अहंकार, क्रोध और क्षमा पर आधारित 5 हिंदी कहानियाँ – जो बनाएं आपका असली चरित्र

📅 Published on June 29, 2026
🔄 Updated on June 23, 2026
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एक इंसान की पहचान उसके धन या पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से होती है। इस संग्रह में 5 ऐसी character story in Hindi प्रस्तुत की गई हैं जो बताती हैं कि अहंकार इंसान को कहाँ ले जाता है, क्रोध किस तरह हमें खुद से दूर करता है, क्षमा में कितनी शक्ति होती है, और स्वाभिमान क्यों धन से बड़ा होता है। ये कहानियाँ बच्चों के चरित्र निर्माण में उतनी ही उपयोगी हैं जितनी बड़ों के आत्मचिंतन में।

1. कुम्हार की सीख:

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ईश्वरपुर गाँव में रामलाल नाम का एक कुम्हार रहता था। वह मूर्तियों को बनाकर बेचता था। उसी से उसका भरण-पोषण होता था। उसका एक बेटा था जिसका नाम रमेश था। जब वह बड़ा हो गया तो रामलाल ने उसे भी मिट्टी की मूर्तियाँ बनाना सीखाना शुरू कर दिया।

लेकिन, शुरू के दिनों में उससे मूर्तियाँ ठीक नहीं बनती थी। जिसके कारण उसके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की कीमत मात्र पाँच रुपये ही मिलती थी। जबकि उसके पिता के द्वार बनाई गई मूर्तियों की कीमत दस रुपये मिलती थी।

कुम्हार रामलाल अपने बच्चे रमेश को बहुत बड़ा मूर्तिकार बनाना चाहता था। इसलिए वह हमेशा उसे मूर्तियों के बारें में कुछ न कुछ समझाता रहता था। रमेश अपने पिता की बातों का पालन भी बहुत ध्यान से करता था। इस तरह से धीरे-धीरे एक समय ऐसा आया कि रमेश द्वारा बनाई गई मूर्तियों की कीमत, उसके पिता से भी ज्यादा पंद्रह और बीस रुपये तक मिलने लगी थी।

अब वह खुशी-खुशी और अधिक मूर्तियाँ बनाया करता था। लेकिन, उसके पिता अब भी उसे मूर्तियाँ बनाते समय कुछ न कुछ कमियों के बारे में समझाते रहते थे। एक दिन रमेश ने खीझकर अपने पिता से कहा- “मेरी मूर्तियाँ आप से अच्छी बनती हैं और उसके दाम भी आप से ज्यादा मिलते हैं फिर भी आप मेरी मूर्तियों में कमियाँ निकालते रहते हैं।

रमेश की बातों को सुनकर रामलाल उसे समझाते हुए कहा- “बेटा तुम्हारी तरह ही मुझे भी युवावस्था में अपनी कलाकारी का अभिमान हो गया था कि मुझसे ज्यादा अच्छी मूर्तियाँ कोई नहीं बना सकता। इसलिए, आज मेरी मूर्तियाँ सिर्फ दस रुपये तक ही बिकती हैं। आपकी कमियाँ निकालने का मेरा मकसद आपको नीचा दिखाना नहीं हैं। बल्कि, मैं चाहता हूँ कि आप एक श्रेष्ठ मूर्तिकार बन सको।

पिता की बातों को सुनकर रमेश ने कहा- “पिताजी आज आपने मेरी आँखें खोल दी, मुझे भटकने से बचा लिया” मैं आपकी यह सीख जीवन पर्यन्त याद रखूँगा। उसका अहंकार दूर हो गया। रामलाल ने अपने बेटे को गले से लगा लिया। इस तरह रमेश एक दिन बहुत बड़ा मूर्तिकार बना।

नैतिक सीख:

जीवन के किसी भी पड़ाव पर इंसान कभी पूर्ण नहीं होता। इसलिए वह जीवनपर्यंत कुछ न कुछ सीखता रहता हैं।

2. गुस्सा न करें:

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एक बार की बात हैं, सीतापुर गाँव में एक साधु अकेले अपनी कुटिया में रहता था। साधु के पास अक्सर लोग अपनी-अपनी समस्याएं लेकर आते थे। जिसका निराकरण साधु करता था। वह अंत में हर किसी को एक बात जरूर कहता था कि “गुस्सा न करें”। वह साधु जब भी अपने प्रवचन देता यह शब्द जरूर बोलता था। लोगों को दिखाने के लिए वह हमेशा अपने चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने की कोशिश करता था।

साधु एक बार किसी गाँव में प्रवचन देने गया था। वह अपने प्रवचन में गाँव के लोगों को बहुत अच्छी-अच्छी बाते सीखा रहा था। उसकी बातें सुन गाँव के लोग बहुत प्रेरित हुए तथा सही मार्ग चुनने के लिए लालाईत हो उठे। एक लड़का जोकि किसी शहर से आया हुआ था। जिसकी उम्र महज पंद्रह साल थी। जोकि, प्रवचन को सुनने के बाद साधु के पास गया और साधु से प्रश्न किया, हमें अपने जीवन में खुश रहने के लिए क्या करना चाहिए?

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“साधु उस लड़के को जबाब देते हुए कहता हैं कि- अगर जीवन में खुश रहना चाहते हो तो “गुस्सा करना छोड़ दो”। लड़के ने फिर से साधु से कहा हमे खुश रहने के लिए क्या करना चाहिए? साधु ने तेज आवाज में कहा “गुस्सा करना छोड़ दो”। लड़के ने दुबारा प्रेम से पूछा- “मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया।” आपने क्या कहा एक बार फिर से बता दें। साधु जूंझलाते हुए कहा, “कितनी बार बताऊँ, ‘गुस्सा करना छोड़ दें।’

लड़के ने फिर से साधु से कहा, “एक बार और बता दो महाराज हमें जीवन में खुश रहने के लिए क्या करना चाहिए।” इस बार साधु गुस्से में आकर लड़के को डंडे से पीट दिया। लड़का बहुत होशियार था उसने साधु से पूँछा, “महाराज गुस्सा न करना जीवन में खुश रहने का मूल मंत्र हैं तो, आपने मुझ पर गुस्सा क्यों किया।”

लड़के की बातों को सुन साधु लज्जित हो गया। उसने साधु से कहा, “हिंसक व्यक्ति शांति का पाठ कैसे पढ़ा सकता हैं।” जो खुद क्रोध से भरा हो। हमें पहले खुद गुस्से से मुक्त होना चाहिए। फिर हम दूसरों को इसके लिए प्रेरित कर सकते हैं। गुस्से से बचने का एक मात्र साधन यह हैं कि हमें सत्य के मार्ग पर चलते हुए प्रभु परमात्मा से नाता जोड़कर रखना चाहिए।

नैतिक सीख:

हम दूसरों के अंदर जो परिवर्तन लाना चाहते हैं पहले हमें अपने अंदर वही परिवर्तन लाना पड़ेगा।

3. जो हो गया सो हो गया:

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किसी पेड़ के नीचे एक साधु महात्मा ध्यानमग्न साधना में बैठे थे। गुस्से से भरा एक आदमी आया और उसने महात्मा के शरीर पर थूक दिया। उसने उन्हें अनेकों गालियां भी दी। जब वह चुप हुआ तो महात्मा ने थूक को चादर से पोंछते हुए कहा- “मित्र! कुछ और भी कहना चाहते हो?” महात्मा की बात सुनकर वह आदमी चौक गया।

उसने सोचा थूकने और गाली देने वाले को भी कोई इतने प्यार से ‘मित्र’ कैसे कह सकता है?” वह चुपचाप वहाँ से चला गया। महात्मा जी का एक शिष्य यह सब कुछ देख रहा था। वह क्रोध से भर उठा उसने कहा- “गुरुदेव! वह दुष्ट आदमी आप पर थूक कर गया और आप पूछते हैं कि मित्र कुछ और कहना है?” 

यह सुनकर महात्मा ने शिष्य से कहा- “कभी-कभी भाव इतना बड़ा होता है कि सब कुछ छोटे हो जाते हैं।” कोई प्रेम से इतना भर जाता है कि शब्दों में नहीं कह पाता। इसलिए वह गले लगा लेता है। जबकि, “कोई क्रोध से इतना भर जाता है कि शब्दों के द्वारा कुछ कह नहीं पता, इसलिए थूककर कहता है।”

महात्मा पर थूकने वाला व्यक्ति रात भर सो नहीं सका। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी आदमी हो सकता है, जो थूकने पर गुस्सा करने के बजाय मित्र कहकर पुकारे और पूछे कि कुछ और कहना है। सुबह होते ही वह महात्मा के पास पहुँचा और अपने किए की माफी मांगने लगा।

महात्मा जी ने उस आदमी को सच्चे दिल से क्षमा करते हुए कहा- “जो हो गया, सो हो गया। हम तो आगे बढ़ गए हैं, कल की बात भूल गए हैं। लेकिन तुम कल की बात पर क्यों रुके हो? आप खुशी-खुशी जाओ और नेक काम करो, इसी में तुम्हारी भलाई है।”  

इतना कहकर महात्मा जी अपने शिष्य के संग आगे कदम बढ़ाने लगे…। वह आदमी खुद को ही घृणा से देखने लगा। दूसरे ही पल जब उसके मस्तिक में महात्मा के ये शब्द गूंजे- “जो हो गया, सो हो गया…” इन शब्दों की ऊर्जा से उसने अपने आपको बदल दिया।

नैतिक शिक्षा:

पुरानी बातों के चक्कर में आज का समय खराब न करे।

4. इज्जत से बढ़कर कुछ नहीं:

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एक बार एक लकड़हारा एक गाँव से दूसरे गाँव को जा रहा था। उस पर चार चोर टूट पड़े। लकड़हारे ने बड़ी वीरता से चोरों का मुकाबला किया। वह चोरों से लड़ते-लड़ते थक गया। तब चोरों ने उस पर काबू पा लिया। काफी उत्साह से चोरों ने लकड़हारे की जेब टटोलनी शुरू की। लकड़हारे ने जिस वीरता से उनका मुकाबला किया था। उससे चोरों ने यह समझा था कि जरूर इसके पास काफी धन हैं। 

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लेकिन, चोर उस समय ठगे से रह गए। जब उन्होंने लकड़हारे की पूरी तलाशी में मुश्किल से चार-पाँच सिक्के मिले। एक चोर से रहा नहीं गया, उसने लकड़हारे से पूछ ही लिया- “हद हो गयी। इतनी मामूली सी रकम बचाने के लिए तुमने इतने जोरो से मुकाबला किया? यदि तुम्हारी जेब में सोने के दो-तीन सिक्के होते तो जरूर तुम हम चारों को जान से मार डालते।

लकड़हारे ने जवाब दिया- “नहीं, सवाल इज्जत का हैं। मैं अपनी गरीबी अजनबियों के सामने जाहिर नहीं होने देना चाहता था। मेरी जेब में क्या हैं, क्या नहीं यह मेरा रहस्य था।” किसी के भी सामने मैं इस रहस्य को क्यों खोलता? इज्जत की खातिर तो मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ। ‘इज्जत’ की बात सुनते ही चारों चोर स्तब्ध रह गए और चुपचाप वहाँ से निकल गए।

नैतिक शिक्षा:

पैसे से बड़ी इज्जत होती हैं।

5. स्वर्ग और नरक का रास्ता:

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मुनिराम नाम का एक साधक जंगल में अपनी साधना में लीन था। एक बार तेजप्रताप नाम का एक सैनिक उसके पास आया। उसने कहा- “हे महात्मन एक जिज्ञासा हैं, जिसने मन को अशान्त कर रखा हैं। कृपया मेरी जिज्ञासा का समाधान कर मन को शांति प्रदान करें। “कहो मित्र, क्या पूछना चाहते हो?” मुनिराम ने कहा।

तेजप्रताप ने पूछा- गुरुदेव! क्या स्वर्ग और नरक की बात यथार्थ हैं? तुम कौन हो? मुनिराम ने पूछा। मैं एक योद्धा हूँ। तेजप्रताप ने कहा। “अरे! तुम एक योद्धा हो? किस राजा ने तुम्हें योद्धा बनाया? तुम तो एक भिखारी जैसे लगते हो। मुनिराम ने कहा।

यह सुनकर योद्धा आग-बबूला हो गया। आंखे लाल हो गई, भुजाये फड़कने लगी। उसने म्यान से तलवार निकाल ली और चीखा- खामोश! आगे एक शब्द भी बोला तो तेरा सिर धरती पर लुढ़कता नजर आएगा। इन बातों का मुनिराम पर कोई असर नहीं हुआ।

उसने सैनिक का उपहास करते हुए फिर कहा- अच्छा, तो तुम तलवार भी रखते हो? किन्तु लगता है इसकी धार निकम्मी हो गई हैं। यह मेरा गला नहीं काट सकेगी, इसे म्यान में रख लो।

इतना सुनते ही तेजप्रताप ने प्रहार करने के लिए तलवार उठाई। ठहरो! मुनिराम ने कहा- मित्र! यही नरक का द्वार हैं। तेजप्रताप चकित हो गया। उसने तलवार म्यान में डाल ली और हाथ जोड़कर मुनिराम को प्रणाम किया। मुनिराम ने कहा- मित्र यही स्वर्ग का द्वार हैं।

नैतिक शिक्षा:

स्वर्ग और नरक का रास्ता हम अपने कर्म के अनुसार निर्धारित कर सकते हैं।

🙋‍♂️ FAQs – चरित्र की कहानी हिन्दी में

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