जीवन में बड़ी सीख देने वाली – बच्चों की 7 नैतिक कहानियाँ

📅 Published on June 24, 2026
🔄 Updated on June 21, 2026
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कहानियों से बच्चों के जीवन में बड़े-बड़े बदलाव कर सकते हैं। आज के इस माडर्न युग में बच्चे मोबाइल फोन, टीवी में बहुत ज्यादा व्यस्त हैं। अगर उन्हें इससे दूर रखने की कोशिश की जाए तो कहानियाँ सबसे प्रमुख साधन हो सकता हैं। आज की moral stories for childrens in hindi में आप कई तरह की सीख देने वाली कहानी देखेंगे। जोकि निम्न प्रकार से लिखित हैं:

1. आलसी व्यक्ति और सेफ्टी पिन:

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एक आलसी व्यक्ति था, जिसका नाम वाल्टर था। वह कोई काम धंधा नहीं करता था। पूरे दिन किसी पार्क में बैठकर लोगों के साथ गप्पे मारता, बच्चों के साथ खेलता। शाम को थक हारकर घर आता और खाना खाकर पैर पसार कर सो जाता था। अगले दिन फिर उसका वही हाल रहता था। वह आलस के कारण किसी काम धंधे को करने की भी नहीं सोचता था।

उसका घर बड़ी मुश्किल से उसकी पत्नी चलाती थी। वह घर चलाने के लिए पेपर, सब्जियाँ और फलों को बेचती थी। घर-घर जाकर झाड़ू पोंछा भी करती थी। लेकिन, अगर कभी उसने अपने पति से कुछ पैसे मांग लिए तो वह उसके ऊपर चिल्ला उठता था। आगे से बोलता था, “तुम इतने पैसे कमाती हो उसका क्या करती हो।” उसकी बातों को सुनकर वह चुप हो जाती थी।

एक दिन सुबह-सुबह उसकी पत्नी को काम पर जाना था। उसने अपने आलसी पति से कहा, “जल्दी उठो और बाजार जाकर बटन ले आओ। मुझे काम पर जाना हैं, मेरे कपड़े की बटन टूट गई हैं।” आलसी पति ने सोचा, “इतनी सुबह-सुबह उठकर बाजार कैसे जाऊँ? उसने अपने पास पड़े दो तीन इंच के तार को मोड़कर एक आकर बना दिया। उसे अपनी पत्नी को देते हुए कहा, “लो बटन की जगह इसको लगा लो।”

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उसकी पत्नी जल्दी में थी उसने उस मुड़े हुए तार को लगा लिया। वाल्टर को उस तार से एक आइडिया आया उसने तार को एक पेपर पर उतारकर एक कंपनी के पास गया। उसने अपना आइडिया कंपनी के मालिक को बताया। मालिक ने उसका फार्मूला 500 डॉलर में खरीद लिया।

उस आइडिया को थोड़ा और सुधार करके उसका नाम सेफ़्टी पिन दे दिया। कंपनी के मालिक ने पहले सप्ताह में लगभग 30,000 सेफ़्टी पिन बेचे। लेकिन जैसे-जैसे लोगों को पता चला। सेफ़्टी पिन की मांग और बढ़ने लगी। कंपनी का मालिक वाल्टर को अब 800 डॉलर की रॉयल्टी भी देने लगा। वाल्टर अब घर बैठे-बैठे अपना गुजारा करने लगा।

बच्चों के लिए संदेश

आवश्यकता आविष्कार की जननी हैं।

2. शिक्षा का महत्व:

प्रतिदिन राहुल अपने घर से कच्ची सड़क से होते हुए स्कूल जाता था। उसी सड़क के किनारे दीपू अपने पिता के साथ चाय और समोसे बेचता था। दीपू बहुत ही बुद्धिमान और मेहनती लड़का था। लेकिन, उसके पिता उसे स्कूल नहीं जाने देते थे। क्योंकि उन्हें पढ़ाई का महत्त्व नहीं पता था। दीपू जब राहुल को देखता तब उसे भी पढ़ाई करने का मन करता था।

एक दिन दीपू ने अपनी माँ से पढ़ाई करने के लिए कहा। उसकी माँ भी जानती थी कि दीपू के पिता उसे स्कूल नहीं जाने देंगे। ऐसे में दीपू को स्कूल कैसे भेजे? तभी उसकी माँ को राहुल दिखाई दिया। दीपू की माँ ने तेज आवाज देकर राहुल को अपनी दुकान पर बुलाया। उसे एक समोसा देते हुए कहा, “राहुल बेटा! तुम मेरे बेटे को स्कूल के बाद एक घंटे पढ़ा दोगे क्या? मैं तुम्हारे माता-पिता से बात कर लूँगी।”

राहुल ने कहा, हाँ…हाँ! क्यों नहीं। स्कूल के बाद अब राहुल, दीपू को पढ़ाने लगा था। दीपू, राहुल से कुछ दिन में ही बहुत कुछ सीख चुका था। उसने राहुल के दोस्तों के साथ दोस्ती भी कर ली थी। एक दिन दीपू के पिता जी ने गाँव के किसी सेठ से कुछ पैसे उधार लिए। सेठ ने उन्हे पैसे देते हुए एक कागज पर दस्तखत करने के लिए कहा।

दीपू ने उस पेपर को देखकर बोला, “पापा! आप पैसा नहीं चुका पाओगे तो सड़क के किनारे की दुकान सेठ को दे दोगे?” दीपू के पिता ने कहा, “मैंने ऐसा कब कहा?” दीपू ने अपने पिता से कहा, पापा आप जिस पेपर पर दस्तखत कर रहे हैं, उसमें ऐसा ही लिखा हैं। दीपू के पिता ने सेठ को छल और विश्वासघात करने के कारण उससे पैसा लेने के लिए मना कर दिया।

दीपू को अपनी गोद में उठाते हुए कहा, “बेटा अब तुम स्कूल जाओगे। मुझे पता चल गया हैं कि अशिक्षित होने पर लोग कैसे उसका फ़ायदा उठाते हैं।” अपने पिता की बात को सुनते ही दीपू दौड़कर अपनी माँ के गले से लग गया, वह बहुत खुश था। उस दिन के बाद से दीपू ने स्कूल जाना शुरू कर दिया।

बच्चों के लिए संदेश

शिक्षा के बिना व्यक्ति पशु समान होता हैं। जिसे कोई भी चाहे अपने अनुसार चला सकता हैं।

3. समय का महत्व:

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सुधीर पेट में दर्द होने का बहाना करके स्कूल नहीं गया। थोड़ी देर बाद वह गली के बच्चों के साथ खेलने निकल गया। शाम होने को आ चुकी थी। लेकिन अभी तक सुधीर घर वापस नहीं आया था। कुछ समय बाद जब सुधीर घर आया और अपनी माँ से कहा, “मम्मी मुझे बहुत जोरों की भूख लगी हैं। मैं हाथ पैर धुलकर आता हूँ, आप खाना लगा दो।

सुधीर डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खा रहा था। तभी सुधीर की दादी उसके पास आई और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोली, आ गया मेरा पोता! सुबह तो तुम बोल रहे थे, मेरे पेट में दर्द हैं, मैं स्कूल नहीं जाऊँगा। उसके बाद तुम खेलने निकल गए। अब तुम्हारे पेट में दर्द नहीं हो रहा क्या? सुधीर बिना कुछ बोले खाना खाए जा रहा था। दादी उसके बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई।

दादी ने कहा, “बेटा सुधीर! तुमने आज जो समय बर्बाद कर दिया। यह समय तुम्हारे लाख चाहने पर भी जीवन में कभी दुबारा वापस लौटकर नहीं आएगा। बेटा! समय बहुत बलवान होता हैं। जिस समय तुम खेलने में खेलने में लगे थे। उसी समय का तुम्हारे दोस्त स्कूल में सदुपयोग कर रहे थे। बेटा, यदि समय को अपने अनुसार बना लिया तो ठीक, नहीं तो तुम्हें समय के अनुसार बनना पड़ेगा। जोकि दुखदाई होगा।

बच्चों के लिए संदेश:

समय की कीमत कोई चुका नहीं सकता। एक बार हाथ से निकल गया तो सिर्फ पछतावा ही पछतावा मिलेगा।

4. बच्चा और पेड़:

तनुज, एक छोटा सा बच्चा था उसकी दोस्ती आम के पेड़ से थी। दोनों एक दूसरे को बहुत अधिक चाहते थे। तनुज उसी पेड़ के साथ खेलता था। पेड़ उसे मीठे-मीठे फल खिलता था। धीरे-धीरे तनुज बड़ा होने लगा। अब वह आम के पेड़ के पास खेलने कभी-कभी ही जाता था। एक दिन आम के पेड़ ने तनुज को मिलने के लिए बुलाया। तनुज उससे मिलने के लिए आया। आम के पेड़ ने कहा, “दोस्त! आओ साथ खेलते हैं। मैं अकेला महसूस कर रहा हूँ।”

“नहीं…नहीं…. मुझे खिलौने से खेलना हैं। मेरे पास पैसे भी नहीं हैं कि मैं खिलौने खरीद सकूँ। तनुज ने मुँह फूलाकर बोला। पेड़ ने तनुज से कहा, “दोस्त! मुझमें लगे इन रसीले आमों को बेचकर तुम अपने लिए खिलौने ले सकते हो।” तनुज रसीले आमों को लेकर बाजार चला गया। तनुज कई महीनों तक वापस नहीं लौटा, पेड़ उदास रहने लगा।

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अचानक एक दिन तनुज वापस लौटा। पेड़ ने खुश होकर कहा, “आओ मेरे दोस्त दोनों बातें करें। देखो मैं तुम्हारे बिना उदास रहता हूँ।” तनुज ने कहा, “मेरे पास समय नहीं हैं। मुझे अपने परिवार के लिए घर बनाना हैं। लेकिन मेरे पास लकड़ी नहीं हैं। पेड़ ने अपने मित्र को सबसे मजबूत टहनी दे दी। वह लकड़ी लेकर चला गया। पेड़ उसके लौटने का इंतजार करता रहा। लेकिन तनुज उसका हाल-चाल तक लेने नहीं आया।

कुछ महीनों बाद एक दिन तनुज अपने परिवार के साथ पेड़ के पास आया। पेड़ अपने दोस्त को देख फूले नहीं समाया। उसने अपने दोनों हाथ उसके सामने फैलाते हुए कहा, “दोस्त एक बार मेरे गले लग जा, वर्षों हो गए, मुझे तुम्हारे साथ खेले हुए। लेकिन, तनुज ने पेड़ से कहा, “मुझे एक सीधा और लंबा तना चाहिए, जिससे मुझे नाव बनवानी हैं।

पेड़ ने दोस्त को पाने की खुशी में तना काटने के लिए कह दिया।” लेकिन तनुज एक बार फिर पेड़ से दूर चला गया। पेड़ फिर से अकेला और उदास हो गया। एक दिन एक बूढ़ा व्यक्ति पेड़ के पास आया, वह तनुज ही था। पेड़ ने उसे देखकर निराशा से कहा, “मित्र, अब मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं हैं।” तनुज ने कहा- “दोस्त अब मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं बहुत थक चुका हूँ। मैं सिर्फ तुम्हारे पास आराम करना चाहता हूँ।”

दयालु पेड़ ने कहा, मित्र तुम मेरे ठूँठा का सहारा लेकर आराम कर सकते हो। पेड़ अपने पास अपने दोस्त को देखकर बहुत खुश था। तनुज मन ही मन सोचने लगा हमें भी इस पेड़ की तरह दयालु होना चाहिए।

बच्चों के लिए संदेश

हमें स्वार्थी नहीं, दयालु होना चाहिए।

5. सच्चा देशप्रेम:

आरव, रोहित और समीर तीनों बहुत अच्छे दोस्त थे। तीनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। एक दिन उनकी मैडम ने देशप्रेम की एक कहानी सुनाई। कहानी सुनकर आरव बोला, “मैडम जी! मैं भी पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बनकर सेना में जाऊँगा। अपने देश की सीमा की रक्षा करूँगा।” ‘शाबाश आरव!’ मैडम ने कहा।

रोहित ने कहा, ‘मैडम जी, मैं भी पढ़-लिखकर नेता बनूँगा और अपने देश का नाम दुनिया में रौशन करूँगा।’ मैडम ने कहा, अच्छी बात हैं। इस तरह से सभी बच्चों ने अपनी-अपनी इच्छाएं बताई। सबसे आखिर में समीर ने कहा, “मैडम जी मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनकर गरीबों की सेवा करना चाहता हूँ।

तभी आरव और रोहित बोल पड़े,”गरीब की सेवा करना कोई देशप्रेम थोड़ी हैं” यह तो पैसा कमाने का एक जरिया हैं। मैडम जी ने कहा, “मरीजों की सेवा करना भी देशप्रेम हैं। क्योंकि, वे भी देश के नागरिक हैं। मैडम ने आरव और रोहित से पूछा कि जब सैनिक घायल होते हैं तो उनका इलाज कौन करता हैं? जब नेता बीमार होते हैं तो उनका इलाज कौन करता हैं? यदि देश में किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा आती हैं तो उनका इलाज कौन करता हैं।

सभी बच्चों ने एक स्वर में बोले, “डॉक्टर!” मैडम ने कहा, तो आप कैसे कह सकते हैं कि डॉक्टर का काम देशप्रेम से नहीं जुड़ा हैं। मैडम ने कहा, “कोई भी काम, पूरी लगन और ईमानदारी के साथ डॉक्टर, इंजीनियर, मजदूर, किसान, शिक्षक करते है तो वह देश प्रेम के अंतर्गत ही आता हैं। क्योंकि, सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। सभी मिलकर एक उन्नत देश के निर्माण में सहयोग करते हैं।

बच्चों के लिए संदेश

एक मजबूत देश के लिए हर वर्ग के लोगों का योगदान जरूरी होता हैं।

6. गिरकर उठना सीखो:

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वैभव और सूरज दो भाई थे। वैभव बड़ा भाई तथा सूरज छोटा था। वैभव बहुत ही समझदार बच्चा था। वह अपनी मम्मी-पापा की बातों को मानता था। इसके अलावा वह अपने छोटे भाई सूरज की देखभाल भी बहुत अच्छे ढंग से करता था। धीरे-धीरे दोनों बड़े हो रहे थे। वैभव की उम्र लगभग दस साल तथा सूरज की उम्र सात साल थी। दोनों हमेशा एक साथ खेलते थे।

एक दिन वैभव और सूरज दोनों घर के सामने खेल रहे थे। सूरज को अचानक एक तितली उड़ती हुई दिखाई दी। उसने अपने बड़े भाई से तितली पकड़ने के लिए कहा। वैभव तितली का पीछा करने लगा। अचानक से सूरज भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। उसका पैर किसी पत्थर से टकरा जाने के कारण वह गिर गया। उसके पैर से थोड़ा खून निकलने लगा। जिसे देख सूरज जोर-जोर से चिल्लाने लगा।

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वैभव उसके पास आकर देखा कि सूरज के पैर में मामूली सी चोट लगी थी। उसने सूरज को समझाते हुए कहा, “मेरे भाई! ठोकरे हमें चलना सीखाती हैं।” उसने अपने पैर में लगे चोट के निशान दिखाते हुए कहा, “देखो मैं भी कई बार गिरा था, तभी आज मैं तेज दौड़ पा रहा हूँ। उसने अपने छोटे भाई को और समझाते हुए कहा, “हमें गिरकर उठना सीखना चाहिए।” जो हो गया सो हो गया। उसी सोच में पड़े नहीं रहना चाहिए। अपनी गलतियों को पहचानो उसे दुबारा से दोहराओ मत।

बच्चों के लिए संदेश

ठोकरे हमे चलना सीखाती हैं।

7. पेड़ का महत्त्व:

बंटी, खेलकर घर वापस आया तो उसने देखा उसके घर के सामने पीपल के पेड़ की बहुत सारी औरतें पूजा कर रही थी। उसने अपने दादाजी से पूछा, “मम्मी, बुआ और आँटी जी सभी इस पेड़ की पूजा क्यों कर रहे हैं? और उसने पूछ- “दादाजी मैंने लोगों को मंदिर में पूजा करते हुए देखा हैं।” लेकिन पेड़ की पूजा! मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।

दादा जी बंटी को उसकी अंगुली पकड़कर पीपल के पेड़ के पास ले गए। बंटी ने देखा कि पीपल के पेड़ के तने पर बहुत सारे लाल धागे बंधे हुए थे। उस पेड़ के नीचे दीपक जल रहा था। औरतें पेड़ के सामने अपने दोनों हाथों को जोड़कर कुछ प्रार्थना कर रही थी। यह सब दिखाते हुए दादा जी ने पूछा, “हम भगवान की पूजा क्यों करते हैं?”

बंटी ने कहा, “दादा जी! मम्मी ने मुझे बताया था कि भगवान हमारा पालन-पोषण करते हैं, हमें जीवन देते हैं। इसलिए हम भगवान की पूजा करते हैं।” बेटा इसी तरह पेड़ पौधे भी हमें फल, फूल, छाया, और लकड़ियाँ देते हैं। इन सबसे बड़ी चीज पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, जिसके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते। इसलिए, हम पेड़ की पूजा करते हैं। उन्हें बचाते हैं, जिससे हमारा जीवन सुरक्षित रहे।

दादाजी बंटी को और समझाते हुए कहते हैं, “हमारे वायुमंडल में तरह-तरह की दूषित गैसें जैसे, कार्बन डाई-आक्साइड भी होती हैं। जिसे पेड़ चूस लेता हैं। उसके बदले मे हमें ऑक्सीजन देकर हवा को साफ रखने में मदद करता हैं। बंटी ने कहा- “दादाजी मैं समझ गया कि हम पेड़ की पूजा क्यों करते हैं तथा पेड़ हमारे लिए कितना आवश्यक हैं।” अब से मैं भी पेड़ लगाऊँगा और लोगों को भी प्रेरित करूँगा।

बच्चों के लिए संदेश

पेड़ हमारे जीवन को बचाने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

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