समाज में कभी-कभी ऐसे लोग होते हैं जो अंधविश्वास फैलाते हैं, जात-पाँत की दीवार खड़ी करते हैं, या बिना सोचे-समझे बड़े-बड़े फैसले ले लेते हैं। तेनालीराम ने हमेशा ऐसे लोगों को उनकी ही भाषा में जवाब दिया – बिना हथियार उठाए, बस अपनी बुद्धि के बल पर। आज पढ़ें तेनालीराम की 3 ऐसी कहानियाँ जो सामाजिक बुराइयों पर तमाचा जड़ती हैं।
1. गधों को प्रमाण (तथाचार्य का अहंकार)

राजा कृष्णदेव राय के राज्य में एक तथाचार्य नाम का रूढ़िवादी शिक्षक रहते थे। वे हर किसी को हीन भावना से देखते थे। जब भी कोई अन्य समुदाय के लोग उनके पास जाते तो वह अपना मुँह ढँक लेते थे। उनके इस वर्ताव से दरबार के सभी मंत्री तथा अन्य लोग बहुत परेशान हो चुके थे। एक दिन दरबार के सभी लोग राजा के सबसे बुद्धिमान मंत्री तेनालीराम को तथाचार्य के व्यवहार के बारें में बताया।
तेनालीराम तथाचार्य से मिलने के लिए उसके घर गए। उन्हें देखकर तथाचार्य अपना मुख ढक लिए। तेनाली राम तथाचार्य से पूछते हैं आप ऐसा क्यों कर रहे हो? तथाचार्य ने कहा, “अगर मैं तुम्हें या फिर किसी अन्य समुदाय के लोगों को देखूँगा तो मैं पाप का भागीदार हूँगा और अगले जन्म में मैं गधा बनूँगा। इसलिए, मैं अपना मुँह ढक लेता हूँ।”
तेनालीराम ने तथाचार्य की बातों को गांठ बांध लिया। एक बार राजा कृष्णदेव राय अपने मंत्रियों तथा दरबारियों के साथ राज्य घूमने गए हुए थे। वापस आते समय रास्ते में राजा की मुलाकात तथाचार्य से हुई। राजा उनका हाल-चाल पूछ ही रहे थे कि अचानक तेनालीराम को कुछ गधे दिखाई दिए। तेनालीराम तेजी से भागते हुए उन गधों को प्रणाम करने लगे। उसे देखे राजा ने पूछा तेनाली तुम गधों को प्रमाण क्यों कर रहे हो।
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तेनालीराम ने जबाब दिया, “मैं तथाचार्य के पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त कर रहा हूँ। जोकि, हम लोगों के मुँह को देखने के बाद गधा बन गए हैं। उसकी बातों को सुनकर तथाचार्य ने अपने आपको राजा के सामने लज्जित महसूस किया। उसी दिन से तथाचार्य ने किसी के सामने अपने मुँह को ढकना बंद कर दिया।
2. मनहूस कौन (चेलाराम की फाँसी)

एक बार कृष्णदेव राय के राज्य में चेलाराम नाम के व्यक्ति को लेकर खबर फैल गई कि सुबह-सुबह जो भी व्यक्ति चेलाराम का मुँह देख लेता हैं उसे पूरे दिन भोजन नसीब नहीं होता। जिसके कारण सुबह-सुबह लोग चेलाराम का मुँह देखना नहीं चाहते थे। अब उसके आसपास के लोग बहुत परेशान रहने लगे थे।
इस बात की खबर राजा कृष्णदेव राय को मिली। राजा कहता हैं कि यह सब अंधविश्वास है। राजा इस बात के बारें में गहन जानकारी प्राप्त करने के लिए चेलाराम को अपने दरबार में कुछ दिन रहने के लिए कहा। दरबारियों के द्वारा चेलाराम को राजा के विश्राम कक्ष के बाहर एक कमरे में रहने के लिए कहा गया।
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एक दिन राजा सुबह-सुबह नींद से उठा ही था कि वह खिड़की से देखा हैं कि चेलाराम अपने कमरें में बैठकर योगा कर रहा हैं। लेकिन, राजा बिना कुछ कहे अपनी दिनचर्या की ओर बढ़ गया। राजा जब सुबह-सुबह नाश्ते के लिए बैठा तो उसने देखा कि उसके नाश्ते में मक्खी पड़ी हुई हैं। उसने अपने रसोइयों को बुलाकर डांट लगई। और वह गुस्से में आकर बिना नाश्ता किए उठ कर चला गए।
इस प्रकार से जब राजा दोपहर के भोजन पर बैठा ही थे कि उन्हें खबर मिली कि उनके राज्य पर हमला होने वाला हैं। इस खबर को सुनते ही वह बिना खाना खाए अपने सैनिकों को आदेश देने के लिए चले गए। इस तरह से धीरे-धीरे शाम हो गई और राजा की भूख मिट गई।
राजा शाम को जब खाना खाकर विश्राम कर रहा थे उन्हें अचानक याद आया कि आज सुबह-सुबह मैंने उस मनहूस व्यक्ति चेलाराम की शक्ल देखकर उठा था। जिसके कारण आज मुझे पूरे दिन भोजन नसीब नहीं हुआ। अगली सुबह राजा चेलाराम को मनहूस व्यक्ति होने के कारण उसे फांसी की सजा सुना दिया। इस खबर को सुनकर चेलाराम की पत्नी, तेनालीराम के पास भागी-भागी पहुंची।
तेनाली चेलाराम की पत्नी की बात सुनकर बोले, ‘तुम शांत रहो सब ठीक होगा।’ अगले दिन जब चेलाराम को फांसी होने वाली ही थी कि तेनाली चेलाराम को एक पर्ची देते हुए उसके कान में कुछ फुसफुसाया। राजा ने चेलाराम से पूँछा तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या हैं? चेलाराम ने एक पर्ची देते हुए राजा से कहा कि आप इस पर्ची को एक बार पढ़ ले।
राजा ने पर्ची खोलकर देखा तो उसमें लिखा था, “लोग कहते हैं कि सुबह-सुबह मेरा मुँह देखने से पूरे दिन भोजन नसीब नहीं होता, लेकिन, जो कोई सुबह-सुबह राजा का मुँह देख लेता हैं उसे फांसी नसीब होती हैं, तो मनहूस इंसान मैं हूँ या फिर राजा। पर्ची पढ़तें ही राजा चेलाराम की फांसी रुकवा देता हैं। राजा समझ गया कि इस तरह का ज्ञान सिर्फ तेनालीराम ही दे सकता हैं।
3. सबसे बड़ा मूर्ख कौन (व्यापारी और घोड़ा)
एक समय की बात हैं, राजा कृष्णदेव राय को घोड़ों से बहुत लगाव था। जबकि, राजा के पास उसके राज्य के सबसे अच्छे नस्ल के घोड़े थे। एक बार राजा अपने अस्तबल के पास खड़े होकर घोड़ों को देख रहे थे। इतने में उसे एक व्यापारी घोड़ा लेकर आते हुए दिखाई दिया। वह घोड़ा बहुत ही अच्छी नस्ल का था। जिसे देख राजा कृष्णदेव उसके बारे में जानने के लिए उत्सुक हो उठे। क्योंकि, वह घोड़ा बहुत आकर्षक लग रहा था।
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राजा ने व्यापारी से पूछा- “यह घोड़ा कहाँ से लाए हो। व्यापारी उस घोड़े की खासियत के बारे में बताता हैं कि यह घोड़ा अरब से लाया हूँ।” इसकी चाल ऐसी हैं कि जब यह दौड़ता है तो हवा से बात करता हैं। इसके अलावा व्यापारी घोड़े के बारे में कई अन्य खूबियों को बताता हैं। राजा उसकी खूबियों के बारें में जानकारी पाकर बहुत खुश हुए। वह उस घोड़े को खरीदने के बारें में पूछते हैं।
व्यापारी को घोड़े को बेचने के लिए मुँह माँगी कीमत मिली। व्यापारी राजा से कहता हैं “इसी नस्ल के मेरे पास दो घोड़े और हैं जिसे मैं बेचना चाहता हूँ।” राजा उन दोनों घोड़ों को भी खरीदना चाहते थे। वह व्यापारी को पाँच हजार सोने के सिक्के एडवांस में दे दिया। व्यापारी यह कहते हुए चला गया कि वह दो दिन में घोड़े लाकर दे देगा।
इस तरह से धीरे-धीरे दो दिन, दो सप्ताह और दो महीने भी बीत गए लेकिन, व्यापारी घोड़े को लेकर नहीं आया। एक शाम राजा और तेनालीराम महल के उपवन में घूम रहे थे। तेनालीराम को एक पर्ची में कुछ लिखते हुए देख, राजा बड़ी उत्सुकता के साथ उस पर्ची के बारे में जानने की कोशिश करने लगे। तेनालीराम के मना करने के बावजूद भी राजा ने उस पर्ची को अपने हाथ में लेकर पढ़ने लगे।
जिसमें सबसे ऊपर लिखा था, ‘मूर्ख व्यक्तियों की लिस्ट’। उस लिस्ट में राजा कृष्णदेव राय का नाम सबसे ऊपर था। जिसे देख राजा, तेनालीराम के ऊपर क्रोधित हो उठे। राजा ने तेनालीराम से अपने नाम को सबसे ऊपर लिखने का कारण पूछा।
तेनालीराम ने राजा को जबाब देते हुए कहा, “आपने एक अनजान व्यापारी को पाँच हजार सोने के सिक्के दे दिए, जिसे दो दिन से दो महीने बीत गए अभी तक वापस नहीं आया। राजा ने कहा- “अगर वह व्यापारी आ गया तो, तेनालीराम ने जबाब दिया तो “मूर्ख व्यक्तियों की लिस्ट में मैं उसका नाम सबसे ऊपर लिख दूंगा।”
🙋♂️ FAQs – तेनालीराम की शिक्षाप्रद कहानियाँ
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