राजा का न्याय, बुद्धिमानी और सही निर्णय की 5 हिंदी कहानियाँ

📅 Published on June 30, 2026
🔄 Updated on June 24, 2026
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जीवन में सही समय पर सही निर्णय लेना एक कला है – और यह कला किताबों से नहीं, अनुभव और बुद्धिमानी से आती है। इस संग्रह में 5 ऐसी wisdom story in Hindi प्रस्तुत की गई हैं जो दिखाती हैं कि एक चतुर बुढ़िया कैसे राजा को मात देती है, एक जौहरी धैर्य से असंभव सवाल का जवाब कैसे देता है, और एक राजा का अधूरा वादा कैसे किसी की जान ले लेता है। ये कहानियाँ बच्चों और बड़ों को सोच-समझकर निर्णय लेने की प्रेरणा देती हैं।

1. मजदूर और सेठ:

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किसी गाँव में बलराम नाम का एक मजदूर रहता था। जोकि, बहुत निर्धन था। उसके घर में उसकी पत्नी तथा एक छोटी बेटी रहती थी। उसने किसी तरह से एक-एक पैसे एकठ्ठा किया था। जिसे वह अपने गाँव के सेठ राधेश्याम के पास जमा कर दिया। मजदूर ने सेठ राधेश्याम से कहा “जब मेरी बेटी शादी योग्य हो जाएगी तब मुझे यह पैसा चाहिए होगा।”

धीरे-धीरे लगभग पंद्रह वर्ष बीत गए। एक दिन बलराम, सेठ राधेश्याम के पास गया। वह अपने दिए हुए पैसों को वापस माँगा। सेठ के अंदर लालच आ गया। उसने यह कहते हुए पैसे देने से माना कर देता हैं कि “तुमने मुझे पैसे कब दिए थे, मैंने पैसे लेते समय तुमको कुछ लिखकर दिया हो तो दिखाओ या फिर कोई सबूत बताओ।”

सेठ राधेश्याम की बातों को सुनकर मजूदर बहुत चिंतित हुआ। उसने अपने राज्य के राजा के पास जाने का निश्चय किया। वह राजा के पास जाकर, सेठ को दिए हुए अपने पैसों के बारें में बताया। राजा ने सेठ को बुलाकर पूछा तो उसने कहा, “महाराज इस मजदूर के पास क्या सबूत हैं। कि इसने मुझे पैसे दिए थे। राजा सेठ के ऊपर ज्यादा जोर दबाव नहीं बना सकता था। क्योंकि, उसके पास कोई ठोस सबूत नहीं था। राजा ने दोनों को अपने अपने घर जाने के लिए कहा।

एक दिन राजा ने अपने राज्य से एक शानदार झाँकी निकाली। सभी लोग अपने-अपने घर के सामने से राजा को देख रहे थे। राजा सेठ राधेश्याम के घर से आगे बढ़ा ही था कि उसे मजदूर वह खड़ा दिखा और राजा ने उसे बुलाकर अपने रथ पर बैठा लिया। मजदूर को रथ पर बैठा देख सेठ राधेश्याम को शंका होने लगा कि यदि मजदूर ने पूरी घटना राजा को सच-सच बता दी तो उसकी खैर नहीं होगी।

अगले दिन सुबह-सुबह सेठ राधेश्याम राजा के दरबार में पहुँचा और राजा के सामने पच्चीस सौ रुपये देते हुए बोला। कल मैंने अपने पुराने बही खातों को देख रहा था। जिसमें मजदूर बलराम ने मुझे एक हजार रुपये दिए थे। जोकि, पंद्रह वर्षों में पच्चीस सौ रुपया हो गया हैं।

सेठ राजा के सामने यह भी कहता हैं कि अगर मजदूर बलराम ने मुझे वह तारीख भी बता दी होती तो पैसे देने में इतनी परेशानी नहीं होती। इस तरह से राजा ने अपनी कूटनीति के माध्यम से मजदूर बलराम को न्याय दिलाई।

नैतिक सीख:

अपने दिमाग को सही जगह पर इस्तेमाल करने पर ही सफलता मिलती हैं।

2. बुढ़िया की चतुराई:

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किसी राज्य में एक मूर्ख राजा रहता था। उसका न्याय बहुत अटपटा होता था। इसलिए, लोग उसे मूर्ख कहते थे। जब भी लोग उसके पास अपनी फ़रियाद लेकर जाते थे तो वह हमेशा बेतुका फैसला सुनाता था। उसके गलत फैसले के कारण पूरे राज्य के लोग उससे परेशान हो गए थे। उसी राज्य में एक गरीब बुढ़िया अपनी झोपड़ी में रहती थी।

उसकी झोपड़ी से सटा हुआ एक तीनमंजिला आलीशान मकान बना हुआ था। बुढ़िया लकड़ी और कोयले को जलाकर खाना बनाती थी। वह सुबह-शाम जब भी खाना बनाती, उसके चूल्हे से उठने वाला धुआँ सेठ के तीन मंजिले मकान की खिड़कियों से होकर कमरों में भर जाता था।

सेठ धुएँ से परेशान होकर, एक दिन बुढ़ियाँ के पास जाकर बोले- “तुम्हारे चूल्हे का धुआँ हमारे घर के कमरों में भर जाता हैं। इसका कुछ जतन करो। बुढ़िया ने जवाब देते हुए कहा, “आप ही बताएं मैं क्या करूँ?” उसने सेठ से फिर कहा- “आप सुबह शाम अपने कमरों की खिड़कियों को बंद रखा करो” सेठ ने गुस्से से भरी आवाज में कहा- “तुम्हारी वजह से मैं अपने घर की खिड़कियों को क्यों बंद करूँ?”

बुढ़िया सेठ को कोई जवाब नहीं दी। अब सेठ बुढ़िया को परेशान करने लगा। जिससे वह इस झोपड़ी को बेचकर चली जाए। लेकिन बुढ़िया उसे हमेशा अनसुना करके छोड़ देती थी। एक दिन सेठ ने बुढ़िया से कहा- “तुम इस झोपड़ी को बेचने के लिए कितने पैसे लोगी” बुढ़िया सेठ से कहती हैं जब तक मैं जीवित हूँ इस झोपड़ी को मैं कभी नहीं बेचूँगी।

एक दिन सेठ अपने राज्य के राजा के पास पहुंचकर बुढ़िया की शिकायत लगा दी। जिसके लिए राजा ने अपने सिपाहियों को भेजकर बुढ़िया को बुलवाया। राजा बुढ़िया के ऊपर गुस्सा होते हुए कहा- “तुम अपने चूल्हे के धुएं का बंदोबस्त करो जिससे तुम्हारे चूल्हे का धुआँ सेठजी के कमरे में न जा सके। अगर तुम ऐसा नहीं करती हो तो तुम्हारी झोपड़ी वहाँ से हटवा देंगे।

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बुढ़िया को पता था कि राजा महामूर्ख इंसान हैं। वह कभी भी कुछ भी फैसला दे सकता हैं। इसलिए, वह राजा के फैसले से घबराई नहीं। बुढ़िया कुछ सोच-समझकर बोली, महाराज! मेरी भी एक फ़रियाद हैं। जब से सेठजी ने मेरी झोपड़ी के बगल में अपना तीन मंजिला मकान बनाया हैं, तब से मेरे आँगन में सूरज की रोशनी नहीं आती हैं। जिसके कारण मैं आए दिन बीमार रहती हूँ।

इसलिए महाराज! मेरी आप से विनती हैं अगर सेठजी अपने मकान के दो मंजिलों को तुड़वा दें तो सूरज की रोशनी हमारे घर के आँगन तक आ जाएगी और सेठ जी के कमरों में धुआँ भी नहीं जाएगा। बुढ़िया की सलाह सुनकर राजा सेठजी के ऊपर भड़क गए। उसने कहा कि, “तुम्हारी वजह से बुढ़िया को धूप नहीं मिल पा रहा हैं। और तुम अपने कमरे में धुएँ की शिकायत लेकर आए हो।”

तुम अपने घर के दो मंजिल को तुड़वा दो। राजा के फैसले को सुनकर सेठ अचरज में पड़ गया। बुढ़िया अपनी अक्लमंदी के लिए अपने आप पर खुश हुई। बुढ़िया और सेठ दोनों अपने-अपने घर को गए। अगली सुबह सेठ बुढ़िया को गैस चूल्हा और सिलेंडर देते हुए आपस में समझौता कर लिए। उस दिन से सेठ, बुढ़िया को परेशान करना छोड़ दिया।

नैतिक सीख:

अक्लमंदी के साथ बड़ी सी बड़ी समस्या का हल आसानी से निकाला जा सकता हैं।

3. राजा और दरबारी:

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किसी राज्य में उधमसिंह नाम का एक राजा रहता था। राजा बहुत विनम्र और दयालु स्वभाव का था। वह अपने राज्य के लोगों की समस्या जानने के लिए घूमा करता था। जिसके कारण उसके राज्य के सभी व्यक्ति उससे बहुत अधिक लगाव रखते थे। राजा से किसी का दुख-दर्द नहीं देखा जाता था।

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। राजा अपने राज्य में घूमने के लिए निकले हुए थे। उन्हें दरबार पहुचने में शाम होने को आ चुकी थी। राजा को महल में जाते समय एक दरबारी दिखा। जोकि बूढ़ा था। वह पतले कपड़े पहने हुए था। राजा उसे अपने पास बुलाकर पूछा, तुम्हें ठंड नहीं लग रही हैं? जोकि, इतने पतले कपड़े पहने हुए हो। बूढ़े दरबारी ने कहा, महाराज मेरे पास यही कपड़े हैं। जिसे मैं बहुत समय से पहन रहा हूँ।

राजा ने कहा, “ठीक हैं! अभी मैं महल जाकर तुम्हारे लिए गरम कपड़े भेजवाता हूँ।…… राजा महल में पहुंचकर यह भूल गए कि मैं किसी को एक उम्मीद देकर आया हूँ। उसी रात उस बूढ़े दरबारी को ठंड लगने से उसकी मृत्यु हो गयी।

सुबह जब अन्य दरबारियों ने उसे देखा तो उसकी शरीर अकड़ी पड़ी हुई थी। उसके हाथ में एक पर्ची थी। जिसमें लिखा था, “मैं कई वर्षों से बिना गरम कपड़े में अपनी डीयूटी करता था। लेकिन, राजा के एक अधूरे उम्मीद के कारण…. कल रात मुझे ठंड लग गई।

कहानी से सीख:

उम्मीद पर खरा उतरना सबसे बड़ी मानवता हैं।

4. राजा और जौहरी:

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रामगढ़ में एक जौहरी रहता था। वह बड़ा गुणी और पारखी था। किसी चीज को एक बार देखकर ही उसका सही मूल्य बता देता था। इसी कारण उसके पास दूर-दूर से लोग अपनी वस्तु का वास्तविक मूल्य जानने के लिए आते थे। धीरे-धीरे उसकी चर्चा वहाँ के राजा के कानों तक पहुँची। राजा ने जौहरी के गुण की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। राजा ने उसे अपने दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया। 

राजा के आदेश पर जौहरी दरबार में उपस्थित हुआ। राजा ने जौहरी को बैठने के लिए आसन दिया। फिर अपने बगल में बैठे राजकुमार की ओर इशारा करके कहा- मैं यह जानना चाहता हूं कि मेरे राजकुमार की वास्तविक कीमत क्या है? राजा का आदेश सुनकर जौहरी बहुत असमंजस में पड़ गया।

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जौहरी कभी किसी व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं किया था। वह मन ही मन सोचने लगा कि मैं राजकुमार की कीमत क्या बताऊँ? अगर कीमत कम हुई तो राजा नाराज होकर दंडित कर देगा। अधिक होने पर क्या होगा, कुछ पता नहीं। जौहरी कुछ देर तक किसी सोच-विचार में पड़ा रहा। फिर बोला- राजन काम थोड़ा मुश्किल है। इसके लिए आप मुझे एक सप्ताह का समय दें।

ठीक है, एक सप्ताह की मोहलत दी जा रही है। लेकिन, एक सप्ताह बाद आकर राजकुमार की सही कीमत नहीं बताई तो लोगों को ठगने के आरोप में मृत्युदंड दिया जाएगा। राजा ने कहा। राजा की बात सुनकर जौहरी अपने घर वापस आया दो-तीन दिनों तक वह यही सोचता रहा कि आखिर राजकुमार की सही कीमत कैसे बताई जाए।

जौहरी को परेशान देख उसके पिता ने उसकी परेशानी का कारण जानने के लिए पूछा- “बेटा क्या बात है तुम परेशान नजर आ रहे हो। जौहरी ने अपनी समस्या बताई तो उसके पिता ने कहा- तुम व्यर्थ में चिंता मत करो। राजकुमार का मूल्य बताना बहुत आसान है।” कल तुम राजा के सम्मुख जाकर कहना, “राजन! राजकुमार के माथे पर जो रेखाएं भाग्य ने खींच दी है। उसकी कीमत तो कोई नहीं लगा सकता।

परंतु यदि इन्हें हटा दिया जाये तो राजकुमार की सही कीमत दो कौड़ी की भी नहीं है।” दूसरे दिन जौहरी दरबार में उपस्थित हुआ तो राजा ने पूछा- “राजकुमार की सही कीमत मालूम कर ली।” जौहरी ने बोला- हाँ, राजन!  “सही कीमत क्या है? राजा ने पूछा। जौहरी ने राजकुमार के माथे पर अंगुलियाँ रखकर पिता द्वारा कही बातों को दोहरा दिया।” 

राजा सोचने लगा की जौहरी ने सही कहा। “भाग्य की कीमत कोई नहीं लगा सकता, जिसके कारण मेरा बेटा राजकुमार बन सका। परंतु आम आदमी की तरह इसे काम करके जीना पड़े तो शायद ही दो कौड़ी ही कमा सके।” जौहरी के मूल्यांकन से राजा बहुत खुश हुआ। उसके गुणों की प्रशंसा की और उसे ढेर सारा ईनाम देकर विदा किया।

नैतिक शिक्षा:

सोच समझकर और धैर्य के साथ लिया गया फैसला निर्णायक होता हैं।

5. पैसे का सही उपयोग:

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एक बार राजा मनसिंह का दरबार लगा हुआ था। राजा अपने सिंघासन पर विराजमान थे। उनके सामने और दोनों तरफ दरबारी और मंत्री बैठे हुए थे। राजा अपने सभी दरबारी और मंत्रियों से पूछता हैं कि इस बार हमें राजकोष के पैसे को कहाँ पर निवेश करना चाहिए? राजा के सामने बैठे एक पक्ष के मंत्री ने कहा कि- “महाराज, हमें इस वर्ष राजकोष के धन को सैन्य शक्ति बढ़ाने में लगाना चाहिए।

जिससे राज्य की सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाया जा सके। इसके अलावा अगर हमारी सैन्य शक्ति बढ़ेगी तो हम अपने पड़ोसी राज्यों पर कब्जा कर सकते हैं और उनसे हम कर भी वसूल सकते हैं। राजा मनसिंह के सामने बैठे दूसरे पक्ष के मंत्री ने कहा कि- महाराज, राजकोष का उपयोग जनकल्याण के लिए होना चाहिए।

जिससे हमारे राज्य के लोग सुखी, संतुष्ट, बलशील और योद्धा बनकर हमारी मदद करेंगे। जिसके कारण हम कभी भी किसी युद्ध में पराजित नहीं होंगे। इसके अलावा आपको किसी अन्य राज्य से सैनिकों को बुलवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपका पूरा राज्य बलशाली योद्धाओं से भरा रहेगा। इस तरह से दोनों पक्षों में बहस होने लगी।

अंत में राजा को निर्णय लेने के लिए दोनों पक्षों ने आग्रह किया। राजा ने कुछ देर विचार विमर्श करने के बाद अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि युद्ध सदियों से होते आ रहे हैं। जिसका परिणाम सबको पता हैं। हमें किसी के अधिकार का हनन नहीं करना चाहिए। लेकिन अगर कोई हमारे राज्य पर अपना अधिकार जमाना चाहेगा तो उसके लिए हमारे सैनिक और राज्य के निवासी ही पर्याप्त होंगे। इसलिए इस बार राजकोष का पैसा राज्य तथा राज्य के वासियों की उन्नति में लगेगा।

कहानी से सीख:

हमें अमन चयन और शांति का मार्ग अपनाना चाहिए।

🙋‍♂️ FAQs – बुद्धिमानी की नैतिक कहानियाँ

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