जिंदगी में कई बार ऐसा वक्त आता है जब सब कुछ हाथ से निकलता महसूस होता है — न पैसे बचते हैं, न हौसला। लेकिन कुछ कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि हर मुश्किल वक्त एक दिन जरूर गुजर जाता है, बस सब्र और विश्वास बनाए रखना जरूरी है। यहां पढ़िए sabr aur vishwas ki kahaniyan in Hindi का यह संग्रह — एक गरीब मजदूर परिवार की दिवाली की भावुक कहानी, और एक राजा की कहानी जिसने सिर्फ चार शब्दों — “यह भी समय बीत जाएगा” — के सहारे अपना खोया हुआ राज्य फिर से पाया।
गरीब की दीपावली:
दिनेश ईंट के भट्टे पर मजदूरी करता था। उसके परिवार में तीन बच्चे और उसकी पत्नी रहते थे। दिनेश की कमाई कुछ ज्यादा नहीं थी। वह अपने बच्चों को अच्छे कपड़े जूते दिलाने के लिए कई बार सोचा। लेकिन वह दिला नहीं सका। क्योंकि उसकी आमदनी सिर्फ कमाने खाने तक ही रह जाती थी। दिनेश भी लाचार था, वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था।
उसकी पत्नी सविता बहुत ही समझदार थी। वह किसी तरह एक-एक पैसे बचाती रहती थी। जिसे वह मुश्किल समय में उपयोग करती थी। सविता अपने बच्चों को घर पर कोई न कोई हुनर सीखाती रहती थी। एक दिन दिनेश रात्री का भोजन कर रहा था। उसकी पत्नी ने कहा, “दिवाली का त्योहार आने वाला हैं। इस बार हम कैसे भी करके अपने बच्चों को नए कपड़े दिलाएंगे।”
दिनेश ने कहा, “ठीक हैं, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि दिवाली के इस त्योहार पर हमारे बच्चे नए कपड़े जरूर पहने।” दिनेश अब और अधिक मेहनत करने लगा। जिससे वह दिवाली तक कुछ अधिक पैसे जुटा सके। उधर सविता अपने बच्चों की खुशी के लिए लोगों के घर में जाकर झाड़ू-पोंछा करना शुरू कर दी। दिनेश और सविता दोनों मिलकर पैसे जोड़ने लगे।
लेकिन दिवाली के कुछ दिन पहले दिनेश के बच्चे की तबीयत खराब हो गई। वह अपने बच्चे को लेकर हॉस्पिटल गया। डॉक्टर ने उसके बच्चे को ऐड्मिट कर लिया। दिवाली के एक दिन पहले डॉक्टर ने कहा, “अब आपका बच्चा ठीक हैं, तुम इसे ले जा सकते हो। दिनेश हॉस्पिटल का बिल जमा करने ले लिए चला गया।
दिनेश की पत्नी सविता अस्पताल के बाहर अपने तीनों बच्चों के साथ मायूस बैठी थी। अचानक एक कार आकर उसके सामने रुकी। उस कार से हॉस्पिटल का मालिक निकला, वह अंदर जाने लगा। उसने देखा कि सविता अपने बच्चों के साथ मायूस बैठी थी। वह सविता के पास गया और उसके उदासी का कारण पूछा।
सविता ने सारी बात सच-सच बता दी। हॉस्पिटल के मालिक ने कहा, “तुम्हारा नाम सविता हैं क्या? तुम मेरे घर के बगल वाली कोठी में झाड़ू पोंछा करने आती हो न। उसने कहा हाँ, साहब मैं वही सविता हूँ।” मालिक अपने जेब से कुछ पैसे निकल कर उसे दे कर चला गया। इतने में सविता का पति दिनेश उसके पास आया उसने कहा, “सविता कुछ पैसे कम पड़ रहे हैं, हॉस्पिटल का बिल ज्यादा बना हुआ हैं।”
सविता ने कहा- “ये लो मेरे पास कुछ पैसे हैं। इससे बिल भर दो।” दिनेश बिल भरकर बाहर आ गया। वह अपने पत्नी और बच्चों को लेकर घर चला आया। उसकी पत्नी अपने पति को पकड़कर जोर-जोर से रोने लगी। उसने कहा, “हम दोनों ने सोचा था कि इस बार दिवाली पर हम अपने बच्चों को नए कपड़े दिलाएंगे। लेकिन अब हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं बचे हैं, कपड़े कहाँ से आएंगे।”
दिनेश ने कहा, “सविता भगवान पर भरोसा रखो सब ठीक हो जाएगा।” अगले दिन दिवाली थी सभी लोग अपने घरों को सजा रहे थे। लेकिन दिनेश के पास समान लाने के लिए पैसे तक नहीं थे। आज के दिन वह किसी से उधार भी नही लेना चाहता था। सविता फूलों को तोड़कर उसके माले से अपने घर को सजा दी थी। वह दूध में चावल डालकर खीर बना रही थी। शाम होने को आ चुकी थी आसपास के बच्चे नए-नए कपड़े पहनकर पटाखे फोड़ रहे थे।
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दिनेश घर के बहार मायूस बैठा था। उसके पास सविता आई उसे समझने लगी। कोई बात नहीं अगर भगवन की मर्जी नहीं हैं तो हम दिवाली नहीं मनाएंगे, चलो कुछ खा लो। इतने में कार से हॉस्पिटल का वही मालिक दिनेश के घर पर आया। उसे देख सविता डर गई। वह सोची कही हॉस्पिटल का और बिल तो नहीं रह गया। जिसे लेने मालिक आए हैं।
हॉस्पिटल का मालिक अपने ड्राइवर से कहा, “कार से समान निकालकर लाओ। वह दिनेश, सविता और उसके बच्चों के लिए नए-नए कपड़े और मिठाइयां लाया था। वह उन्हें उपहार भेंट करते हुए कहा, “यह छोटा सा दिवाली का उपहार मेरी तरफ से आपके लिए हैं।” मालिक ने कहा, “ये रहे पैसे जो आपने हॉस्पिटल में खर्च किए थे।” इसके अलावा ये कुछ पैसे मेरी तरफ से आपको दिवाली की भेंट हैं।
यह सब देख दिनेश, सविता और उसके बच्चों के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। उन्होंने हॉस्पिटल के मालिक का तहे दिल से धन्यवाद किया। सविता अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दिवाली मनाई। उस दिन उसे विश्वास हो गया कि जिसका कोई सहारा नहीं होता। उसका भगवान जरूर साथ देता हैं।
2. यह भी समय बीत जाएगा:

एक राजा शिकार करते-करते रास्ता भटक कर किसी साधु के आश्रम में पहुँच गया। वहाँ पहुँचकर राजा ने अपना परिचय दिया और महात्मा जी उनका बहुत आदर और सम्मान के साथ स्वागत किए। जब राजा अपने महल को वापस जाने लगा तो महात्मा जी उन्हें एक ताबीज देते हुए कहा- हे राजन! यह ताबीज अपने गले में पहन लो आप जब भी किसी बड़ी मुश्किल में पड़ोगे तो इसे खोल कर देख लेना आपको आपकी मुश्किल का हल मिल जाएगा।
लेकिन, हाँ मुश्किल वक्त से पहले इस ताबीज को मत खोलना। एक बार राजा के राज्य पर पड़ोसी राज्य के राजा हमला कर दिए। युद्ध में राजा परास्त हो गया और वह भागकर किसी और राज्य में शरण ले लिया। उसका राज्य छिन जाने के कारण राजा बहुत निराश रहने लगा। उसे कुछ सुझाई नहीं दे रहा था। एक दिन नहाते समय उसने अपने गले में ताबीज दिखा।
उसे याद आता हैं कि महात्मा जी ने कहा था, इस ताबीज को मुश्किल समय पर ही खोलना। राजा सोचता हैं कि इससे बुरा समय अब क्या होगा। राजा उस ताबीज को खोलकर देखता हैं तो उसमें एक भोजपत्र डाला हुआ था। जिस पर लिखा था- “यह भी समय बीत जाएगा” राजा को अपने आप पर विश्वास हुआ। कुछ समय बाद वह फिर से अपनी एक सेना तैयार करके अपने छीने हुए राज्य पर आक्रमण कर दिया और वह उस राज्य को दुबारा से जीत लिया।
नैतिक सीख:
समय बलवान होता हैं, इसलिए अपने समय की पहचान करें और आगे बढ़ें।
🙋♂️ FAQs – सब्र और विश्वास की कहानियां
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