पंचतंत्र की 2 कहानी – जैसी संगत वैसी रंगत | लालची राजा और हंस

📅 Published on June 20, 2026
🔄 Updated on June 17, 2026
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संगत का प्रभाव हमारे जीवन में बहुत अधिक मायने रखती हैं। क्योंकि हमारी संगत जैसी होती हैं वैसे ही हमारे गुण और आचरण होते हैं। कहानीज़ोन की इस कहानी में आज हम पंचतंत्र से जुड़ी दो कहानियाँ देखेंगे जिसमें दो तोते का व्यवहार और दूसरी कहानी में एक लालची राजा और हंस के बारें में बताया गया हैं। तो चलिए देखते हैं पंचतंत्र की कहानियों को जोकि इस प्रकार से लिखित हैं:

1. राजकुमार और तोता:

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एक समय की बात हैं, किसी राज्य में एक राजा रहता था। राजा बहुत ही नेक इंसान था। उसके न्याय की चर्चा आस-पास के राज्यों में बहुत होती थी। लेकिन, राजा की एक सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसकी कोई संतान नहीं थी। जिसके कारण राजा अपने राज्य के उत्तराधिकारी को लेकर बहुत चिंतित रहता था।

एक बार राजा के राजमहल में एक संत का आगमन हुआ। उसने राजा की समस्या के बारें में सुन रखा था। संत महात्मा का राजा ने बहुत भव्य स्वागत किया। जब महात्मा वापस अपनी कुटिया को जाने लगे तो राजा से कहा – “हे राजन, मैं आप की सेवा सत्कार से बहुत प्रभावित हूँ, मांगों जो मांगना हैं।” राजा ने अपने राज्य को सभालने के लिए राजकुमार की कामना की।

महात्मा ने ‘तथास्तु’ कहकर महल से चले गए। कुछ समय बाद राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। राजा को अथाह खुशी हुई। उसने एक समारोह आयोजित करवाया जिसमें अपने राज्य के सभी लोगों का खूब सेवा सत्कार किया तथा लोगों को मिठाइयाँ, कपड़े और बहुत सामान बाँटे। धीरे-धीरे राजकुमार बड़ा हुआ, एक दिन वह अपने दोस्तों के साथ जंगल में शिकार करने गया था।

लेकिन सुबह से शाम हो गई उसे कोई शिकार हाथ नहीं लगा। राजकुमार अपने दोस्तों के साथ वापस घर को जा रहा था। रास्ते में अचानक उसे एक भागता हुआ हिरण दिखाई दिया। राजकुमार अपने घोड़े पर सवार होकर उस हिरण के पीछे पड़ गए। हिरण भागते-भागते एक छोटी बस्ती में जाकर गुम हो गया। वह बस्ती डाकुओं की थी।

हिरण का पीछा करते हुए राजकुमार उसी बस्ती के किसी घर के पास पहुंचा, जहाँ पर एक पिंजरा टंगा हुआ था। जिसमें एक तोता बैठा था। तोते ने जैसे ही राजकुमार को अपनी तरफ आते हुए देखा वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा “आओ, जल्दी आओ, पकड़ो इसे, इसके पास कीमती आभूषण हैं। सब कुछ लूट लो भागने न पाए।”

उसकी आवाज सुनकर राजकुमार को अंदेशा हो गया कि वह गलत जगह पर आ गया हैं। उसने सोचा अगर थोड़ी देर और यहाँ पर रुका तो उसकी जान को खतरा हो सकता हैं। उसने अपने चेतक घोड़े को तेजी से भागने के लिए कहा। लेकिन, देखते ही देखते उसके पीछे कई सारे डाकू पड़ गए। राजकुमार का चेतक हवा से बात करता था।

जिसके कारण वह राजकुमार की जान बचाकर काफी दूर आगे निकल आया। आगे चलकर उसे एक सुरक्षित स्थान दिखाई दिया, वहाँ पर आश्रम बने हुए थे। लेकिन, वहाँ भी पिंजरें में एक तोता कैद था, जोकि शांत बैठा हुआ था। राजकुमार को फिर से संदेह होने लगा कहीं यह जगह भी डाकुओं की तो नहीं हैं। राजकुमार ने अपने चेतक को दूसरी तरफ मोड़ना चाहा। तोता जोर-जोर से बोलने लगा।

आइए राजकुमार जी हमारे इस आश्रम में आपका हार्दिक स्वागत हैं। ठहरो, मैं अपने गुरदेव को बुलाता हूँ। तोते के आवाज लगाने के कारण आश्रम से एक मुनिवर निकलकर आए। जिन्हें राजकुमार ने अपना परिचय देते हुए सारी घटना बता दी। आगे राजकुमार ने मुनिवर से पूँछा, “जब मैं डाकुओं के बीच पहुँचा तो वहाँ पर भी मुझे एक तोता मिला और यहाँ पर भी मुझे एक तोता मिला।”

लेकिन एक तोता मुझे पकड़ने और मेरे जेवर लूटने की बात कर रहा था। जबकि यहाँ पर टंगा दूसरा तोता जोकि मेरा अभिवादन कर रहा हैं और मेरी मुलाकात आप से करा दी। मुनिवर दोनों तोते एक ही प्रजाति के हैं, यह कैसे संभव हैं। मुनिवर मुस्कुरा कर बोले, “शिष्य यह अंतर सिर्फ संगत का हैं।” डाकुओं के बीच रहकर वह तोता लूटमार और छल-कपट को देख रहा हैं। इसलिए उसके अंदर ऐसी ही भावना भरी हुई हैं।

जबकि, हमारी कुटिया में जो तोता हैं वह हमारे संस्कार से भली भांति परिचित हैं। इसलिए, उसने हमारे जैसा व्यवहार आपके साथ किया। “कहा जाता हैं कि जिस संगत में हम रहते हैं। उसी प्रकार की रंगत का प्रभाव हमारे ऊपर देखने को मिलता हैं।

नैतिक शिक्षा:

जैसी संगत, वैसी रंगत

2. लालची राजा और हंस:

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बात बहुत पुरानी हैं। विजयनगर राज्य के राजा कृष्णदेव राय के महल में एक बहुत सुंदर बाग था। उस बाग में एक स्वच्छ नीले पानी वाला सरोवर था। उस सरोवर में सुंदर-सुंदर हंस रहते थे। वे हंस राजा को बारी-बारी से प्रतिदिन एक सुनहरा पंख देते थे। जिसे राजा अपनी तिजोरी में रख लेता था। एक बार उसी सरोवर में किसी जंगल से भटकता हुआ एक बड़ा हंस आया।

जिसे उस सरोवर में रह रहे हंसो ने उतरने नहीं दिया। सभी हंसो ने उस बड़े हंस से कहा- “हम तुम्हें यहां उतरने नहीं देंगे। हम लोग यहाँ रहने की कीमत चुकाते हैं।” जिसके बदले में राजा को हम लोग बारी-बारी से प्रतिदिन एक पंख भेंट करते हैं। इसलिए, तुम्हें इस सरोवर में नहीं रहने देंगे। बड़े हंस ने मधुर आवाज में कहा- “आप लोग गुस्सा मत हो भाई।” मैं भी आप लोगों की तरह बारी आने पर अपने पंख राजा को दे दिया करूंगा।

लेकिन, सरोवर के सभी हंसो ने एक स्वर में कहा- नहीं…नहीं… हम तुम्हें यहाँ नहीं रहने देंगे। वह हंस भी जबरदस्ती पर उतर आया। उसने कहा- “अगर मैं इस सरोवर में नहीं रहूँगा तो कोई भी नहीं रहेगा।” वह उड़ते हुए राजा कृष्णदेव राय के पास जा पहुँचा। “महाराज की जय हो! आपके सरोवर में रहने वाले हंस मुझे रहने नहीं दे रहे है। मेरे वहाँ रहने से आपको ही फ़ायदा होगा।

महाराज, मेरा पंख आपके सरोवर में रहने वाले सभी हंसो से बड़ा हैं। हंस ने राजा को भड़काते हुए और कहा- महाराज! जब मैंने कहा कि मैं महाराज के पास जा रहा हूँ तो सभी हंसो ने कहा- “हम लोग किसी राजा से नहीं डरते, वैसे भी वह राजा डरपोक हैं।” हंस की बातों को सुनते ही राजा गुस्से से लाल-पीला हो उठे।

राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को आदेश दिया कि सरोवर में रहने वाले सभी हंसो को मौत के घाट उतार दो। इन हंसो की इतनी हिम्मत की अपने राजा के बारे में ऐसी गंदी सोच रखे। अब मुझे उनके पंखों की भी जरूरत नहीं हैं। उन से बड़े हंस का पंख अब हमें मिलेगा। राजा के सिपाही तुरंत सरोवर की तरफ दौड़ पड़े।

सिपाहियों को अपने पास आते देख एक बूढ़े हंस ने कहा- “अब हमें जल्द से जल्द यहाँ से निकलना होगा। तभी सभी हंसो ने एक साथ किसी और तालाब के लिए उड़ान भर दी।” दरबार वापस आकर सिपाहियों ने राजा को सरोवर के बारें में बताया कि अब वहाँ कोई हंस नहीं बचे हैं। राजा ने जंगल से आए हंस से कहा- “जाओ अब तुम्हारे लिए पूरा सरोवर खाली हो गया।”

जंगल से आया हंस बोला, “क्षमा करें, महाराज! आपका न्याय मुझे पसंद नहीं आया। इस तरह तो कल यदि मुझसे भी बड़ा कोई हंस आ गया तो आप मुझे भी मरवा डालेंगे।” यह कहकर उसने अपने पंख फड़फड़ाये और उड़ गया। लालच के कारण राजा को सभी हंसो से हाथ धोना पड़ा।

नैतिक शिक्षा:

किसी के बहकावे में आकर गुस्से में लिया हुआ फैसला हानिकारक होता हैं।

🙋‍♂️ FAQs – पंचतंत्र की कहानी – जैसी संगत वैसी रंगत

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