एक बार की बात हैं, सोमपुर गाँव में एक पंडित रहता था। वह बहुत गरीब था। किसी तरह गाँव के बच्चों को शिक्षा-दीक्षा देकर थोड़े-बहुत पैसे कमा लेता था। किसी तरह वह गरीबी में अपना जीवन यापन कर रहा था। लेकिन, पंडित के अंदर एक खूबी यह थी कि उसे वैदर्भ मंत्र का ज्ञान था।
पंडित के वैदर्भ मंत्र पढ़ने से आकाश से हीरे-मोती, सोना-चांदी जैसे जवाहरातों की वर्षा होती थी। लेकिन, समस्या यह थी कि वैदर्भ मंत्र तभी पढ़ा जा सकता था, जब नक्षत्र चाँद सितारों का योग बनता हो। जबकि, पंडित के लिए यह पता कर पान कठिन था कि ऐसा योग कब बनता हैं। क्योंकि, इस तरह के योग साल भर में एक बार कुछ ही मिनटों के लिए बनता था।

पंडित अपनी गरीबी दूर करने के लिए कई महीनों से आकाश की तरफ निगाहे लगाए रहता था। जिससे वह वैदर्भ मंत्र की सहायता से जावहरात को इकट्ठा करके धनवान बन जाए। लेकिन, उसे वह योग पता नहीं चला सका। जिससे आभूषणों की वर्षा करवा सके।
एक दिन पंडित बैठे-बैठे सोच रहा था कि मेरी किस्मत में गरीबी ही लिखी हैं। मैं ऐसे योग के चक्कर में कब तक आकाश को ही देखता रहूँगा। गरीबी से तंग आकर उसने शहर जाने का मन बन लिया। उसके साथ उसका एक परम शिष्य भी चल दिया।
शहर जाने के लिए जंगल के रास्ते से होकर जाना पड़ता था। उसी जंगल में डाकुओं का एक गिरोह रहता था। जो मौका पाते ही उधर से जाने वाले लोगों को लूट लेते थे। एक डाकू के दल की नजर जंगल से जाते हुए पंडित और उसके शिष्य पर पड़ी।
फिर क्या, डाकुओं ने उन दोनों पर टूट पड़े और उनकी तलासी लेना शुरू कर दिया। लेकिन, पंडित और उसके शिष्य के पास एक पोटली में सिवाय चने के सत्तू और आचार के आलवा कुछ भी नहीं मिला।
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पंडित डाकुओं के सामने दोनों हाथ जोड़कर बोला- “मेरे पास कुछ नहीं हैं, मैं बहुत गरीब हूँ मुझे जाने दो। डाकुओं के सरदार ने कहा, “मेरा नाम डाकू माधो सिंह हैं, मेरा नाम सुनते ही दूर-दूर के लोग काँप जाते हैं। मैं, पत्थर से भी पैसा निकाल लेता हूँ। अगर अपनी सलामती चाहते हो तो तुम अपने चेले को घर भेजकर एक हजार रुपये माँगा लो।
डाकुओं ने पंडित को खुले आसमान में एक पेड़ से बांध दिया। चेले ने पंडित को धैर्य दिलाते हुए कहा, “गुरु जी आप चिंता मत करो। मैं गाँव जाकर पैसों का इंतजाम करके आता हूँ। लेकिन, ध्यान रहे आप वैदर्भ मंत्र के बारें में डाकुओं से मत बताना नहीं तो वे आपको सदा के लिए बंदी बना लेंगे। इतना कहकर शिष्य गाँव की तरफ चला गया।

ठंड का मौसम था, सर्दी बढ़ने लगी पंडित ठिठुर रहा था। भगवान से मदद माँगने के लिए उसने अपने दोनों हाथों को जोड़कर आकाश की तरफ देख तो चौंक गया। आकाश में चाँद सितारों का महायोग बन रहा था। जिसमें वैदर्भ मंत्र पढ़ा जा सकता था।
पंडित अपनी जान बचाने के लिए उतावला हो उठा। वह अपने शिष्य की कही बात को भूल गया। उसने डाकू माधो सिंह से कहा, “सरदार अगर मैं आसमान से जावहरातों की बारिश करवा दूँ तो आप मुझे छोड़ दोगे”?
पंडित की बात सुनकर सभी डाकू हँस पड़े और कहने लगे, “लगता हैं ठंड के कारण पंडित का दिमाग हिल गया हैं।” डाकुओं के सरदार ने कहा चलो पंडित से मजे लेते हैं। देखते हैं कैसे वह जवहारातों की बारिश करवाता हैं। पंडित ने खुले आसमान में बैठकर वैदर्भ मंत्र पढ़ा और आसमान से आभूषणों की बारिश हो गई।
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डाकू माधोसिंह के आदेश पर उसके साथी जवाहरात को एकट्ठा करके पोटली बनाने लगे। तभी उस जंगल का सबसे खूंखार डाकू ‘रंजीत सिंह’ अपनी गिरोह लेकर वहाँ आ पहुँचा। उसने कड़क आवाज देते हुए माधो सिंह और उनके साथियों से कहा, “यह सभी जवाहरात मुझे दे दो नहीं तो मैं तुम लोगों को यहीं दफन कर दूँगा।
तभी माधोसिंह ने अन्य दल के सरदार से कहा, “भाई रंजीत सिंह इस पंडित को ले जाओ। इसने ही आसमान से इन जवाहरातों की वर्षा करवाई हैं। उसने पंडित को दबोच लिया और कहा, “चल पंडित, आभूषणों की वर्षा करवा।”
पंडित हड़बड़ा गया और कहा, “अब आभूषणों की वर्षा नहीं हो सकती, मुहूर्त निकल चुका हैं। जोकि साल में एक बार ही होता हैं। उसकी बात को सुनकर रंजीत सिंह गुस्से से लाल-पीला हो उठा। उसने अपनी तलवार निकली और पंडित की पेट में घुसा दिया। जिससे पंडित की अकाल मृत्यु हो गई।”
आभूषणों के लिए दोनों दलों के डाकुओं के बीच मार-काट शुरू हो गया। कुछ घंटों बाद दोनों दलों के सभी डाकू मारें गए। अब दोनों सरदार माधो सिंह और रंजीत सिंह ही बचे थे। दोनों में भी लड़ाई काफी देर तक चलती रही। लेकिन, दोनों हार नहीं मान रहे थे।
तभी माधोसिंह ने कहा, “हम दोनों के साथी मारे गए हैं। अगर दोनों इसी तरह से लड़ते रहे तो यह धन कोई और लेकर चला जाएगा। हमें इस धन को आधा-आधा बांटने में ही भलाई हैं। दोनों डाकू इस बात पर सहमत हो गए।

दोनों ने आभूषण को एक पोटली में बांध लिया। रंजीतसिंह ने कहा, “भूख जोरों को लगी हैं। पहले चलो कुछ खा लेते हैं फिर आभूषण का बँटवारा करेंगे।” माधो सिंह खाना लाने के लिए पास के ढाबे पर चल गया। उसने वही पर जमकर खाना खा लिया और रंजीत सिंह के खाने में जहर मिला दिया जिससे उसे आभूषणों में बंटवारा न करना पड़े।
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उधर रंजीत सिंह तलवार लेकर एक झाड़ी में छिप गया। उसने सोच माधो सिंह के ऊपर पीछे से वार कर दूँगा। जिससे सारे जवाहरात मुझे मिल जाएगा। जैसे ही माधो सिंह वहाँ पहुँचा रंजीत सिंह ने पीछे से तलवार से वार कर दिया। जिससे वह गिर पड़ा और दम तोड़ दिया। उसे मारकर रंजीत सिंह बहुत खुश हुआ।
उसने सोचा, अब तो सारा धन मेरा हो गया। चलो कुछ खाना खा लेते हैं। फिर घर चलेंगे जैसे- उसने खाना खाया उस खाने में जहर मिले होने के कारण वह तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। कुछ समय बाद पंडित का शिष्य एक हजार रुपये लेकर अपने गुरु को छुड़ाने वहाँ पहुँचा। उसने यह सब नजारा देखकर समझ गया कि गुरुजी ने डाकुओं को वैदर्भ मंत्र से जवाहरात की वर्षा कराने की गलती कर दी।
नैतिक शिक्षा:
लालच इंसान को बहुत बडे गड्ढे में गिराती हैं, जहाँ से उसका निकल पाना आसान नहीं होता।
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