Emotional Story in Hindi – हम और हमारे माता-पिता

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शिक्षाप्रद कहानी – रोहित और उसका परिवार:

गोपाल अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। उसके माता-पिता ने गोपाल को पढ़ा-लिखाकर एक नेक इंसान बना दिया। गोपाल भी अपने माता-पिता की खूब सेवा करता था। गोपाल की उम्र लगभग पच्चीस साल हो चुकी थी। गोपाल नौकरी भी करने लगा था। उसके माता-पिता चाहते थे कि गोपाल अब एक अच्छी लड़की से शादी कर ले। गोपाल के पिता अपने रिश्तेदारों से कह चुके थे कि वे अपने बेटे की शादी करना चाहते हैं।

गोपाल पढा-लिखा और बुद्धिमान तो था ही। इसलिए उसके घर पर आए दिन रिश्ते आने लगे। लेकिन, गोपाल को कोई लड़की पसंद नहीं आ रही थी। जबकि, गोपाल की माँ को सारी लड़कियां पसंद थी। एक दिन गोपाल के ऑफिस में रीना नाम की लड़की ने जॉब जॉइन किया। रीना गोपाल के साथ काम करने लगी। गोपाल को रीना का व्यवहार खूब पसंद आया। रीना की उम्र लगभग तेईस साल रही होगी।

रीना के पिता का कोयले का बहुत बड़ा बिजनेस था। उन्हें पैसों की कोई कमी नहीं थी। धीरे-धीरे रीना और गोपाल में प्यार बढ़ता गया। दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। कुछ समय बाद रीना और गोपाल ने शादी करने का फैसला कर लिया। लेकिन, गोपाल की माँ को रीना का व्यवहार पसंद नहीं था। जिसके कारण वह गोपाल की शादी रीना के साथ नहीं करना चाहती थी।

लेकिन गोपाल ने अपने माता-पिता को समझा-बुझा कर इस शादी के लिए राजी कर लिया। शादी के कुछ महीनों बाद गोपाल को एक लड़का पैदा हुआ। गोपाल के पिता ने अपने पोते का नाम रोहित रखा। धीरे-धीरे परिवार में सब कुछ अच्छे से चल रहा था। लेकिन कुछ समय बाद गोपाल ऑफिस के काम से कुछ महीनों के लिए किसी दूसरे देश चला गया। उसके माता-पिता काफी बुजुर्ग हो चुके थे। जिसके कारण उन्हें खुद की साफ सफाई करने में दिक्कत होती थी।

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रीना कुछ दिन तो गोपाल के माता-पिता की साफ-सफाई का ध्यान रखती थी। लेकिन, कुछ दिन बाद अचानक उसका व्यवहार बिल्कुल बदल गया। वह गोपाल के माता-पिता को खाना-पानी यह कहते हुए मिट्टी के बर्तन में देने लगी कि दोनों लोग साफ-सफाई नहीं रखते। उनके मुँह से बदबू आती हैं। गोपाल के माता-पिता मिट्टी की थाली और गिलास में खाना खा कर उसे धुलकर रख देते थे।

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अगली बार गोपाल की पत्नी उन्हें फिर उसी मिट्टी के बर्तन में खाना देती थी। इसी तरह कई महीनों तक चलता रहा। गोपाल ऑफिस का काम खत्म करके अपने घर लौट आया। एक दिन गोपाल का बेटा रोहित बॉल खेल रहा था। बॉल उछलकर उस मिट्टी के बर्तन पर जा गिरी। जिससे वह बर्तन नीचे गिरकर टूट गया। उसी मिट्टी के बर्तन में उसके दादा-दादी खाना खाते थे।

रोहित तेज-तेज आवाज में रोने लगा। उसकी आवाज सुनकर गोपाल, रीना और उसके दादा-दादी एकट्ठा हो गए। सभी ने पूछा रोहित क्या हुआ? तुम रो क्यों रहे हो? रोहित कुछ भी नहीं बता रहा था, वह जोर-जोर से चिल्लाए जा रहा था। रोहित की माँ रीना ने कहा,”बेटा रोहित! रोते नहीं, “क्या हुआ तुम्हें! सच सच बताओ?”

गोपाल ने मिट्टी की प्लेट और गिलास दिखाते हुए कहा। यह बर्तन मुझसे टूट गया, अब मैं अपने पापा-मम्मी को किस बर्तन में खाना दूँगा। मुझे मिट्टी की प्लेट और गिलास दो। उसकी बातों को सुनकर सभी के सामने रीना का सिर शर्म से झुक गया। गोपाल को यह बात समझने में देर नहीं लगी कि रीना उसके माता-पिता को मिट्टी के बर्तन में खाना देती थी।

गोपाल ने रीना को फटकार लगाते हुए कहा, “मेरे सामने से हट जाओ, मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना।” वह अपने माता-पिता के सामने गुठनों के बल बैठकर माँफी माँगने लगा। उसके माता-पिता ने कहा, “बेटा हम लोग कैसे भी इस मिट्टी के प्लेट में खाना खा लेते थे। लेकिन, हमें इसी बात की चिंता होती थी। जब आपके बहु बेटे आपको मिट्टी के बर्तन में खाना पानी देंगे तो तुम कैसा महसूस करोगे।

अपने माता-पिता की बातों को सुनकर गोपाल की आँखें छलक आई। उसने कहा, “आज यदि रोहित से बर्तन नहीं टूटता तो सच्चाई मेरे सामने तक नहीं आ पाती।”

नैतिक सीख:

बच्चे अपने माता-पिता और बड़ों को देखकर बहुत जल्दी सीख जाते हैं। हमें अपने बुजुर्गों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए।

Motivational story – माता-पिता की छाया:

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सोमवार की सुबह थी, प्रतिदिन की तरह लंच लेकर मैं ऑफिस के लिए निकल गया। पूरे दिन काम करके शाम को लगभग आठ बजे घर में घुसते ही मेरी नजर सरिता पर पड़ी। उसे देखकर मैं समझ गया, कुछ तो बात हैं जो आज सरिता नाराज लग रही हैं। मैंने अपना बैग टेबल पर रखकर, बाथरूम में हाथ-पैर धुलकर बाहर निकल कर देखा कि सरिता बिना बोले सोफ़े के टेबल पर पीने के लिए पानी रखकर किचन में चली गई।

सामने कमरे में बच्चे खेल रहे थे। मैं बिना पानी पिए किचन में गया, सरिता के कंधे पर हाँथ रखते हुए पूछा, “क्या हुआ, सरिता? ‘आज कुछ उखड़ी-उखड़ी सी लग रही हो।’ वह मुझे घूरते हुए बोली, “रहने दो, अपना प्यार अपने पास रखो।

आपको क्या! सुबह आठ बजे सूट-बूट पहनकर निकल जाना हैं। बच्चे की फीस जमा हो या न हो। घर में राशन हो या न हो। जूते न होने के कारण बच्चे को फुटबाल टीम से निकाल दिया जाए।

मेरे सेहत के बारें में आपको क्या। पिछले महीने डॉक्टर ने कहा था, “एक सप्ताह बाद दुबारा दिखा लेना। लेकिन धीरे-धीरे आज एक महीने होने को आ चुका हैं। आपको शायद इसके बारें में ध्यान तक नहीं होगा।” कोई बात नहीं प्रतिदिन की तरह आज भी आप चद्दर तानकर सो जाओगे। कल सुबह फिर से वही प्रक्रिया।

सरिता की बातों को सुनकर मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था। क्योंकि महंगाई इतनी हैं कि बिजली, पानी, राशन और बच्चों की पढ़ाई के खर्च से कुछ ज्यादा बचत नहीं हो पा रही थी। सैलरी जस की तस ही थी। पैसा बढ़ाने के नाम पर ऑफिस का मैनेजर कहता हैं, “काम नहीं हैं, तुम्हें कहीं और ज्यादा पैसे मिले तो तुम जॉब छोड़ सकते हो।”

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सरिता गुस्सा मत करो कल मैं सब कुछ इंतजाम कर दूँगा, “सरिता ने फिर से कहा, अच्छा! अभी तक तो कुछ इंतजाम नहीं कर पाए। कल कैसे कर दोगे, कहीं चोरी करोगे क्या? नहीं सरिता तुम परेशान मत हो, मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। कल छुट्टी लेकर तुम्हें डॉक्टर के पास भी ले चलूँगा। तभी दरवाजे की घंटी बजी। दोनों ने सोचा इस समय कौन आ सकता हैं।

मैंने दरवाजा खोल कर देखा तो अम्मा और बाबू जी दरवाजे के बाहर खड़े थे। हम दोनों ने उनके चरण स्पर्श किए, सरिता किचन में चली गई। मन ही मन सोचने लगी, हम लोगों के पास खाने के पैसे तक नहीं हैं। किसी तरह से हम अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहे हैं। जरुर बाबू अम्मा खेत की जुताई-बोई के पैसे माँगने आए होंगे।

मैं भी सोच रहा था कि बाबू जी अगर मुझसे पैसे के लिए कहेंगे तो मैं क्या कहूँगा? बाबूजी और अम्मा सोफ़े पर बैठे थे। अम्मा बच्चों के साथ लगी हुई थी। बाबू जी ने पूछा, “क्या बात हैं बेटा! आजकल तुम फोन पर बात भी करना कम कर दिए हो। कुछ परेशानी में हो क्या? ऐसा तुम तभी करते हो जब तुम परेशानी में होते हो। यह तुम्हारी बचपन की आदत हैं। खेती का काम ज्यादा था, नही तो हम लोग और पहले आ जाते। इस बार फसल भी बहुत अच्छी हुई थी।

सरिता ने खाना टेबल पर लगा दिया। बाबू जी खाना खाते समय जब भी कुछ कहते मेरी धड़कन तेज हो जाती। कहीं पैसे के लिए न बोल दे। बाबू जी ने कहा, “बेटा गर्मी की छुट्टी होने वाली हैं। बहु और बच्चों को लेकर गाँव घूम जाना। सभी का मन बहल जाएगा। हाँ! बाबू जी, मैंने कहा। सरिता किचन के दरवाजे से परदे की आड में खड़ी होकर सोचे जा रही थी कि बाबू जी और अम्मा बड़े बेटे और बहु के पास नहीं जाते हैं। न ही उनसे पैसे के लिए कहते हैं।

अगर पैसे के लिए बोलेंगे तो हम लोग कहाँ से पैसे देंगे? अगली सुबह मैंने जरूरी काम बता कर ऑफिस से छुट्टी ले ली थी। बाबू जी और अम्मा सुबह-सुबह गाँव जाने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने कहा, बेटा! तुम्हारे अम्मा को अपने पोते-पोती की बहुत याद आ रही थी। इसलिए हम दोनों देखने चले आए।

अम्मा अपने थैले में से पैसों की एक मोटी गड्डी निकालते हुए मेरे हाथ में रख दी। मैंने कहा- “अम्मा! ये पैसे क्यों? बेटा! मुझे सब समझ आता हैं। तुम लोग अभी थोड़ी दिक्कत में हो। इन पैसों से सारे काम निपटा लो” इस बार तो फसल भी अच्छी हुई थी। जिसे तुम्हारे बाबू जी ने बेच दिया, उसके बदले में हमें अच्छे पैसे मिले हैं।

हम दोनों ने चरण स्पर्स किया। बाबूजी और अम्मा गाँव चले गए। दोनों सोफ़े पर बैठकर सोचने लगे हम लोग न जाने क्या-क्या सोच रहे थे। लेकिन हमारे माता-पिता का दिल हम लोग से बड़ा हैं। जो मुश्किल परिस्थितियों में हमारा साथ देते हैं।

नैतिक सीख:

माता-पिता हमारे लिए कभी बोझ नहीं हो सकते हैं।

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