10 हिंदी नैतिक कहानियाँ | जीवन की सीख देने वाली प्रेरणादायक कहानियाँ

📅 Published on July 21, 2025
🔄 Updated on March 28, 2026
You are currently viewing 10 हिंदी नैतिक कहानियाँ | जीवन की सीख देने वाली प्रेरणादायक कहानियाँ
AI generated illustration

बच्चों और बड़ों दोनों के लिए सीख देने वाली हिंदी कहानी पढ़ना केवल मनोरंजन नहीं बल्कि जीवन को समझने का आसान तरीका भी है। यहाँ 10 हिंदी नैतिक कहानियाँ दी गई हैं जिनमें हर कहानी के अंत में एक महत्वपूर्ण सीख छिपी है। ये कहानियाँ सरल भाषा में लिखी गई हैं ताकि बच्चे आसानी से समझ सकें और बड़े भी इन्हें परिवार के साथ पढ़ सकें।

1. डरपोक पत्थर:

किसी नदी के किनारे दो पत्थर पड़े थे। दोनों बहुत ही आराम से रहते थे। कभी-कभी पानी की लहरें उन्हे नहला भी देती थी। इस तरह से उनके जीवन में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। उन्हें सुख-ही सुख था। समय बीतता गया एक दिन एक शिल्पकार पत्थर की तलास में नदी के किनारे आया।

उसने दोनों पत्थर को अपने साथ ले गया। अगले दिन उस व्यक्ति ने छेनी और हथौड़ी लेकर पहले वाले पत्थर को काटने लगा। शिल्पकार ने जैसे ही पहले पत्थर पर हथौड़ी चलाया कि वह पत्थर मुझे मत तोड़ो, मुझे मत तोड़ो कहते हुए चिल्लने लगा। शिल्पकार उस पत्थर को छोड़ दिया। उसने दूसरे पत्थर को उठाया और उसे अपने छेनी और हथौड़ी से उस पत्थर को मूर्ति का रूप दे दिया।

कुछ दिन बाद एक व्यक्ति मूर्ति खरीदने आया। वह उस मूर्ति को ले जा रहा था। तो उसने देखा एक पत्थर पड़ा हैं। उसने पड़े हुए पत्थर को भी अपने साथ ले गया। उस व्यक्ति ने मूर्ति को मंदिर में लगा दिया। जबकि दूसरे पत्थर को मंदिर के बाहर रख दिया। अब लोग छेनी और हथौड़ी से काटे गए पत्थर की मूर्ति पर जल और दूध चढ़ाते उसकी पूजा करते।

जबकि, दूसरे पत्थर पर लोग नारियल तोड़ते जिससे उस पत्थर को पूरे जीवन दर्द झेलना पड़ता रहा। जबकि, मूर्ति बने पत्थर को एक बार दर्द हुआ। लेकिन लोग अब उसकी पूजा करना शुरू कर दिए थे।

नैतिक सीख:

मुश्किलों से डरकर भागने से अच्छा उसका सामना करना चाहिए।

2. अनमोल खजाना:

moral-story-for-kids-in-hindi
Image sources: bing.com

एक समय की बात हैं एक साधु महात्मा किसी गाँव में प्रवचन देने जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति अपने खेत के किनारे मायूस बैठा हैं। साधु महात्मा ने उस व्यक्ति के पास जाकर पूछे। क्या हुआ? तुम इतना उदास क्यों बैठे हो। उस व्यक्ति ने कहा, “महाराज! मेरे पास पैसा कमाने का कोई साधन नहीं हैं। मेरे बच्चे भूखे हैं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा मैं क्या करू।”

साधु महात्मा ने कहा, “तुम्हारे समस्या का हल हैं मेरे पास, अभी जल्दी में हूँ। वापस आते समय बता कर जाऊंगा।” साधु महात्मा प्रवचन देने चले गए। महात्मा जी को वापस आते समय रात अधिक हो गई। लेकिन उन्होंने आपने वादे के अनुसार उस व्यक्ति के घर पर गए और उससे कहा, “एक बार मैं प्रवचन देकर वापस आ रहा था तो देखा था कि कुछ लोग किसी गाँव से लूटे हुए धन को तुम्हारे खेत में छिपा रहे थे।

और स्टोरी पढ़ें: 5 शिक्षा और मनोरंजन से भरपूर पंचतंत्र की कहानियाँ

लेकिन मुझे वह जगह ठीक से मालूम नहीं हैं। तुम इस खेत की खुदाई करो, देखना धन तुम्हें जरूर मिलेगा। इतना कहकर साधु अपने कुटिया को चला गया। उस व्यक्ति ने अगली सुबह पूरे खेत खुदाई कई बार किया। लेकिन उसे कुछ नहीं मिला। उसी रात साधु महात्मा ने उस जोते हुए खेतों में बीज डाल दिया।

अगले दिन बारिश भी हो गई। देखते-देखते उस खेत में गेंहू की अच्छी फसल तैयार हो गई। एक दिन वह व्यक्ति उसी रास्ते से जा रहा था। उसने देखा की उसके खेत में लहलहाते हुए फसल लगे थे। जिसे देख वह व्यक्ति बहुत खुश हुआ।

नैतिक सीख:

मेहनत के बल पर हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं।

3. कोहरे से सीख:

ठंड का महीना था, सीतलहर चल रही थी। सुबह के आठ बजने को थे। लेकिन कोहरा अधिक पड़ने के कारण दो मीटर से अधिक दूर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। राजू को परीक्षा देने जाना था। बाहर का मौसम देखकर ठंड के कारण राजू के दाँत किटकिटा रहे थे। लेकिन राजू बिना देरी किए अपनी साइकिल लेकर परीक्षा देने निकाल पड़ा।

राजू साइकिल बहुत धीरे-धीरे चला रहा था। जैसे-जैसे राजू आगे बढ़ता जाता उसे आगे का रास्ता और दिखाई देने लगता। राजू की आँखों की पलक और बालों पर ओस की बूंदे पड़ी हुई थी। किसी तरह राजू परीक्षा केंद्र तक पहुंचकर परीक्षा दे कर निकला तो मौसम बिल्कुल साफ हो चुका था। वह घर आकर अपने दादा जी से आज की पूरी घटना को बताया।

दादा जी ने कहा, “बेटा राजू तो आज तुमने कोहरे से क्या सीखे? राजू ने कहा, “दादा जी सबसे बड़ी सीख “जीतना रास्ता दिख रहा हैं वहाँ तक चलो, आगे का रास्ता अपने आप दिखने लगेगा। इसके अलाव, मैंने एक और बात सीखी परिस्थितियाँ हमेशा एक जैसी नहीं रहती। आज अगर हमारे जीवन कोहरे की तरह अंधेरा हैं तो एक समय ऐसा भी आएगा कि जीवन में उजाला भी होगा।

नैतिक सीख:

परिस्थितियाँ हमेशा एक जैसी नहीं रहती, कठिन दौर के बाद अच्छा दौर भी आता हैं।

4. संगत की असर:

sangat-ka-asar-hindi-kahani
Image sources: bing.com

सुरेश बहुत ही होशियार लड़का था। उसके अंदर संस्कार कूट-कूट कर भरे थे। वह हमेशा लोगों के निगाह में रहता था। लोग उसकी तारीफ करते थे। कुछ समय बाद सुरेश अपने स्कूल के कुछ ऐसे बच्चों के साथ रहने लगा। जो अपनी खराब हरकतों के कारण लोग आए दिन उनके घर पर शिकायत लेकर जाते थे। बिगड़े हुए दोस्तों के साथ रहते-रहते सुरेश के व्यवहार में भी बदलाव होने लगा।

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने के बाद सुरेश अपने दोस्तों के साथ सिगरेट पी रहा था। अचानक उसी रास्ते से उसके पिता घर को जा रहे थे। सुरेश को सिगरेट पीते देख उसके पिता बहुत दुखी हुए। शाम को जब सुरेश घर आया तो उसके पिता ने उसे उसके सामने सिगरेट की डिब्बी रखते हुए कहा, “बेटा, क्या तुम्हें पता हैं यह सिगरेट तुम्हारे जीवन को किस तरह बर्बाद कर सकता हैं।”

इसे भी देखें: सच्चाई की जीत : ईमानदार लकड़हारा और जलपरी

उसके पिता ने काँच का बोतल लिया उसमें सभी सिगरेट को एक-एक करके जला कर डाल दिया। ऊपर से उस बोतल का ढक्कन बंद कर दिया। कुछ समय बाद सुरेश को समझाते हुए कहा, “बेटा! मन लो यह बोतल तुम्हारी शरीर हैं। जिसमें तुम सिगरेट डाल रहे हो उसका प्रभाव जिस तरह यह बोतल काला हो गया हैं। ठीक इसी प्रकार यह तुम्हारे शरीर को प्रभावित करता हैं। पिता की बात सुनकर सुरेश का सिर शर्म से नीचे झुक गया।

नैतिक सीख:

संगत से गुण आते है और संगत से ही गुण जाते हैं। इसलिए हमें अच्छे लोगों की संगत में रहना चाहिए।

5. गुस्से में निर्णय मत लो:

रामू एक मजदूर आदमी था। उसके घर का गुजारा मजदूरी करने पर ही चलता था। एक दिन रामू मजदूरी करने गया था। उस दिन उसे कोई काम नहीं मिला वह उदास होकर घर वापस चला आया। पूरे दिन घर पर बैठा रहा। वह सोचता रहा कि उसके घर का खर्च कैसे चलेगा। अगले दिन रामू फिर काम की तलाश में बाहर गया।

लेकिन उसे उस दिन भी उसे कोई काम नहीं मिला। वह गुस्से से भर गया उदास होकर घर आया उसने अपनी पत्नी के जेवर को गिरवी रखकर कुछ पैसे ले आया। वह बिना सोचे समझे किसी स्कूल के सामने जूते पालिश करने की दुकान खोल दी। लेकिन उस दिन उसके पास कोई भी जूते पालिश कराने के लिए नहीं आया।

अगले दिन फिर से वह जूते की दुकान खोलकर बैठ गया। लेकिन उसके पास कोई जूते ठीक कराने नहीं आया। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसके पास लोग क्यों नहीं आ रहे हैं। ग्राहक न आने का प्रमुख कारण उसके दुकान का सही स्थान पर न होना। जोकि बिना जाने समझे जल्दी में फैसला लिया गया था।

नैतिक सीख:

किसी भी निर्णय को सोच समझकर ही लेना चाहिए। गुस्से में आकर लिया गया फैसला नुकसान पहुँचाता हैं।

और अधिक देखें: गरीब किसान की कहानियाँ : मेहनत से सफलता तक

6. नकली सोने की पहचान:

रामनगर में शंकर नाम का एक सुनार अपनी पत्नी और एक बच्चे के साथ रहता था। सुनार बहुत कंजूस था, वह पैसे बचाने के लिए हर तरह के प्रयास करता था। एक समय ऐसा आया कि उसके ऊपर कर्ज हो गया। जिसे चुकाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। एक दिन वह अपनी दुकान पर बैठे-बैठे कर्ज चुकाने के बारे में सोच रहा था। उसने सोचा क्यों न पत्नी के गहने बेच कर कर्ज को चुका दिया जाए।

लेकिन, उसके लिए अपनी पत्नी के गहने बेचना आसान नहीं था। अगले दिन उसने चतुराई दिखाई और अपनी पत्नी से कहा- “जो तुम गहने अपने मायके से लेकर आई थी, वे पुराने हो गए है। अगर तुम कहो तो उसको बदल कर नए गहने बनवा दूँ।” उसकी पत्नी ऐसा करने के लिए तैयार हो गई। सुनार उसके गहनों को बेचकर और पैसे एकट्ठा कर लिया।

जबकि, अपनी पत्नी के लिए नकली गहने बाजार से खरीद कर दे दिया। कुछ दिन बाद उस सुनार की मृत्यु हो गई। अब सुनार के घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। उसके छिपाए पैसों की जानकारी उसके पत्नी को भी नहीं थी। उसकी पत्नी के पास जो भी पैसे थे उससे कुछ ही दिन घर का खर्च चला। लेकिन, अब उसकी स्थिति और अधिक खराब हो गई।

एक दिन सुनार की पत्नी अपने गहने अपने बच्चे को देते हुई बोली- “बेटा तुम इन गहनो को लेकर अपने पापा के सबसे करीबी दोस्त ‘पारस चाचा’ के पास जाओ और गहने गिरवी रखकर पैसे लेकर आओ। सुनार का लड़का पारस चाचा के पास पहुँचकर उसे गहने दिखाते हुए गिरवी रखने की बात कही। पारस उसके पिता का बहुत करीबी दोस्त था। वे उसके घर के हालात के बारें में अच्छे से जानते थे।

उसने उस लड़के से यह कहते हुए मना कर दिया कि इतने सारे गहने गिरवी रखने के लिए उसके पास ज्यादा पैसे नहीं हैं” और हाँ, इस गहने को तुम अपनी माँ को दे देना और ये कुछ पैसे ले जाओ जिससे तुम्हारे घर का खर्च कुछ दिन चल जाएगा। जब हमारे पास अधिक पैसे हो जाएंगे तो यह गहने तुमसे गिरवी रख लूँगा।

इसके अलावा उसने उस लड़के को कहा- “तुम हमारे यहाँ पर काम कर लो, जिसमें तुम्हारा उधार का पैसा थोड़ा-थोड़ा करके कट जाएगा। और तुम जौहरी का काम भी सीख जाओगे। इस तरह लड़का उसके पास जौहरी का काम सीखने लगा। धीरे-धीरे वह असली और नकली जेवरातों में फर्क करना भी सीख लिया।

इस तरह से कुछ साल बीते, अब लड़का बड़ा हो चुका था। एक दिन पारस चाचा ने उसे उसकी माँ के गहनो को मांगते हुए कहा कि- “कल तुम अपनी माँ के गहने को लेकर आना, हमारे पास अब उसे गिरवी रखने के पैसे हो गए हैं। अगले दिन वह लड़का अपनी माँ से गहने मांगकर गिरवी रखने के लिए लाता हैं। पारस चाचा के पास पहुंचकर वह गहने की पोटली को खोलता हैं।

वह उस लड़के से गहने की पहचान करने के लिए कहा। लड़का गहना देखकर सुन्न पड़ गया। मानो उसके हाथ पैर ठंडे हो गये हो। कुछ समय के लिए उसके मुँह से कुछ शब्द ही नहीं निकला। उसके चाचा उससे पूछते हैं- “क्या हुआ बेटा? तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे हो” वह सिर्फ एक सवाल अपने चाचा से पूछता हैं कि “जब मैं कुछ साल पहले इन गहनों को लेकर आपके पास आया था तो आपने मुझे क्यों नहीं बताया था कि यह गहने नकली हैं।

पारस चाचा कहते हैं- “बेटा मैं तुम्हारी स्थिति को अच्छी तरह से समझता हूँ” अगर उस दिन मैं यह कहता कि ये गहने नकली हैं, तो तुम्हारी माँ को बहुत गहरा सदमा पहुँच सकता था। क्योंकि, उसके पास अब और कोई रास्ता नहीं बचा था। इसके अलावा क्या पता लोग ये भी कहते कि मैं तुम्हारी मजबूरी का फायदा उठा रहा हूँ। आज जब तुम समझदार हो गए तो इस राज को बताना उचित समझा।

शाम को वह लड़का अपनी माँ को गहने के बारे में पूरी बात बताता हैं। उसकी माँ अपने पति की चापलूसी समझ गई। अगले दिन लड़का और उसकी माँ पारस चाचा के पास जाकर उनका बहुत ऐहसान जताते हैं।

नैतिक सीख:

हमें कभी किसी को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे बल देना चाहिए।

7. यमदूत और मूर्तिकार:

बात बहुत पुरानी हैं, किसी गाँव में एक मूर्तिकार रहता था। जोकि, अपने पिता और दादा से मूर्तिकारी करना सीखा था। धीरे-धीरे जब वह बड़ा हो गया तो उसके हाथों में ऐसी कला आ गई कि वह मूर्ति को किसी भी व्यक्ति के समान हू-बहू तराश सकता था। वह सुबह से शाम तक मूर्तियों को तराशता रहता था। धीरे-धीरे अब वह बुढ़ा हो चुका था। वह अपने आप से बहुत प्यार करता था।

लेकिन, उसे लगने लगा था कि उसका अब अंतिम समय आने वाला हैं। इसलिए, उसने अपने ही रूप की तरह कई मूर्तियाँ तैयार कर ली। उसने मूर्तियों को इस तरह से तैयार किया कि लोग मूर्ति और मूर्तिकार के बीच कोई अंतर नहीं कर पा रहे थे। मूर्तिकार ने सोचा कि इस तरह से वह यमदूत को भी असमंजस में डाल देगा। जिससे वह मुझे स्वर्ग नहीं ले जा सकता।

एक दिन यमदूत उसके घर पर आया। मूर्तिकार ने अपने आपको मूर्तियों के बीच खड़ा किया था। कई सारी मूर्तियों को देखकर यमदूत भी घबरा गया। उसने सोचा कि अगर हम बिना मूर्तिकार को लिए वापस स्वर्गलोक में जाएंगे तो यमराज हमें माँफ नहीं करेंगे। जबकि, यमदूत उन मूर्तियों को तोड़कर कला को क्षति भी नहीं पहुंचाना चाहता था। यमदूत मूर्तियों के सामने आकर कहता हैं।

बनाने वाले ने मूर्तियाँ कितनी खूबसूरत बनाई हैं। लेकिन, एक गलती कर दी हैं। जिससे असली और नकली में पहचान हो सके। काश! मूर्ति बनाने वाला इंसान मेरे सामने होता तो मैं उसके द्वारा की गई कमियों के बारे में बात सकता था। यमदूत की बातों को सुनकर मूर्तिकार अभिमान से भर गया। वह सोचता हैं कि मैंने इतनी मेहनत करके इन मूर्तियों को तराशा हैं। इन सभी मूर्तियों में किसी भी प्रकार की कमी नहीं हो सकती।

वह तुरंत मूर्तियों के बीच से बाहर आकर कहा- “इन मूर्तियों में कोई कमी हो ही नहीं सकती” क्योंकि मेरे जैसा मूर्तिकार इस दुनिया में कोई नहीं हैं। यमराज तुरंत मूर्तिकार को पकड़ लिया। और उससे कहता हैं- “यही कमी हैं! इन मूर्तियों के अंदर अभिमान नहीं हैं। जबकि, तुम अभिमान से भरे हो जिसके कारण तुम पकड़े गए। यमराज तुरंत मूर्तिकार की आत्मा को लेकर यमलोक के लिए चले गए।

नैतिक सीख:

अभिमान हमेशा बने हुए कार्य को खराब कर देता हैं।

इन्हें भी देखें: Success Story in Hindi | सपनों से हकीकत तक

8. आलसी व्यक्ति:

एक दिन डाकुओं ने एक आलसी व्यक्ति को पकड़ लिया। जब वे लोग उसे अपने गिरोह में ले गए तो सघन तालाशी के बाद उसके पास कुछ भी नहीं मिला। डाकुओं को अब बहुत पछतावा होने लगा। उन लोगों ने सोचा चलो अब इस व्यक्ति से कुछ काम ही करवा लिया जाए। आलसी व्यक्ति को लूटे हुए पैसों को गिनने का काम दिया गया। लेकिन, वह उस काम को भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा था।

डाकुओं के सरदार ने उसे एक रेगिस्तान में छुड़वा दिया। आलसी व्यक्ति ने वहाँ पहुंचकर देखा तो उसे दूर-दूर तक कुछ नजर नहीं आ रहा था। उसने आसमान की तरफ देखा और भगवान को कोसते हुए कहा- “हे भगवान! इतनी खाली बंजर जमीन पड़ी हैं, यदि यहाँ पर कुछ पानी की व्यवस्था होती तो यह जमीन हरी-भरी हो जाती। इतना कहकर वह कुछ दूर और आगे बढा ही था कि।

अचानक उसे एक कुआँ दिखाई दिया। जोकि पानी से लबालब भरा हुआ था। उसे विश्वास नहीं हुआ कि इस रेगिस्तान में कुआँ भी हो सकता हैं। उसने भगवान का धन्यवाद किए बिना कहने लगा कि कुआँ तो ठीक हैं लेकिन उससे पानी निकालने और इन जमीनो की जुताई के लिए भी कुछ जतन होना चाहिए था।

तभी वह पीछे मुड़कर देखा तो ऊँट खड़ा हुआ था। जिसके साथ खेत जोतने के लिए हल लगे होते हैं। इसके अलावा वही एक पाइप भी रखी थी। यह सब देख वह घबरा गया। वह आलसी व्यक्ति सोचने लगा कि कही हमें यहाँ पर खेती करनी न पड़ जाएं। अब वह बिना कुछ बोले चुप-चाप अपने घर का रास्ता खोजने के लिए निकल गया।

इतने में ऊपर से उसे आवाज आई, ठहरो! तुमने जो कामना की वह तुम्हें मिल गया। अब इस जमीन को हर-भरा बनाना तुम्हारे हाथ में हैं या फिर इसे बंजर रहने दो। इस तरह से वह अपने आलस को त्याग कर उसी जमीन पर खेती करने लगा हैं। धीरे-धीरे वह उस बंजर जमीन को हरा-भरा बना दिया।

नैतिक सीख:

आलस के कारण हम अपने अंदर छिपे गुणों को नहीं पहचान पाते हैं। हमें अपने आलस का त्याग करना चाहिए।

9. सच्चा दोस्त कौन:

किसी गाँव में सुंदर लाल नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसके घर के साथ में तीन और परिवार रहते थे। सुंदर लाल का तीनों परिवारों से बहुत अच्छा तालमेल था। सभी चारों परिवार के लोग दोस्त की तरह रहते थे। धीरे-धीरे समय बीता सुंदर लाल का एक दोस्त महेश अपना घर वहाँ से बेचकर किसी और शहर में बस गया। अब उसका उस गाँव में आना-जाना नहीं होता था।

लेकिन, सुंदर लाल बहुत ही अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे। वें महेश को महीने में एक बार पत्र लिखकर हालचाल जरूर लेते थे। कुछ समय बाद दूसरे घर में रहने वाले व्यक्ति मुन्ना की नौकरी शहर में लगने के कारण, वह सप्ताह में एक बार रविवार के दिन घर आना होता था। लेकिन, सुंदर लाल हर रविवार को मुन्ना से मिलकर उसका हालचाल जरूर लेता था।

जबकि, सुंदर लाल के बगल में रह रहे मोहन से प्रतिदिन मुलाकात हो ही जाती थी। इस तरह से चारों परिवार अलग-थलग जरूर हो गए थे। लेकिन, वही मिठास अभी चारों के अंदर देखने को मिलती थी। एक साल में चारों एक बार जरूर मिलते थे। जिनको मिलाने में सबसे अहम भूमिका सुंदर लाल की होती थी।

एक बार सुंदर लाल किसी की पंचायत में गए हुए थे। वहाँ बात कुछ ज्यादा बिगड़ गई, जिससे सुंदर लाल के ऊपर केस हो गया। सुंदर लाल के वकील ने एक गवाह बुलाने के लिए कहा जो तुम्हें जानता हो। उसने सबसे पहले अपने पड़ोसी दोस्त मोहन से गवाही देने के बारे में कहा- “मोहन ने यह कहते हुए सुंदर लाल को मना कर दिया कि यारी-दोस्ती अपनी जगह हैं, पर मैं किसी भी तरह के विवाद में नहीं पड़ना चाहता।

आप किसी और से गवाही देने के बारे में बात कर लो। मोहन की बात सुनकर सुंदर लाल को अच्छा नहीं लगा। सुंदर लाल ने अब मुन्ना से बात की, जोकि सप्ताह में एक दिन घर आते थे। मुन्ना ने भी यह कहते हुए मना कर दिया कि “मेरी सरकारी नौकरी हैं, कल को कुछ हो जाए तो मुझे दिक्कत हो जाएगी।” अब सुंदर लाल को और अधिक निराशा हाथ लगी।

उसने सोचा जब मुझे अपने इतने करीबी दोस्त साथ देने से मना कर रहे हैं तो दूर के लोग तो तुरंत मना कर देंगे। अगले दिन उसके दिमाग में आया कि उसके घर के पास पहले महेश रहता था। जोकि, अब वहाँ से जा चुका हैं। उससे उसने आधे-अधूरे मन से गवाही देने के लिए कहा तो- “वह आगे से कहता हैं- कब, कहाँ और किसके सामने गवाही देना हैं। मैं तैयार हूँ बताओ कब आना हैं।”

नैतिक शिक्षा:

मुसीबत में जो काम आए वही सच्चा मित्र कहलाता है।

इसे भी देखें: परिश्रम का महत्व: कैसे मेहनत ने बदली एक गरीब धोबी की किस्मत

10. चतुराई का फल:

एक राजा था। वह अपने राज्य की प्रजा को खुशहाल रखने का प्रयास करता था। वह योग्य और नीतिवान मंत्रियों को ही राज्य की सेवा में रखना चाहता था। एक दिन राजा ने अपने तीन मंत्रियों को राजदरबार में बुलाया। राजा ने तीनों मंत्रियों को आदेश दिया कि वें एक-एक थैला लेकर बगीचे में जाए और वहाँ से अच्छे-अच्छे फल तोड़कर वापस आए।

मंत्रियों को राजा का यह आदेश अच्छा न लगा। उनके अहंकार को ठेस पहुँचा, वे सोचने लगे कि हम मंत्री हैं, कोई मजदूर नहीं। राजा का आदेश था। इसलिए मंत्रियों को राजा की बात माननी पड़ी। पहले मंत्री ने सोचा कि- “चलो अब फल तोड़ना ही हैं तो अच्छे और स्वादिष्ट फल तोड़ कर थैला भर लिया जाए।”

दूसरे मंत्री ने सोचा कि- “थैला भरकर फल ले जाना ही हैं, तो जो भी कच्चे-पक्के फल मिलते हैं। उनको भर लेता हूँ। राजा पूछेगा तो कह दूंगा कि बगीचे में फल ऐसे ही थे।” तीसरे मंत्री ने सोचा- “कौन इतनी सिरदर्दी ले और उसने थैले को घास-फूस से भर कर उसके ऊपर थोड़े से फल रख लिए और थैला भरकर वापस आ गए।”

राजा ने तीनों मंत्रियों को बुलाया और कहा कि तुम तीनों कल सुबह अपने-अपने फल वाले थैलों के साथ राजदरबार में उपस्थति हों। अगली सुबह तीनों मंत्री राजा के दरबार में उपस्थित हुए। राजा ने उनके द्वारा राजकार्य में की जाने वाली लापरवाही और गलतियों की सजा सुनाते हुए उन तीनों को एक महीने के लिए शहर से दूर जंगल में बनी जेल में बंद करवा दिया।

साथ ही राजा ने कहा कि जो तुम फलों का थैला भरकर लाए हो, तुम्हें उससे ही एक महीने अपना जीवन निर्वाह करना है। अब जिस मंत्री ने राजा की बात मानकर अपने थैले में अच्छे और मीठे फल ईमानदारी के साथ भरे थे वह पूरे महीने आराम से अपना जीवन निर्वाह करता रहा।

दूसरा मंत्री जिसने कच्चे-पक्के और सड़े हुए फलों से थैला भरा था। वह कुछ दिनों बाद बीमार पड़ गया। एक महीने बाद जब वह बाहर आया तब वह काफी बीमार पड़ गया था। जिससे पता चला रहा था कि उसका एक महीने का जीवन कष्टदायक रहा।  

तीसरा मंत्री जिसने बगीचे में केवल घास-फूस और कुछ फलों से ही थैला भर लिया था, वह सजा सुनने के बाद दंग रह गया। वह जेल में कुछ दिनों तक ही जीवित रह पाया। जब एक महीने बाद उसके जेल का दरवाजा खोला गया तो वह मंत्री मृत पाया गया। 

नैतिक सीख:

जिस भी काम को हम कर रहे हैं उसे पूरी ईमानदारी के साथ करना चाहिए।

🙋‍♂️ FAQs – सीख देने वाली हिंदी कहानी

kahanizone-site-icon

Get Beautiful Moral Stories Every Week

Moral stories for kids & adults
Short • Inspiring Easy to Read

📖 Free Story PDF on signup

No spam. Only stories. Unsubscribe anytime.

Leave a Reply