भगवान बुद्ध की कहानी हिंदी में

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  • Post last modified:January 20, 2026
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शिक्षा प्राप्त करने का मार्ग:

एक समय की बात हैं। महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों को लेकर यात्रा पर निकले हुए थे। चलते-चलते सुबह से शाम होने को आ चुकी थी। बुद्ध को लगने लगा था कि अब हमारे शिष्य अधिक थक चुके हैं। उन्होंने शिष्यों को आदेश दिया कि किसी सुरक्षित स्थान पर रुकने का बंदोबस्त किया जाए। कुछ समय बाद एक शिष्य ने महात्मा बुद्ध के पास आकर पूछा, “गुरुदेव! क्या विद्या किसी से बलपूर्वक प्राप्त की जा सकती हैं?”

बुद्ध ने कहा, कदापि नहीं! “विद्या केवल समर्पण और सेवा भाव के माध्यम से प्राप्त की जा सकती हैं।” और आसानी से समझने के लिए चलो तुम्हें एक बलशाली राजा की कहानी सुनाता हूँ।

किसी राज्य में एक बलशाली राजा रहता था। जोकि, अपनी सेना की शक्ति के बल पर कुछ भी हासिल करना जनता था। उसी राज्य में एक साधु घास-फूस की झोपड़ी बनाकर रहता था। साधु ज्ञानवान था। उसके पास एक ऐसी विद्या थी। जोकि, पीतल को सोना बना देता था। लेकिन, “वह इस विद्या का उपयोग गरीब दीन-दुखियों के भले के लिए करता था।”

दया भावना:

एक बार उसकी झोपड़ी में एक गरीब ब्राम्हण आया। वह साधु से कहने लगा, “महाराज! मुझे अपनी बेटी की शादी करनी हैं। लेकिन, मेरे घर में एक फूटी कौड़ी तक नहीं हैं, कृपया मुझे कोई मार्ग बताए।” साधु ने ब्राम्हण से कुछ सवाल-जवाब करके पता लगा लिया कि ब्राम्हण सच में बहुत गरीब हैं। उसके पास कुछ भी नहीं हैं।

मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित बुक “गोदान” हिन्दी में

मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित यह उपन्यास पाठकों को उन पात्रों के जीवन की भावनात्मक यात्रा पर ले जाता है, जो गरीबी, नैतिकता और बेहतर जीवन की तलाश में निरंतर संघर्ष करते हैं।

साधु ने अपनी विद्या से एक पीतल के बर्तन को सोने का बना दिया और उस बर्तन को ब्राम्हण को देते हुए कहा, “तुम इस बर्तन को बेचकर अपनी बेटी की शादी कर लो।” ब्राम्हण बर्तन को लेकर सुनार की दुकान पर गया। उसने उस बर्तन को दिखाते हुए बेचने की बात कही। सुनार समझ गया कि हो न हो यह बर्तन राजा के घर से चोरी किया हुआ हैं।

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सुनार उस ब्राम्हण को पकड़कर राजा के पास ले गया। राजा ने पूछा क्या बात हैं, “ब्राम्हण ने पूरी घटना को राजा के सामने सच-सच बता दिया।” इस बात की जानकारी होने से राजा के मन में लालच आ गया और उसने सोचा, क्यों न इस विद्या को सीखा जाए। इसलिए, उसने साधु को बुलवाने के लिए सिपाहियों को भेजा।

राजा का लालच:

कुछ समय बाद सिपाही साधु को लेकर राजा के सामने पेश हुए। राजा ने कहा- “तुम्हारे पास एक ऐसी विद्या हैं, जोकि पीतल को सोना बना देती हैं। साधु ने जबाब दिया, “जी हाँ, महाराज!” राजा ने कहा, उस विद्या को मुझे भी सिखा दो। साधु ने कहा असंभव, मैं ऐसा नहीं कर सकता। राजा ने गुस्से से भरे स्वर में कहा, “साधु! तुम मुझे जानते नहीं हो, मैं कौन हूँ?”

साधु ने निर्भीकता के साथ जबाब दिया, “राजन मैं आपको बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ।” राजा और गुस्से से भर गया। उसने कहा, “मैं तुम्हें पंद्रह दिन का समय देता हूँ। अगर तुमने यह विद्या मुझे नहीं सिखाई तो मैं तुम्हें फाँसी पर चढ़वा दूँगा।” साधु अपनी कुटिया को चला गया। प्रतिदिन शाम को राजा का सिपाही साधु से पूछने के लिए आता है कि वह राजा को विद्या सिखाने के लिए तैयार हैं? लेकिन साधु का जबाब सिर्फ ‘न’ ही रहता था।

धीरे-धीरे समय अधिक निकल चुका था। अब सिर्फ एक सप्ताह बचे हुए थे। राजा को लगने लगा कि साधु को डराने-धमकाने से बात नहीं बनेगी। राजा भेष बदलकर साधु की कुटिया में गया और उसने साधु की सेवा करना शुरू कर दिया। साधु राजा की सेवा देख बहुत ज्यादा प्रसन्न हुआ। एक दिन साधु ने कहा, “मैं तुम्हारी सेवा देखकर बहुत प्रसन्न हूँ, मांगों! तुम क्या मांगना चाहते हो?”

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साधु की शिक्षा:

राजा ने कहा, “मुझे आपकी पीतल से सोना बनाने की विद्या सीखनी हैं।” साधु राजा को वह विद्या सिखाते हुए कहता हैं, “इस विद्या का उपयोग गरीब दीन-दुखियों की सहायता के लिए ही करना। राजा अपने महल आ गया। पंद्रह दिन पूरे होने के बाद राजा ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि “वह बल पूर्वक साधु को पकड़कर ले आए।”

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राजा ने साधु से एक बार फिर से वही प्रश्न पूछा, “क्या तुम मुझे पीतल से सोना बनाने की विद्या सीखने के लिए राजी हो?” साधु ने तुरंत “नहीं” कहा। राजा ने फिर से कहा, “तो तुम फाँसी पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाओ।” साधु ने कहा, ‘मैं तैयार हूँ।’ राजा ने हँसते हुए कहा, “मूर्ख साधु! जिस विद्या पर तुम्हें इतना ज्यादा नाज़ हैं, उसे मैं जानता हूँ।”

राजा ने साधु के सामने एक पीतल के बर्तन को सोना बनाकर दिखा दिया। साधु ने राजा से कहा, “तुमने यह विद्या जरूर किसी की शरण में जाकर उसकी सेवा करके सीखी होगी, न की डरा-धमका कर।” क्योंकि, विद्या को सीखने के लिए हमें विनम्र होना पड़ता हैं। अगर कोई चाहे कि विद्या को हम बल पूर्वक सीख ले तो ऐसा संभव नहीं होता हैं।

नैतिक शिक्षा:

शिक्षा हमें विनम्र होने पर ही मिलती हैं। इसे कभी शक्ति और बल के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

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