नैतिक कहानियां बच्चों को एक लाइन में पूरी कहानी का उद्देश बता देती हैं। कहानियों से मिलने वाली सीख के आधार पर बच्चों का चहुंमुखी विकास होता हैं। इसलिए, आमतौर पर माता-पिता अपने बच्चे के लिए कहानियां हिन्दी भाषा के माध्यम से moral stories in hindi पिक्चर के साथ खोजते हैं। जबकि, आज हम आपको कहानीज़ोन के इस लेख में शिक्षाप्रद कहानियां नैतिक शिक्षा के साथ बता रहे हैं, जोकि इस प्रकार से हैं:
1. तोता और चने की दाल:

एक बार एक तोता शहर घूमने जा रहा था। उसे एक जगह खूँटे पर चने की दाल मिली। उसे देखकर तोता तुरंत चना फोड़ने लगा। चने की एक दाल खूँटे में घुस गई। दूसरी को तोता खा गया। फाँसी हुई दाल को निकलवाने के लिए तोता बढ़ई के पास जा पहुँचा और बोला, “आप खूँटा चीरकर दाल निकल दीजिए।”
बढ़ई बोल, “क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ, जो दाल निकालूँ।” तोता राजा के पास गया और राजा से बोला, “आप बढ़ई को सजा दो।” राजा बोला, “मैं कोई तुम्हारा नौकर हूँ कि बढ़ई को मारूँ।” तोता रानी के पास गया और बोला, महारानी! “तुम राजा को तलाक दो दो” तभी राजा बढ़ई से दाल निकालने के लिए कहेंगे। रानी बोली, “तू भाग यहाँ से।”
तोता साँप के पास गया और बोला, “तुम रानी को डसो।” साँप ने कहा, “तुम्हारा हुक्म क्यों बजाऊँ, तुम कोई राजा हो क्या? भाग यहाँ से।” तोता वहाँ से उड़कर लाठी के पास पहुँच कर बोला, “तुम साँप को मारो तो वह रानी को डसे, रानी राजा को छोड़ दे तो राजा बढ़ई को खूँटा चीर कर दाल निकालने के लिए बोलेंगे। लाठी ने तोते से कहा, “दफा हो जा यहाँ से, दुबारा दिखना मत।”
अब तोता आग के पास आ पहुँचा, उसने आग से बोल, तुम लाठी को जला दो। आग ने कहा, “मैं तुम्हारा नौकर हूँ क्या? जो तुम्हारे कहने पर करूँगा” यह कहकर आग ने उसे भगा दिया। तोता उड़ते हुए भरी हुई बाल्टी के पानी के पास पहुँचा तोते ने कहा, “तुम आग को बुझा दो” पानी ने तोते से कहा, ‘निकल यहाँ से।’
तोता उड़कर हाथी के पास जा पहुँचा उसने हाथी से कहा, “तुम पानी को पी जाओ। हाथी ने कहा, “नहीं! मैं ऐसा नहीं कर सकता” चल निकल यहाँ से। तोता उड़ते हुए चींटी के पास जा पहुँचा। उसने बहुत ही नम्र स्वभाव में कहा, “चींटी बहन तुम ही मेरी मदद कर सकती हो।” एक खूँटे में दाल फँस गई हैं जिसे बढ़ई निकाल नहीं रहा हैं। उसने चींटी से सारी बात बता दी।
चींटी तोते के साथ हाथी के पास जा पहुंची। चींटी जैसे ही हाथी को काटने चली हाथी ने कहा, “मुझे मत काटो मै पानी को सुखा देता हूँ।” हाथी पानी को सुखाने के लिए अपने सूंड को बाल्टी की तरफ बढ़ाया पानी बोल पडी, ‘मुझे मत सुखाओ, मैं आग को बुझा देती हूँ। पानी आग को बुझाने जा ही रही थी कि आग बोल उठा, ‘मुझे मत बुझाओ, मैं डंडे को जलाने जाता हूँ।’
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डंडा बोला मुझे मत जलाओ मैं साँप को मारने जाता हूँ। साँप ने डंडे से कहा, “मुझे मत मारो, मैं रानी को डसने जाता हूँ।” रानी बोली, मुझे मत डसो, मैं राजा को छोड़ देती हूँ। राजा बोल मुझे मत छोड़ो, मैं बढ़ई को खूँटा चीरने के लिए कहता हूँ। राजा की डांट सुनकर बढ़ई खूँटा चीरकर दाल निकल दिया।
नैतिक सीख:
अंत तक हार न मानने वाला ही लक्ष्य प्राप्त करता हैं।
2. सेब का पेड़:

कश्मीर की घाटी में एक गाँव था। उस गाँव के आसपास बहुत सारे सेब के पेड़ लगे हुए थे। पेड़ हमेशा लाल-लाल सेबों से लदा रहता था। लोग उस फल से तरह-तरह के पकवान बनाते थे; जैसे- सेब का जैम, आचार, जूस आदि। उस गाँव में हर रविवार को एक सभा लगती थी। उस सभा में सभी अपनी-अपनी समस्या गाँव के मुखिया के समक्ष रखते थे। मुखिया जी लोगों की परेशानी दूर करने का भरसक प्रयास भी करते थे।
एक दिन सभा में गाँव के कुछ लोग अपनी परेशानी बताते हुए कहा, “मुखिया जी! हम लोग अपनी आमदनी कैसे बढ़ाएं? हमारे गाँव में ऐसा कुछ है ही नहीं जिससे हम अपनी आमदनी बढ़ा सके। गाँव के लोगों की बात सुनकर मुखिया जी गहन विचार में डूब गए। कुछ देर सोचने के बाद कहा, “इस पंचायत में सभी लोग अपनी-अपनी राय प्रकट करे।”
सभा में किसी ने कहा, “हम सभी लोग को इस खाली पड़ें जमीन पर खेती करना चाहिए तो किसी ने कहा, यहाँ के सभी सेब के पेड़ को काट कर इस जगह पर हमें एक फैक्ट्री लगवाना चाहिए। जिससे गाँव वालों को रोजगार मिल सके। उस व्यक्ति की बातों को सुनकर वहाँ बैठे लोग निराश हो गए और वे सभी पेड़ की तरफ देखने लगे।
तभी अचानक पीछे बैठे एक व्यक्ति ने कहा हमें यहाँ लगे पेड़ों को नहीं काटना चाहिए। बल्कि सेब की खेती करना चाहिए। उस व्यक्ति की सलाह सुनकर मुखिया जी खुशी से बोले, “हाँ! इस घाटी में लगे सेब के पेड़ हमारे लिए वरदान हैं। इसलिए हम सभी मिलकर खाली पड़े जगह पर और अधिक पेड़ लगाकर कश्मीर के सेब को बेचेंगे जिससे हमारी आय बढ़ेगी।
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उस गाँव के लोग ने मुखिया के बताये अनुसार सेब की बगानी करना शुरू कर दिया। देखते-देखते उस गाँव के सभी पेड़ लाल-लाल सेब से लद गया। इस तरह से अब गाँव वाले सेब को बडे बाजार में जाकर बेचना शुरू कर दिया जिसके लिए उन्हे अच्छे पैसे भी मिलने लगे। इससे उस गाँव में स्वरोजगार पैदा हुआ तथा गाँव वालों की आय भी अधिक होने लगी।
नैतिक शिक्षा:
आय को बढ़ाने के लिए हमें दूसरे शहर का पलायन करने से अच्छा हैं। हमे अपने आसपास स्वरोजगार पैदा करना चाहिए।
3. किसान और अंगूर:

रामकुमार नाम का एक मेहनती किसान था। गाँव के बाहर उसका एक बड़ा-सा फार्म हाउस था। उसी जगह वह अंगूर की खेती करता था। एक बार उसके खेत में मीठे-मीठे अंगूर से लदे बेल चारों तरफ फैला हुआ था। अभी अंगूर को पकने में कुछ समय बाकी था कि रामकुमार लालच में आकर एक और खेत खरीदना चाहा।
उसके पास पैसे नहीं थे। लेकिन, उसने सोचा कुछ पैसे ब्याज पर उधार ले लेता हूँ। जब अंगूर बेचूँगा तो उन्ही पैसों से उधार चुकता कर दूँगा। रामकुमार अपनी फसल देखकर फुले नहीं समा रहा था। क्योंकि, कई वर्षों बाद उसने ऐसी अंगूर की खेती पहली बार देखी थी। उसने अपने गाँव के कई लोगों से यह कहकर कुछ पैसे ब्याज पर उधार ले लिया कि कुछ दिनों में अंगूर को बेचकर उनके पैसे वापस कर देगा।
इस तरह से रामकुमार ने एक खेत और खरीद लिया। अब रामकुमार उसी खेत को उपजाऊ बनाने में अधिक व्यस्त रहने लगा। उसने अंगूर की खेत की तरफ जाना कम कर दिया। मौका पाकर एक दिन उसके खेत में लोमड़ी का झुंड घुसा गया। खेत के पास कोई नहीं था। लोमड़ी ने खूब मन भरकर अंगूर खाए और उसके फसल को तहस-नहस कर दिया।
अगली सुबह जब रामकुमार अंगूर के खेत को देखने गया तो उसके पैरों तले जमीन खसक गई। अब रामकुमार के खेत में अंगूर बेचने लायक नहीं बचे थे। वह अपने सिर पर हाँथ रखकर बैठ गया। उसे खूब पछताव हुआ कि मेरे ज्यादा लालच के चक्कर के कारण आया हुआ धन भी चला गया।
नैतिक सीख:
ज्यादा लालच इंसान को डुबो देती हैं।
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4. साधु और राजा:

एक समय की बात हैं। किसी वन में एक साधु रहता था। जोकि अपना जीवन यापन गाँव में भिक्षा मांगकर करता था। एक बार साधु भिक्षा माँगने किसी राजा के दरबार में पहुँचा। राजा ने साधु महात्मा का बहुत आदर सत्कार किया और उन्हे भिक्षा भी दी। राजा ने साधु महात्मा से कहा- “महाराज मैं आप से एक प्रश्न पूंछना चाहता हूँ” साधु ने कहा- पूछो।
राजा ने साधु से कहा- “लोग आपस में लड़ाई झगड़ा क्यों करते हैं?” साधु महात्मा राजा के सवाल को सुनकर कुछ देर के लिए शांत हो गए। राजा ने पूछा क्या हुआ महात्मा जी? साधु, राजा से कहता हैं- “मैं भिक्षा माँगने निकला हूँ न की तुम्हारे मूर्खतापूर्ण प्रश्नों के जबाब देने।” महात्मा की बात को सुनकर राजा गुस्सा हो गया।
वह कहता हैं- “आप मेरे दरबार में जब से आए हो, मैं आपकी सेवा सत्कार में ही लगा हूँ। जब मैंने एक प्रश्न पूछा तो आप मुझे मूर्ख बोल रहे हो। निकल जाओ मेरे दरबार से।” साधु राजा की बातों को चुपचाप सुनता रहा। जब राजा थोड़ा शांत हुआ तो साधु ने उसे समझाते हुए कहा – “जब मैंने आपके अनुरूप जबाब नहीं दिया तो आप क्रोधित हो उठे और मेरे ऊपर जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
यदि मैं भी आपकी तरह अपने अंदर क्रोध को आने दिया होता तो दोनों के बीच झगड़ा हो जाता। इसलिए कहा जाता हैं, “क्रोध ही झगड़े का मूल कारण हैं।” अगर आपको अपने जीवन में सुख-शांति चाहिए तो अपने क्रोध पर काबू करना पड़ेगा। जिसके लिए आपको निरंकार प्रभु के साथ नाता जोड़कर हमेशा इसका ऐहसास करना होगा कि हमें ईर्ष्या द्वेष, बुराई, निंदा, नफरत तथा क्रोध को त्यागना पड़ेगा।
नैतिक सीख:
झगड़े-लड़ाई का प्रमुख कारण हमारा क्रोध हैं। हमें अपने क्रोध को नियंत्रित रखना चाहिए।
5. घनश्याम की चाय:

धामपुर गाँव के किनारे घनश्याम की एक चाय की टपरी थी। वह बहुत ही स्वादिष्ट चाय बनाता था। जिसके कारण उसकी चाय को पीने के लिए अधिकतर लोग एकठ्ठा होते थे। एक दिन उसी गाँव के एक व्यक्ति ने उससे पूछ लिया कि “घनश्याम तुम चाय में ऐसा क्या डालते हो जिससे तुम्हारी चाय बहुत ही स्वादिष्ट लगती हैं”।
घनश्याम उस व्यक्ति से कहता हैं- मैं चाय में बिना पानी मिले हुए गाय का ताजा दूध, घर पर बना हुआ चाय-मसाला, लौंग, इलायची और अच्छी किस्म की अदरक डालता हूँ। एक दिन घनश्याम शहर समान लेने गया था। उसे शहर में एक चाय की दुकान दिखी। उसने सोचा चलो इसकी चाय पी कर देखते हैं। वह चाय की दुकान पर गया तो देखता हैं वहाँ पर चाय 20 रुपए की थी। जिसे पीकर घनश्याम को कोई टेस्ट नहीं मिला।
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वह सोचता हैं यही वह कारण हैं कि लोग ऐसे ही अमीर बनते हैं। उसने अपनी दुकान पर भी चाय के दाम बढ़ाकर 10 रुपए से 20 रुपए कर दिया। अगले दिन उसकी दुकान पर ग्राहक उससे पूछते हैं “क्या हुआ घनश्याम भाई तुमने चाय के दाम को दुगुना कर दिए”। वह कहता हैं महंगाई इतनी ज्यादा हैं कि मुझे इस दाम पर कुछ पैसे नहीं बचते थे। फिर भी आप हमारी चाय पी कर देखो कितनी स्वादिष्ट हैं।
इस तरह से उसकी कमाई ठीक-ठाक होने लगी। कुछ दिन बाद वह दूध में पानी मिलाने लगा तथा घर के बने चाय-मसाले की जगह बाजार का मसाला डालने लगा। अब उसकी चाय किसी भी ग्राहक को नहीं पसंद आती थी। जिसके कारण उसकी दुकान पर लोगों का आना-जाना कम होने लगा। एक समय ऐसा आया कि अब उसकी दुकान पर कोई नहीं आता था।
घनश्याम अपनी दुकान पर ग्राहकों की कमी को समझ गया। उसने चाय के दाम तथा उसकी गुणवत्ता पहले जैसा कर दिया। इस तरह से फिर से लोग उसकी दुकान पर आना शुरू कर दिए।
नैतिक सीख:
लोभ, लालच के चक्कर में हम अपना बड़ा नुकसान कर लेते हैं।
Hello, I’m Reeta, a passionate storyteller and a proud mom of two. For the past 8+ years. I have been writing Hindi stories that teach moral values and bring happiness to children. On Kahanizone, I share Hindi kahaniyan, Panchatantra stories, bedtime tales and motivational kahaniyan that parents trust and kids enjoy. As a mother, I know what children love to hear, and through my stories I try to give them imagination, values, and joy. My aim is to entertain, inspire, and connect with readers of all ages.
