जिंदगी में किताबी ज्ञान से ज्यादा जरूरी होती है व्यावहारिक समझ यानी common sense। इस संग्रह में 5 ऐसी common sense story in Hindi प्रस्तुत की गई हैं जो असली जिंदगी की परिस्थितियों से ली गई हैं। एक बुद्धिमान दूधवाला बिना नाप के एक लीटर दूध सही-सही निकालता है, एक ईमानदार कुम्हार कंजूस धोबी को सबक सिखाता है, एक बूढ़ा ठगों के बहकावे में आ जाता है, और एक यात्री समझता है कि मजबूरी में समझदारी ही सबसे बड़ा हथियार है। ये कहानियाँ बच्चों और बड़ों को सतर्क, ईमानदार और व्यावहारिक बनाती हैं।
1. कंजूस धोबी और ईमानदार कुम्हार:
श्रीपुर गाँव में एक धोबी रहता था। जोकि बहुत कंजूस था। वह पैसे बचाने के चक्कर में अपने परिवार के लोगों का ढंग से ख्याल नहीं रखता था। धोबी प्रतिदिन घरों से कपड़े इकठ्ठा करके उसे धुलने के लिए नदी पर ले जाता था।
धुलाई से जो भी पैसे मिलते, उन पैसों को पोटली में बांधकर नदी के किनारे मिट्टी में छिपा देता था। धोबी बहुत लालची था, जब भी वह कपड़े धुलने नदी पर आता था तो वह अपने पैसोंं को जमीन से खोदकर एक बार जरूर देखता था। एक दिन एक कुम्हार, मिट्टी का बर्तन बनाने के लिए नदी के किनारे मिट्टी खोदने के लिए गया था।
मिट्टी खोदते समय उसे धोबी के पैसों की पोटली मिल गई। जिसे वह अपने साथ घर ले आया। वह अपने गाँव के मुखिया के पास जाकर पूरी बात बताते हुए पैसे की पोटली सौंप दिया। अगले दिन धोबी नदी के किनारे कपड़े धुलने गया। वह छिपाए हुए पैसों की पोटली बहुत खोजा, लेकिन उसे नहीं मिला।
धोबी जोर-जोर से चिल्लाने लगा- ‘मैं लूट गया, मैं बर्बाद हो गया’ उसकी आवाज सुनकर एक चरवाहा उसके पास आया। उसने धोबी से पूछा “क्या हुआ भाई क्यों चिल्ला रहे हो?”
धोबी सारी बात उस चरवाहे से बता दिया। चरवाहा धोबी से कहा- “कल जब मैं अपनी भेड़ों को पानी पिलाने नदी पर आया था तो तुम्हारे गाँव के कुम्हार को इसी जगह पर मिट्टी खोदते हुए देखा था। हो सकता हैं तुम्हारे पैसोंं की पोटली कुम्हार को मिली होगी।” धोबी कुम्हार के घर गया उसके ऊपर पैसे चुराने का आरोप लगाया। कुम्हार धोबी को लेकर गाँव के मुखिया के पास गया।
मुखिया के पास पहुँचकर धोबी गुस्से से लाल-पीला होते हुए कुम्हार के बारे में भला-बुरा कहते हुए उसके ऊपर चोरी का इल्जाम लगाने लगा। मुखिया धोबी की बातों को सुनकर, धोबी को कुम्हार के ऊपर चोरी का इल्जाम लगाने के लिए फटकार लगाया। मुखिया ने कहा- “कुम्हार ईमानदार हैं, कल जब मिट्टी की खुदाई करते समय उसे पैसे से भरी पोटली मिली थी, वह ईमानदारी से मुझे सौंप गया था।” ये लो तुम्हारे पैसे की पोटली।
तभी वहाँ पर धोबी की पत्नी अपने बच्चों के साथ आ पहुंची। उसने कहा- “रुकिये! मुखिया जी पहले आप हमारा न्याय करो। पैसों की कमी के कारण कितने दिन हो गए मैं और मेरे बच्चे भर पेट भोजन नहीं किए। इसके अलावा बच्चों की स्कूल फीस न भर पाने की वजह से स्कूल से भी बच्चों को निकाल दिया गया।
इतना पैसा मेरे पति के पास कहाँ से आया? यह पैसा हमारा नहीं हो सकता। इस पैसे को कुम्हार को ही दे दिया जाए। धोबी अपनी पत्नी के ऊपर गुस्सा करते हुए कहा- “नहीं-नहीं मुखिया जी इस पैसे का मालिक मैं ही हूँ” मैं जो भी पैसे कमाता था खर्च के डर से घर पर नहीं रखता था। इसलिए मैं नदी के किनारे जमीन में छिपा दिया था।
मुखिया धोबी से कहता हैं- तुम पैसे की बचत करने के चक्कर में अपनी पत्नी और बच्चों का ख्याल क्यों नहीं रखते हो? तुम्हारे बच्चों को स्कूल से भी निकाल दिया गया हैं। ऐसे में तुम इन पैसों को बचाकर क्या करोगे? मुखिया अपना फैसला सुनाते हुए कहता हैं- आज से तुम्हारे घर को तुम्हारी पत्नी चलाएगी। तुम जो भी पैसे कमा कर लाओगे उससे तुम्हारी पत्नी घर का खर्च चलाएगी। इस तरह से धोबी की कंजूसी छूट गई। उसके बच्चे फिर से स्कूल जाने लगे। अब धोबी के घर खाने पीने की ठीक से व्यवस्था हो गई।
नैतिक शिक्षा:
जरूरत से ज्यादा कंजूसी अच्छी नहीं होती हैं।
2. बुद्धिमान दूधवाला:

रामगढ़ नामक गाँव में महेश नाम का एक दूधवाला था। जिसके पास दो भैंस और तीन गाय थी। उन्ही के दूध को बेचकर उसके घर का खर्च चलता था। महेश सुबह जब अपने जानवरों से दूध निकालता तो उसके घर दूध लेने वालों की भीड़ लग जाती थी। महेश कभी भी दूध में पानी नहीं मिलाता था। जिसके कारण उसके दूध की माँग अधिक रहती थी। उसका दूध प्रतिदिन घर से ही बिक जाता था।
एक दिन तेज बारिश हुई उस दिन कुछ ही लोग उसके घर पर दूध लेने आए बाकी का दूध बच गया। वह जल्दी से अपने काम निपटाकर दूध को बेचने के लिए बाजार निकल गया। वह अपने साथ तीन छोटे बड़े बर्तन में दूध लेकर जा रहा था। बीच रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिला जोकि बाजार से दूध लेने के लिए जा रहा था। उस व्यक्ति ने महेश से पूछा- “क्या मुझे एक लीटर दूध मिल जाएगा?”
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महेश उस व्यक्ति से कहा- ‘हाँ जरूर! जब उसने अपने बर्तन को नीचे रखा तो देखा कि दूध नापने वाला मग घर पर ही भूल गया था। वह व्यक्ति दूधिया से कहता हैं तो रहने दो, मैं बाजार जाकर ही दूध ले आता हूँ। दूधिया उस व्यक्ति को रोकते हुए कहा- “मैं आपको एक लीटर दूध दे रहा हूँ।” वह उस व्यक्ति से कहता हैं मेरे पास आठ लीटर, पाँच लीटर और तीन लीटर के बर्तन हैं।
दूधिया सबसे पहले आठ लीटर वाले बर्तन में सारे दूध डाल दिया। फिर वह आठ लीटर वाले दूध से तीन लीटर वाले बर्तन को पूरा भर दिया। फिर उस पूरे दूध को पाँच लीटर वाले बर्तन में डाल दिया। फिर से आठ लीटर वाले बर्तन से तीन लीटर वाले बर्तन को पूरा दूध से भर दिया।
एक बार फिर तीन लीटर वाले दूध को पाँच लीटर वाले में डालता हैं। अब पाँच लीटर का बर्तन पूरी तरह से भर गया। जबकि तीन लीटर वाले बर्तन में एक लीटर दूध बच गया। जिसे दूधिया उस व्यक्ति को दे दिया। दूधिया की बुद्धिमानी देख वह व्यक्ति बहुत आश्चर्यचकित हुआ।
कहानी से सीख:
बुद्धिमानी के साथ समस्या का हल निकला जा सकता हैं।
3. ठग और बुढ़ा:

किसी गाँव में एक बुजुर्ग पति-पत्नी रहते थे। दोनों बहुत आस्थावान थे, जो हमेशा पूजा-पाठ किए बिना खाना-पीना नहीं खाते थे। धीरे-धीरे दोनों अधिक बुजुर्ग होते जा रहे थे। एक दिन पति ने पत्नी से कहा- “मेरा मन तीर्थयात्रा पर चलने का कर रहा हैं।” पत्नी कहती हैं, लेकिन अपने घर में इतना पैसा नहीं हैं कि हम दोनों तीर्थयात्रा पर जा सके।
बूढ़े पति ने कहा- “क्यों न हम अपनी गाय को बेच दें, जिसके हमें अच्छे पैसे मिल जाएंगे। उन्ही पैसों से हम तीर्थयात्रा पर चले जाएंगे।” पति और पत्नी को गाय बेचने के बारे में बात करते हुए उसके गाँव के कुछ ठग ने सुन लिया। वे सभी बूढ़े को ठगने की योजना बनाते हैं। अगली सुबह जब बूढ़ा गाय को लेकर बाजार बेचने जा रहा था।
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एक ठग उसे रास्ते में मिला और उसने कहा- “बाबा इस बकरी को कहाँ लेकर जा रहे हो? बूढ़ा कहता हैं- “मूर्ख तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा क्या? यह गाय हैं, बकरी नहीं।” यह कहते हुए बूढ़ा आगे बाजार की ओर बढ़ गया। बूढ़ा कुछ दूर और आगे बढ़ा ही था कि उसे एक और ठग मिला- उसने कहा, “बाबा इस बकरी को कहाँ लेकर जा रहे हो। बूढ़ा आदमी फिर से गुस्से में आ गया।”
वह कहता हैं- “मूर्ख इंसान यह गाय हैं, बकरी नहीं।” इसी तरह से ठगों ने दो तीन आदमी और खड़े कर रखे थे। जोकि, इसी तरह के प्रश्न पूछ रहे थे। तभी किसी ठग ने पूँछ ही लिया बाबा इस बकरी को मुझे बेच दो। वह बुजुर्ग व्यक्ति लोगों की बातों में आ गया। वह अपनी गाय को बकरी के मूल्य में तीसरे ठग को बेचकर वापस घर चला आया।
नैतिक शिक्षा:
हमें कभी किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए।
4. जगह की कीमत:
किसी गाँव में शंकर नाम का छोटा सुनार रहता था। लोग उसके पास ज्वेलरी लेने आते थे तो सबसे पहले यही पूछते थे कि क्या यह असली हैं? इतना सुनते ही वह गुस्से से लाल-पीला हो जाता था। लेकिन वह भी मजबूर था। क्योंकि उसे अपने आभूषणों को बेचना था। इसलिए वह असली और नकली में फ़र्क लोगों को बताता था। यही वह कारण था कि वह बहुत कम लोगों को आभूषण बेच पाता था।
एक दिन वह सिर पर हाथ रखकर दुकान में बैठा था। तभी, उसका बेटा उसके पास आया और कारण जानना चाहा। शंकर ने अपने बेटे को सारी बात बता दी। अगले दिन सुनार का बेटा एक ठेला लेकर आया। उसने अपने पिता से कहा, “पिताजी दुकान के सभी जेवरात एक बॉक्स में डालकर ठेले पर रखकर मेरे साथ चलो। शंकर ने अपने बेटे के कहेनुसार ही किया।
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शंकर और उसका बेटा बीच गाँव में पहुंचकर आवाज लगाने लगे, बाजार से सस्ता शुद्ध चौबीस कैरेट के सोने चांदी के आभूषण ले लो। लोगों ने उसे ऐसा करते देख, उसके ऊपर खूब हँसे। लोगों ने कहा, नकली होगा इसलिए ऐसे बेच रहा हैं। पूरे दिन उसके एक भी जेवरात नहीं बिके।
बेटे ने अपने पिता के लिए बीच शहर में एक बड़ा शोरूम खुलवा दिया। उस शोरूम में कभी भी किसी की यह पूछने की हिम्मत नहीं हुई, ‘क्या ये जवाहरात असली हैं।’ सस्ती और आसानी से मिलने वाली चीज की कीमत नहीं होती। वही चीज शोरूम में महंगी मिल रही हैं। जिसे लोग बडे शौक से खरीद लेते हैं। चाहे वह नकली ही क्यों न हो।
कहानी से सीख:
किसी भी चीज की कीमत उसके सही स्थान पर होती हैं।
🙋♂️ FAQs – Common sense story in Hindi
Alok Kumar is a passionate storyteller and professional content writer with over 9 years of experience crafting meaningful, reader-friendly content. He specializes in Hindi stories, moral stories for children, inspirational narratives, and value-driven educational writing that sparks imagination and encourages positive thinking, making stories enjoyable for readers of all ages.
