यदि आप बच्चों के लिए हिंदी में अच्छी कहानियाँ खोज रहे हैं, तो यहाँ आपको मजेदार, छोटी और सीख देने वाली कहानियाँ मिलेंगी। ये कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति बढ़ाने के साथ अच्छे संस्कार भी देती हैं। बच्चों को हिन्दी स्टोरी सुनाने से अनेकों तरह के लाभ होते हैं। सबसे बड़ी बात बच्चे के अंदर सुनने की क्षमता बढ़ती हैं। इसलिए, हमें बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए उसे कहानी सुनाना आवश्यक होता हैं। ठीक इसी प्रकार से देखे तो आज की कहानी निम्न प्रकार से हैं।
1. बुद्धिमान मेंढ़क:
किसी नदी के किनारे एक चतुर मेंढ़क रहता था। एक कौवा कई दिनों से उसे पकड़ने का प्रयास कर रहा था। लेकिन मेंढ़क उसके हाथ ही नहीं आ रहा था। आखिरकार, एक दिन कौवे को मौका मिला गया। मेंढक आराम से बैठा धूप सेंक रहा था। तभी कौवे ने उसे पीछे से धर दबोचा और टाँग पकड़ कर आकाश में उड़ा गया।
बेचारा मेंढक घबराया तो बहुत लेकिन उसने साहस नहीं छोड़ा। वह अपने मुक्त होने की युक्ति सोचने लगा। उड़ते-उड़ते कौवा एक पेड़ पर जाकर बैठा। उसने कहा- “मरने के लिए तैयार हो जाओ, अब मैं तुम्हें खाऊंगा” मेंढक अब काफी संभल चुका था। वह मुस्कुराता हुआ बोला- हे कॉकराज! आप शायद इस पेड़ पर रहने वाली भूरी बिल्ली को नहीं जानते? वह मेरी मौसी है।
यदि तुमने मुझे जरा भी नुकसान पहुँचाया तो तुम्हारे प्राणों की खैर नहीं हैं। कौवा भयभीत हो उठा। उसने फिर से मेंढक की टाँग पकड़ी और उड़कर एक पहाड़ी पर जा बैठा। मेंढक सहमा हुआ था। उसने सोच लिया कि कौवा उसे छोड़ने वाला नहीं है। लेकिन, उसने अपने चेहरे पर भय की शिकन तक न आने दी। पहाड़ी पर पहुंचकर मेंढ़क ने कहा- “हे कॉकराज! यहाँ भी आपकी दाल गलने वाली नहीं हैं।”
यहाँ मेरा दोस्त भौं-भौं कुत्ता रहता है। यदि उसे पता चला कि तुम मुझे खाना चाहते हो तो वह तुम्हारे पंख नोच लेगा। कौवा निराश होकर वहाँ से उड़ा और एक नदी के किनारे जा बैठा। “मैं समझता हूँ कि यहाँ तुम्हें बचाने वाला कोई नहीं है।” कौवे ने मेंढक से कहा- “बेचारे मेंढक के हाथ पैर फूल गए थे।
फिर भी वह अपनी बुद्धि बल से सोच कर बोला- “कॉकराज अब तो मैं आपके ही हाथ में हूँ आप मुझे आराम से खा सकते हो। मगर कितना अच्छा होता कि तुम अपनी चोंच थोड़ा तेज कर लेते। जिससे मुझे कम कष्ट होगा।” कौवा मेंढक के बहकावे में आ गया उसने कहा- “अरे यह कौन-सी बड़ी बात है।” यह कहकर अपनी चोंच नदी के किनारे एक पत्थर पर घिसने लगा।
मेंढक के लिए इतना अवसर काफी था। उसने तुरंत उछलकर पानी में डुबकी लगा दी। बेचारा कौवा, तेज किया हुआ चोंच लेकर बैठ गया। तभी पानी में से एक आवाज आई- “ कॉकराज! चोंच तो आपने तेज कर ली अब बुद्धि भी अपनी तेज कर लो। तब मैं कहीं आपके हाथ आऊँगा। बेचारा कौवा अपनी मंदबुद्धि पर तरस खा रहा था।
कहानी से सीख:
परिस्थितियाँ कैसी भी हो बुद्धि और साहस के साथ समस्या का हल निकालना चाहिए।
2. राजा और बेरोजगार व्यक्ति:

विजयगढ़ राज्य में एक शक्तिशाली राजा भानु प्रताप रहता था। एक दिन राजा जंगल में अकेले अपने घोड़े पर शिकार के लिए गया। अचानक उसका घोड़ा बेकाबू हो गया और वह घोड़े से गिर गया। यह देख एक व्यक्ति ने उसी समय उन्हें उठाया उनकी देखभाल की तथा उन्हें पानी पिलाया। राजा अब ठीक अवस्था में था। राजा ने मदद के लिए उसका शुक्रिया अदा किया, तथा उससे उसका नाम और कार्य के बारे में पूछा।
उस व्यक्ति ने अपना नाम मोहन बताया और उसने कहा कि मैं बेरोजगार हूँ। राजा ने व्यक्ति को अपने महल में पहरेदारी करने के लिए प्रस्ताव दिया। अगले दिन व्यक्ति राजदरबार में पहुंच गया। राजा ने व्यक्ति को कार्य के विषय में समझाते हुए कहा- “उसे पूरी रात पहरेदारी करनी होगी, सोना नहीं होगा। अगर कभी सोते हुए पाए गए तो सजा मिलेगी।
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व्यक्ति को बहुत दिन हो गए थे महल की पहरेदारी करते हुए। एक रात राजा के महल की रोशनी बंद होते ही वह भी सो गया। उस व्यक्ति ने उस रात एक सपना देखा कि राजा एक शहर जा रहे हैं। और वहाँ भूकंप आ गया। अगले ही दिन राजा दूसरे शहर जाने के लिए तैयार हो रहे थे कि उस व्यक्ति ने उन्हें अपने सपने के बारे में बताया।
राजा उसकी बात सुनकर रुक गया और तभी खबर मिलती हैं कि सच में वहाँ भूकंप आ गया हैं। अगले दिन राजा ने उस व्यक्ति को बुलाया और अपने गले से सोने की माला उपहार देकर अगले दिन से नौकरी पर ना आने का हुक्म दिया। तो बच्चों! राजा ने उस व्यक्ति को उपहार सिर्फ जान बचाने के लिए दिया और नौकरी से इसलिए निकाला क्योंकि उसने अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं निभाई। वह अपनी ड्यूटी के समय सो गया था।
कहानी से सीख:
वाह-वही के चक्कर में हम अपनी हकीकत बता देते हैं।
3. मन के अशुद्ध विचार:

तीन चार लोग एक स्थान पर बैठकर आपस में बातें कर रहे थे। बातों ही बातों में वे किसी न किसी की बुराई और छींटाकशी कर रहे थे। किसी को बेईमान, किसी को कामचोर तो किसी को रिश्वतखोर और न जाने किस-किस रूप में चरित्र हनन करने का आरोप लगा रहे थे। इन बातों में उन्हें बहुत मजा आ रहा था। वह हर बात को बढ़ा-चढ़ा कर बोल रहे थे। इसी दौरान उन्हें खाना परोसा गया।
खाना खाते-खाते किसी के मुँह में कंकर आ गया, तो किसी के मुँह में बाल आ गया। उनके मुँह से अब तक जो बुराई और क्रोध दूसरों के बारे में निकल रहा था। अब उनके खाने में कंकड़ और बाल ने और भी भड़का दिया। अब वे लोग और भी अशान्त और अमर्यादित हो गए। तभी एक विवेकी पुरुष वहाँ आया और बोला- “इस खाने में कंकर और बाल मैंने डाले थे।”
क्योंकि मैं तुम्हारी बातें सुन रहा था और तुम्हें बताना चाहता था कि “तुम केवल वही खाना चाहोगे जो खाने योग्य है। तुम बाल और कंकर-पत्थर नहीं खाना चाहोगे। क्योंकि वे तुम्हारी सेहत को खराब कर देंगे।” मैं देख रहा था कि तुम ना जाने कितने अशुद्ध विचारों से अपने मन को मलिन करते जा रहे थे।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि अगर अशुद्ध भोजन हमारे स्वास्थ्य शरीर को खराब कर सकता है तो अशुद्ध विचार भी अवश्य ही हमारे मन को अशुद्ध कर देंगे। जीवन में जो भी स्वच्छ, निर्मल, शुद्ध एवं स्वास्थ्यवर्धक हो वही खाएं, वही सोच, वही बोले और वही कर्म करें। हर वह कर्म जिससे जीवन में आनंद एवं संतुष्टि का अनुभव हो वह कार्य ही उत्तम एवं श्रेष्ठ होता है। कसौटी यह है कि क्या मुझे अमुक कार्य करने पर आनंद मिला और अगर मिला तो परम शुभ है।
कहानी से सीख:
विचारों की ताकत को कम नहीं समझना चाहिए।
4. अभ्यास का महत्त्व:

गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में कौरव, पांडव, यदुवंशी और दूसरे देशों के राजकुमारों के साथ द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा भी शिक्षा प्राप्त करता था। प्रतिदिन पढ़ाई शुरू होने से पहले सभी शिष्यों को आश्रम से कुछ दूर बह रही नदी से पीने के लिए पानी भर कर लाना पड़ता था। द्रोणाचार्य अपने पुत्र से बहुत प्यार करते थे। वह चाहते थे, उनका पुत्र शिक्षा और अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में सबसे योग्य निकले।
इसलिए, उन्होंने अश्वत्थामा को सबसे हल्का और छोटा बर्तन दे रखा था। जबकि, अन्य शिष्यों को बड़े और भारी बर्तन दे रखे थे। सुबह सब शिष्य पानी भरने जाते थे। अश्वत्थामा का बर्तन छोटा था। इसलिए वह जल्दी लेकर आ जाता था। अन्य शिष्यों के बर्तन बड़े थे इसलिए वे देर से और धीरे-धीरे लाते थे। अश्वत्थामा जल्दी आश्रम लौटकर अपने पिता से अस्त्र-शस्त्र चलाने के गुप्त रहस्य सीख लेता था।
एक दिन अर्जुन ने यह बात पता कर ली। वह भी शिक्षा और युद्ध कौशल में अश्वत्थामा से कम नहीं रहना चाहता था। इसलिए, अर्जुन दौड़कर जाते, बर्तन में पानी भरकर तेज कदमों से चलकर आश्रम में पहुँच जाता। साथ पहुँचने की वजह से अर्जुन को भी अश्वत्थामा के बराबर ही शिक्षा मिलने लगी।
एक बार की बात है। सभी शिष्य आश्रम में भोजन कर रहे थे। अचानक तेज हवा चलने लगी। हवा से आश्रम में जल रहा दीपक बुझ गया और आश्रम में अंधकार छा गया। अंधेरा होने पर भी सभी शिष्य भोजन करते रहे। भोजन करते समय अचानक अर्जुन का ध्यान एक बात पर गया। खाना खाने का मनुष्य को इतना अभ्यास होता है कि अंधेरे में भी थाली से खाना उठाकर हाथ सीधा मुँह के पास ही पहुँचता है।
इस बात से अर्जुन के मन में विचार आया, “इंसान को खाने का अभ्यास होता है। इसलिए अंधेरे में भी इंसान का हाथ भोजन के बर्तन से बिना भटके मुँह तक पहुँचता है।” अर्जुन के मन में एक विचार आया कि निशाना लगाने के लिए प्रकाश की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है सिर्फ अभ्यास की। जरूरत है प्रयत्न करने की।
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अर्जुन ने मन ही मन में दृढ़ निश्चय किया कि वह अंधेरे में ही निशाना लगाने का अभ्यास करेगा। अर्जुन ने अपना विचार किसी को नहीं बताया। खाना खाकर सब शिष्य अपनी-अपनी चटाइयों पर लेट गए। सबको लेटते ही नींद आ गई। लेकिन अर्जुन की आँखों में नींद नहीं थी। जब सब गहरी नींद में सो गए, अर्जुन अपना धनुष और तीर उठाए धीरे से आश्रम के बाहर निकल गए।
अर्जुन आश्रम से कुछ दूरी पर जंगल में चले गए। जंगल में घनघोर अंधेरा था। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। अर्जुन ने अंधेरे में अपना लक्ष्य बनाया और वह निशाना साधकर तीर चलाने लगा। उस रात के बाद, अर्जुन हर रात को अपने साथियों के सो जाने के बाद अंधेरे में बाण चलाने का अभ्यास करने लगा।
एक रात की बात है। द्रोणाचार्य की अचानक नींद टूट गई। तभी उन्हें कुछ आवाज सुनाई पड़ी। ध्यान से उन्होंने उस आवाज को सुना। उन्हें ऐसा लगा मानो कोई तीर चला रहा है। कौन हो सकता है? द्रोणाचार्य धीरे से उठे आश्रम से निकलकर उस आवाज की दिशा में चले गए। उन्होंने देखा कि घोर अंधकार में कोई तीर चला रहा है। कौन है तीर चलाने वाला; यह जानने के लिए उन्होंने तेज आवाज में पूछा, “कौन हो तुम? अंधेरे में क्या कर रहे हो?
“मैं अर्जुन”, अर्जुन द्रोणाचार्य की आवाज पहचान गया। इसलिए डरते हुए बोला, “गुरुजी मैं निशाना लगाने का अभ्यास कर रहा हूँ।” बेटा ऐसे अंधेरे में? द्रोणाचार्य आश्चर्य से बोले। “अंधेरे में आदमी थाली से रोटी का निवाला तोड़कर मुँह तक डाल सकता है तो फिर अभ्यास करके अंधेरे में निशाना क्यों नहीं लगाया जा सकता?”
गुरु द्रोणाचार्य को अपने शिष्य भावना को समझने में देर नहीं लगी। द्रोणाचार्य अर्जुन को गले से लगाते हुए कहा, “बेटा मैं वचन देता हूँ कि- “मैं ऐसा प्रयास करूँगा कि संसार में तुमसे बड़ा कोई धनुर्धर नहीं होगा।” और उस दिन से द्रोणाचार्य अर्जुन पर विशेष ध्यान देने लगे।
कहानी से सीख:
लगातार प्रयास और लगन से हम किसी भी चीज में महारथ हसिल कर सकते हैं।
🙋♂️ FAQs – Stories for Childrens in Hindi
Hello, I’m Reeta, a passionate storyteller and a proud mom of two. For the past 8+ years. I have been writing Hindi stories that teach moral values and bring happiness to children. On Kahanizone, I share Hindi kahaniyan, Panchatantra stories, bedtime tales and motivational kahaniyan that parents trust and kids enjoy. As a mother, I know what children love to hear, and through my stories I try to give them imagination, values, and joy. My aim is to entertain, inspire, and connect with readers of all ages.
