तेनालीराम की 3 मजेदार कहानियाँ जो दिखाती हैं असली चतुराई क्या होती है

📅 Published on June 16, 2026
🔄 Updated on June 14, 2026
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विजयनगर के दरबार में तेनालीराम की चतुराई का कोई जवाब नहीं था। जहाँ बाकी सभी मंत्री राजा के सवालों में उलझ जाते, वहीं तेनालीराम का हाजिर दिमाग हमेशा एक अचूक जवाब लेकर आता था। चाहे लालची पंडितों को सबक सिखाना हो, राजा की शर्त को चालाकी से पूरा करना हो, या कौवों की असंभव गिनती बताना – तेनालीराम की बुद्धि हर बार जीती। पढ़िए ऐसी ही 3 मजेदार कहानियाँ।

1. सोने का आम (लालची ब्राम्हण को सबक):

विजयनगर राज्य के राजा कृष्णदेव राय की माँ को आम खाने का बहुत शौक़ था। वह हमेशा आम के मौसम का इंतजार करती रहती थी। लेकिन अब वह बहुत वृद्ध हो चुकी थी। एक दिन राजमाता की तबीयत बहुत खराब हो गई। राजा और उनकी माँ को लगने लगा था कि अब वह जल्द प्राण त्याग देंगी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि मृत्यु से पहले कुछ ब्राम्हाणों को आम दान कर सके।

जिसके कारण मरने के बाद उन्हे मोक्ष प्राप्त हो सके। लेकिन, आम का मौसम न होने के कारण वह आम दान नहीं कर सकी। उसी रात राजा की माँ की मृत्यु हो गई। कुछ दिन बाद राजा ने अपने दरबार में कुछ ब्राम्हाणों को बुलवाया और अपनी माँ की अंतिम इच्छा के बारें में बताया। ब्राम्हाणों ने अपने-अपने अनुसार राजा की माँ की आत्मा की शांति के लिए जतन बताया।

लेकिन, राजा को किसी की सलाह सही नहीं लगी। उन्ही ब्राम्हाणों में से एक ब्राम्हण ने राजा से कहा, “हे राजन, राजमाता को ब्राम्हाणों को आम दान करने की अंतिम इच्छा थी। जोकि, पूरी न हो सकी। जिसके कारण उनकी आत्मा को शान्ति मिलना असंभव हैं। हो सकता हैं कि उनकी आत्मा प्रेत बनकर इस महल के आसपास भटकती रहे।

इसलिए, महाराज! आप उनकी आत्मा की शांति के लिए कुछ ब्राम्हाणों को सोने का आम दान करें। जिससे राजमाता की आत्मा को शान्ति मिल जाएगी और उन्हें स्वर्ग प्राप्त होगा। राजा बहुत सीधा-साधा और भोला था। उसे ब्राम्हण की बात ठीक लगी। राजा ने अपनी माँ की पुण्यतिथि पर कुछ ब्राम्हाणों को भोज पर आमंत्रित किया।

ब्राम्हाणों ने राजा के सीधेपन का फायदा उठाया और भोजन ग्रहण करने के बाद एक-एक सोने का आम लेकर अपने-अपने घर को चले गए। इस बात की जानकारी जब राजा के प्रमुख विद्वान तेनालीराम को पता चली तो उसने उन ब्राम्हणों को सबक सीखने के लिए योजना बनाई। तेनालीराम ने अपनी माँ की पुण्यतिथि पर उन सभी ब्राम्हाणों को आमंत्रण भिजवाया।

तेनालीराम ने कहा कि इस अवसर पर मैं कुछ दान भी करना चाहता हूँ। क्योंकि, मेरी माँ की अंतिम इच्छा पूरी नहीं हो सकी थी। ब्राम्हाणों को लगा की तेनालीराम राजा का बहुत करीबी सलाहकार हैं। उसके पास अधिक धन होगा। तेनालीराम के निर्धारित दिन पर सभी ब्राम्हण आए। तेनालीराम और उसकी पत्नी ने उन्हें अच्छा-अच्छा स्वादिष्ट व्यंजन खिलाया। जिसे खाकर सभी ब्राम्हण बहुत खुश हुए।

इसके पश्चात सभी ब्राम्हण दान मिलने की प्रतीक्षा करने लगे। अचानक सभी की नजर तेनालीराम पर पड़ी। जोकि, आग में लोहे की चाकू को लाल कर रहे थे। तभी किसी ब्राम्हण ने पूँछा आप क्या कर रहे हो। तेनालीराम, ब्राम्हाणो से कहा, ”मेरी माँ के पैर में एक बड़ा फोड़ा हुआ था। जब मैं उसकी सिंकाई करने के लिए चाकू को गर्म कर रहा था तो उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया था। अब मैं अपनी माँ की आत्मा की शांति के लिए इस लाल चाकू से आप सभी की सिंकाई करूंगा। जिससे मेरी माँ को स्वर्ग प्राप्त हो सके।

तेनालीराम की बातों को सुनकर सभी ब्राम्हण बौखला गए। और वें वहाँ से चले जाना चाहते थे। उन लोगों ने गुस्से भरे स्वर में तेनालीराम से कहा, ”क्या हम लोगों को लोहे की चाकू से दागने से तुम्हारी माँ की आत्मा को शांति मिल जाएगी? तेनालीराम ने कहा, “महाराज! जब सोने के आम देने से राजा की माँ को आत्मा की शांति मिल सकती हैं तो मेरे ऐसा करने से क्यों नहीं मिलेगी। तेनालीराम की बातों को सुनते ही ब्राम्हाणों को समझ में आ गया कि वह क्या कहना चाहता हैं।

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सभी ब्राम्हाणों ने कहा आप हम लोगों को जाने दो। हम आपको सोने के आम वापस कर करते हैं। इस तरह से तेनालीराम सोने का आम वापस लेकर उन ब्राम्हाणों को जाने दिया। लेकिन, लालची ब्राम्हणों ने राजा के महल में जाकर सारी घटना को बता दिया। जिसे सुनकर राजा बहुत क्रोधित हुए। राजा सभी दरबारियों के सामने तेनालीराम को फटकार लगाते हुए कहा कि मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि तुम इतने ज्यादा लालची हो जाओगे।

तेनालीराम राजा को समझाते हुए कहा- “महाराज! मैंने लालच को रोकने के लिए ऐसा किया ना कि मेरे अंदर लालच थी।” तेनालीराम और आगे बताते हुए कहा- “आपकी माँ की पुण्यतिथि पर सोने का आम देने से आपकी माँ की आत्मा को शांति मिल सकती हैं तो मेरी माँ की पुण्यतिथि पर गर्म चाकू से माँ की पीड़ा कम क्यों नहीं हो सकती।” राजा कृष्णदेव राय को तेनाली राम की बात समझ आ गई। उन्होंने ब्राम्हाणों को आगे से लालच न करने की सलाह देते हुए घर जाने के लिए कहा।

कहानी से सीख:

दिखावे की धर्म भावना vs असली न्याय

2. सिक्के पर राजा का मुख:

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एक बार राजा कृष्णदेव राय अपने मंत्रियों के साथ दरबार लगाए बैठे थे। राजा अपने सभी मंत्रियों की परीक्षा लेना चाहा। राजा ने भरे दरबार में अपने मंत्रियों से कहा- “आज हम आप लोगों को सौ-सौ सोने के सिक्के देंगे।” राजा की बातों को सुनते ही सभी मंत्रियों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। राजा ने कहा- “लेकिन मेरी एक शर्त हैं, जिसे आप लोगों को मानना पड़ेगा।”

राजा ने कहा- “इन स्वर्ण मुद्राओ को बिना मेरा मुख देखे खर्च नहीं करोगे। अगर कोई इस नियम को तोड़ेगा तो उसे दंड दिया जाएगा।” इस प्रकार से राजा ने पैसों की एक-एक पोटली अपने मंत्रियों को दी। उस पोटली को लेकर सभी मंत्री अपने-अपने घर चले गए। और वे सभी इस चिंता में रहते हैं कि इन स्वर्ण मुद्राओं को कैसे खर्च किया जाए।

कुछ दिन बाद सभी मंत्री राजा के दरबार में आए। राजा ने सभी मंत्रियों से पूँछा कि “आप लोगों ने दिए गए स्वर्ण मुद्राओं को कहाँ-कहाँ खर्च किया”। सबसे पहले एक मंत्री ने दरबार में खड़े होकर कहा, ‘महाराज! हम लोग स्वर्ण मुद्राओं को खर्च नहीं कर पाए, हम स्वर्ण मुद्राओं को वापस करने के लिए आए हैं।

राजा ने तेनालीराम से पूँछा, ”तेनाली तुमने पैसों को कहाँ खर्च किया? तेनालीराम ने राजा को जबाब दिया कि, ”महाराज! मैं यह जो आकर्षक कपड़े और आभूषण पहना हुआ हूँ। यह उन्ही पैसों से खरीदें हुए हैं।” राजा ने अपनी कड़क आवाज में कहा- “तुम शर्त भूल गए क्या।”

तेनालीराम ने कहा, महाराज मैंने उन्ही शर्तों को ध्यान में रखते हुए कुछ भी खरीदने से पहले सिक्कों पर छपा आपका चित्र देख कर ही पैसे खर्च किए हैं। तेनालीराम की बातों को सुन कर राजा हँसने लगे और दरबार के सभी मंत्री सुन्न पड़ गए। राजा ने तेनालीराम की चतुराई और सूझबूझ के कारण उसे और स्वर्ण मुद्रा दिए गए।

कहानी से सीख:

नियमों को समझदारी से पढ़ना

3. कौवों की गिनती:

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राजा कृष्णदेव राय को तेनालीराम से अटपटे सवाल पूछने में बहुत मजा आता था। जबकि, तेनालीराम विद्वान होने के कारण राजा के हर सवाल का जबाब बहुत आसानी से दे देते थे। एक बार भरे दरबार में राजा ने तेनालीराम से एक सवाल का जबाब माँगा। राजा ने कहा- “तेनालीराम क्या तुम्हें पता हैं हमारे राज्य के कौवों की संख्या कितनी हैं? तेनालीराम ने कहा, हाँ महाराज! मुझे पता हैं कि अपने राज्य में कौवों की संख्या कितनी हैं।”

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राजा ने तेनालीराम से फिर कहा, “अगर तुम्हें सही जानकारी नहीं हैं तो तुम अभी भी मना कर सकते हो। हम तुम्हें कोई दंड नहीं देंगे।” लेकिन, अगर तुम बाद में नहीं बता पाए या फिर गलत जानकारी दी, तो तुम्हें सीधा मृत्यु दंड मिलेगा। राजा की बात सुनकर दरबार में बैठे अन्य मंत्री मन ही मन खुश होने लगे। वे लोग आपस में चर्चा करने लगे की पूरे राज्य में कौवों की संख्या का पता लगा पाना असंभव हैं।

तेनालीराम राजा के प्रश्नों का जबाव देने के लिए तैयार हो गया। राजा ने तेनालीराम को कौवों की संख्या बताने के लिए कहा, ”तेनालीराम राजा से कहता हैं, “महाराज आपके राज्य में दो लाख दस हजार पाँच सौ तीन कौवें हैं।” राजा तेनालीराम का जबाब पाकर आश्चर्य में पड़ गया और वह कहने लगा क्या हमारे राज्य में इतने कौवें हैं? तेनालीराम ने फिर से कहा, हाँ महाराज! यह संख्या न तो काम हैं, न ही ज्यादा। अगर आपको विश्वास नहीं हैं तो आप कौवों की संख्या की गिनती करवा सकते हैं।

राजा ने कहा, “अगर संख्या पता कराने के बाद कुछ कम ज्यादा हुए तो, तेनालीराम ने जबाब दिया- महाराज! पहली बात यह संख्या घट बढ़ नहीं सकती।” अगर कौवों की संख्या घटती हैं तो जरूर अपने राज्य के कुछ कौवें अपने रिश्तेदारों से मिलने गए होंगे। अगर यह संख्या बढ़ती हैं तो अवश्य ही किसी राज्य के कौवें इस राज्य के रिश्तेदारों से मिलने आए होंगे। इसी दशा में कौवों की संख्या घट-बढ़ सकती हैं। वरना आपको मेरे बताए गए संख्या के आधार पर कौवें मिलेंगे।

तेनालीराम का जबाव पाकर राजा बहुत खुश हुए। उन्हें कुछ स्वर्ण मुद्रा भी दी गई। दरबार में बैठे अन्य मंत्रियों के चहरे पर उदासी छा गई।

कहानी से सीख:

तर्क और बुद्धि से बड़ी कोई ताकत नहीं

🙋‍♂️ FAQs – तेनालीराम की मजेदार कहानी हिंदी में

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