ले जाने की सलाह दी। मोहित के पिता के पास पैसों की कमी नहीं थी। वह अपने बच्चे को एक बड़े अस्पताल ले गए। वहाँ पर डॉक्टर ने बहुत अच्छी तरह से देख-भाल की। लेकिन, मोहित के स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो रहा था। एक दिन मोहित के मित्र सर्वेश ने सोचा कि उसके घर जाकर मैं अपने दोस्त की खबर ले आता हूँ।

उसने मोहित के घर जाकर पता किया तो उसे पता लगा उसका दोस्त ज्यादा बीमार हैं। जिसके कारण वह शहर के एक बड़े अस्पताल में भर्ती हैं। उसी दिन सर्वेश अपने दोस्त से मिलने उस अस्पताल में गया। सर्वेश को स्वस्थ देखकर उसका दोस्त मोहित बहुत खुश हुआ। दोनों एक दूसरे के गले लग गए। इस तरह से दोनों की आँखों में खुशी के आँसू भर आए।

उन दोनों को देख डॉक्टर समझ गया कि अभी तक कोई दवा मोहित को क्यों नहीं ठीक कर पा रही थी। इस तरह से प्रतिदिन सर्वेश अपने दोस्त से मिलने आता रहा। देखते-देखते उसका दोस्त बहुत जल्द ठीक हो गया। जब मोहित अपने पिता के साथ अस्पताल से घर जा रहा थे तो उसके पिता ने डॉक्टर को धन्यवाद किया।

डॉक्टर ने कहा- “धन्यवाद मुझे नहीं, मोहित के दोस्त को दो। जिसके कारण आपका बेटा ठीक हो सका। इस तरह से डॉक्टर ने मोहित के पिता को पूरी बातें बता दी। मोहित के पिता ने सर्वेश को अपने घर बुलाकर कहा- “आज से आपकी पढ़ाई का खर्च मैं उठाऊँगा।” लेकिन तुम दोनों दोस्त ये दोस्ती जीवन पर्यंत निभाना। मोहित और सर्वेश एक दूसरे के गले लग गए।

कहानी से सीख:

दोस्ती में कोई स्वार्थ नहीं होता।

🙋‍♂️ FAQs – Moral values story in Hindi

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