नीलू मुंबई में अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ रहता था। नीलू को अपने दादा-दादी से अत्याधिक लगाव हो गया था। वह अपने दादा-दादी के बिना नहीं रह पता था। नीलू के दादा को भी अपने पोते से अधिक लगाव था। पूरा परिवार खुश रहता था। लेकिन, नीलू की मम्मी को लगने लगा की उसके दादा-दादी के रहने से उनकी स्वतंत्रता खत्म हो गई हैं।
नीलू की मम्मी सप्ताह में एक बार बाहर किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने जाना चाहती थी। जोकि, दादा-दादी को पसंद नहीं था। उनका मनना था कि घर का फ्रेश खाना, खाना चाहिए। इसलिए, नीलू की मम्मी अपनी मर्जी से जिंदगी नहीं जी पाती थी। किसी तरह से उन्होंने अपने पति को मना कर दादा-दादी को गाँव भिजवा दिया। उस दिन जब नीलू स्कूल से घर आया तो उसने घर पर दादा-दादी को नहीं देखा।
उसने अपनी मम्मी से उनके बारें में पूछा। उसकी मम्मी ने कहा, “बेटा! आपके दादा-दादी को गाँव में कुछ काम हैं। इसलिए, वे वापिस गाँव चले गए हैं। कुछ दिन बाद फिर आ जाएंगे। धीरे-धीरे गाँव में दादा-दादी को कई महीने बीत गए। उन्हें जब भी अपने पोते की याद आती वे फोन पर बात कर लेते थे। नीलू को भी दादा-दादी की बहुत याद आती थी।
रविवार के दिन नीलू घर पर अपने कमरे में मायूस बैठा हुआ था। रसोई से उसकी मम्मी उसे खाने के लिए आवाज लगाए जा रही थी। लेकिन, वह अपनी मम्मी की आवज पर ध्यान नहीं दे रहा था। नीलू की मम्मी रसोई से उसके कमरे में आकर देखती हैं कि नीलू मायूस बैठा हैं। मम्मी ने पूछा, ‘नीलू क्या हुआ? मायूस क्यों बैठे हो’? मैं तुम्हें खाना, खाने के लिए बुला रही थी।
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नीलू ने अपनी मम्मी से कहा, “दादा-दादी कब आएंगे? आपने कहा था, “गाँव में कुछ काम हैं उसे करके जल्दी वापिस आ जाएंगे, लेकिन अभी तक नहीं आए।” मुझे दादा-दादी की बहुत याद आ रही हैं। नीलू की मम्मी ने गुस्से से कहा, “अब तुम्हारे दादा-दादी कभी वापिस नहीं आएंगे। वे अब गाँव में ही रहेंगे।” यह बात सुनकर नीलू की आँखों में आँसू भर आए। क्योंकि, वह अपने दादा-दादी से बहुत प्यार करता था।

लेकिन, वह अपनी मम्मी का विरोध भी नहीं कर सकता था। नीलू बहुत ही होनहार और मेहनती बच्चा था। वह हर काम को बड़ी मेहनत और लगन से करता था। एक दिन शाम को नीलू कुर्सी मेज पर बैठकर पढ़ाई कर रहा था। उसके पास उसकी मम्मी भी बैठी थी।
तभी उसके पापा ऑफिस से आए और देखा कि नीलू पढ़ाई कर रहा था। वे खुश होकर बोले, “नीलू बेटा! इस बार तुम कक्षा में प्रथम आए तो हम तुम्हें तुम्हारी पसंद की चीज दिलाएंगे।
नीलू ने कहा, “ठीक हैं! जब मैं अपनी कक्षा में प्रथम आऊँगा तो आपको बताऊँगा कि मुझे क्या चाहिए। कुछ दिन बाद परीक्षा हुई, नीलू ने जमकर मेहनत की। परीक्षा का परिणाम आया और नीलू ने परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया। नीलू को स्कूल में सम्मानित किया गया। उसके अध्यापक ने कहा- “नीलू बहुत होनहार बच्चा हैं। एक दिन जरुर अपने माता-पिता और इस शहर का नाम रौशन करेगा।”
शाम को जब नीलू स्कूल से घर आया तो देखा उसका घर सजा हुआ था। उसके कुछ दोस्त और माता-पिता ने घर पर उसके स्वागत के लिए अच्छी तैयारी की थी। सभी ने नीलू का भव्य स्वागत किया। नीलू की मम्मी बोली, “नीलू बेटा हमने तुमसे वादा किया था कि जब तुम प्रथम आओगे तो हम तुम्हें तुम्हारा मनचाहा उपहार देंगे। बताओ तुम्हें क्या चाहिए।
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नीलू ने अपने मम्मी-पापा से पूछा- “क्या आप सच में मुझे मेरी पसंद का उपहार देंगे, जो मुझे चाहिए?” ‘हाँ,… हाँ क्यों नहीं बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?” नीलू ने अपने दोनों हाथों को जोड़कर कहा, अगर आप कुछ देना चाहते हैं तो, आप दादा दादी को वापिस घर पर बुला लीजिए। उन्हें गाँव में कितनी मुश्किलें उठानी पड़ रही होगी। वहाँ पर उनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं हैं।
नीलू की बात सुनकर उसके मम्मी-पापा का सिर शर्म से नीचे झुक गया। उन्होंने नीलू से वादा किया कि कल वे दोनों दादा-दादी को लेने गाँव जाएंगे। अगले दिन उसके पापा-मम्मी, दादा-दादी को गाँव से लेकर वापिस घर आ गए। नीलू अपने सामने दादा-दादी को देख खुशी से उछल पड़ा और जाकर उनके गले से लग गया। नीलू की खुशी देख उसके माता पिता की आँखें भर आयी।
नैतिक सीख:
हमारे बुजुर्ग घर में एक वृक्ष के समान होते हैं। जिनकी छाया में बैठकर हमें ठंडक मिलती हैं।
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