Hindi Story with Moral – टूटे सिक्कों का रहस्य

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राजा कमलसिंह अपने सिंहासन पर विराजमान थे। मंत्री तथा अधिकारीगण उनके इर्द-गिर्द अपने-अपने आसनों पर बैठे हुए थे। रियासत देवगढ़ के बारे में चर्चा हो रही थी। देवगढ़ का सूबेदार नटवरसिंह बुद्धिमान तथा प्रजा की भलाई चाहने वाला आदमी था। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से उसने राजा कमल सिंह को कर देना बंद कर दिया था।

इसी के बारें में दरबार में विचार-विमर्श हो रहा था। राजा कमलसिंह ने नटवरसिंह के पास कई बार सूचना भिजवाई। लेकिन, नटवरसिंह की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। नटवरसिंह के इस व्यवहार से राजा बहुत क्रोधित थे। वह नटवरसिंह के इस व्यवहार के लिए मजा चखना चाहते थे।

आखिर काफी देर तक विचार-विमर्श करने के बाद यह निश्चय किया गया कि पंद्रह दिन तक और इंतजार किया जाए। इस बीच अगर नटवरसिंह ने कर जमा कर दिया तो ठीक, वरना उसके ऊपर आक्रमण करके उसे बंदी बना लिया जाएगा। उसके स्थान पर किसी और को वहाँ का कार्यभाल संभालने के लिए कहा जाएगा।

इस घटना के कई दिनों बाद की बात हैं। दरबार लगा हुआ था। तभी गेट पर नटवरसिंह का दूत आया। चौकीदार ने कहा, “महाराज! देवगढ़ से दूत आया हैं।“ राजा ने उसे फौरन दरबार में लाने का आदेश दिया। दूत ने राजा को सिर झुकाकर प्रणाम किया फिर उसने अपने साथ लाए एक पत्र तथा एक थैली भेंट कर दी।

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थैली देखकर सब लोगों की आँखों में खुशी से चमक उठी। वे मन ही मन कहने लगे, “चलो, अच्छा हुआ नटवरसिंह की अक्ल अपने आप ठीक हो गई। उसने कर भेजकर अपनी मुसीबत बचा ली। सबकी आँखें थैली पर टिकी थी।“

राजा ने पत्र पढ़ना शुरू किया। उसमें लिखा था- “महाराज, गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ। परिस्थिति के अनुसार आपकी सेवा में कुछ भेज रहा हूँ। हालत सुधारते ही आपकी सेवा करूँगा- आपका सेवक नटवरसिंह।“

पत्र पढ़ते ही राजा कमलसिंह की आँखों में खून उतर आया। उसने गुस्से से पत्र को फाड़ डाला। जब थैली खोली तो उसमें टूटे सिक्के भरे पड़े थे। इन सिक्कों को उसने दूत की तरफ फेंक दिया। फिर गरजते हुए बोला- “नटवरसिंह से कह देना मैं इस अपमान का बदला जरूर लेकर रहूँगा।“

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दूत बेचारा क्या कहता? वह चुपचाप वहाँ से चला गया। राजा ने सेनापति को बुलाकर देवगढ़ पर चढ़ाई करने का आदेश सुनाया। वह किसी भी हाल में नटवरसिंह को कुचल देना चाहता था। राजा कमलसिंह को अपने अपमान का बदला लेना था।

राज्य का बूढ़ा मंत्री बीमार था। जब उसने देवगढ़ पर चढ़ाई की बात सुनी तो उसे अचरज हुआ। उसने सोचा क्या बात हो गई, राजा को आज तक इतने आवेश में कभी नहीं देखा। राजा किससे युद्ध करने जा रहे हैं। कमलसिंह बहुत नेक इंसान था। इसलिए, उसके राज्य के लोग तथा आस-पास के राजा उसका सम्मान करते थे।

बूढ़ा मंत्री राजा के पास गया। उसने आश्चर्य से पूछा- “महाराज! मैं यह सब क्या सुन रहा हूँ? किसने आपकी शक्ति को चुनौती दी हैं?” राजा ने रोष भरे शब्दों में कहा- “मंत्रिवर! यह लड़ाई नटवरसिंह के खिलाफ हैं। “उसने कर भेजने के स्थान पर टूटे सिक्के भेजकर हमारा अपमान किया हैं। मैं उसे मिट्टी में मिलाकर ही दम लूँगा।“

बूढ़ा मंत्री बुद्धिमान था। उसे समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या हैं? नटवरसिंह द्वारा भेजे गए टूटे सिक्कों का रहस्य वह समझ गया था। उसने कहा, “महाराज! बिना सोचे समझे कोई कदम उठाना ठीक नहीं हैं। इससे व्यर्थ का खून-खराबा होगा।” नटवरसिंह बहुत अच्छा आदमी हैं। उसने टूटे सिक्के भेजकर अपनी रियासत की डगमगाते हुए आर्थिक स्थिति की ओर इशारा किया हैं।

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“इस समय वह इस हालत में नहीं हैं कि आपको कर दे सके। इसलिए, उसने टूटे सिक्के भेजे हैं। सिक्कों से ही कोष की वास्तविकता का पता लगता हैं।“ राजा को अभी भी मंत्री की बातों का विश्वाश नहीं हो रहा था।

उसने अपनी शंका प्रकट करते हुए कहा- “मंत्रिवर! मैं इसकी जाँच करूँगा तब विश्वास होगा।“ राजा ने देवगढ़ का पता लगाने के लिए विशेष जासूस भेज दिए। कुछ ही दिन बाद जासूसों ने लौटकर खबर दी- “महाराज! देवगढ़ की प्रजा बड़े संकट में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

चारों तरफ बाढ़ से लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। “नटवरसिंह को अपना होश नहीं हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह प्रजा की सहायता करने में जुटा हुआ हैं।“ राजा कमलसिंह की सारी गलतफहमी दूर हो गई। इसका सारा श्रेय बूढ़े मंत्री को जाता था। वह मंत्री की सूझ-बुझ की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका। राजा ने देवगढ़ की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसने खाद्य सामग्री और बहुत-सा रुपया सहायता के रूप में भिजवा दिया।

नैतिक सीख:

बिना सोचे समझे गुस्से में आकर लिया गया फैसला खुद को और दूसरों को भी नुकसान पहुँचता हैं।

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