बच्चों को सोने से पहले कहानियां सुनना बहुत पसंद होता है। ऐसी कहानियां न सिर्फ उनका मनोरंजन करती हैं, बल्कि उन्हें अच्छी सीख भी देती हैं। इस लेख में हम आपके लिए 10 बच्चों की रात की कहानियां लेकर आए हैं, जिन्हें आप अपने बच्चों को सोने से पहले सुना सकते हैं। इन मजेदार Bedtime Stories for Kids में सियार की गुफा, प्यासा कौवा, शेर और चूहा जैसी दिलचस्प कहानियां शामिल हैं जो बच्चों को नैतिक शिक्षा भी देती हैं।
1. सियार की गुफा:

फुलकारी वन में हायना नाम का एक सियार रहता था। जोकि, बहुत चतुर और बुद्धिमान था। वह अपने वन के जानवरों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाता था। जबकि, वह शिकार करने के लिए प्रतिदिन किसी अन्य जंगल में जाता था। एक दिन फुलकारी वन में एक शेर शिकार की तलाश में आ गया। शेर को आते देख किकू बंदर ने पूरे वन के सभी जानवरों को सूचित कर दिया।
सभी जानवर सुरक्षित जगह पर छिप गए। शेर पूरे दिन वन में घूमता रहा। लेकिन, उसे कही चूहा तक दिखाई नहीं दिया। जब शेर वापस अपने जंगल को जा रहा था तो उसे एक गुफा दिखाई दी। जिसमें हायना सियार रहता था। शेर ने सोचा कि रात हो चुकी हैं, चलो इसी गुफा में आज रुक जाता हूँ। क्या पता कोई जानवर इस गुफा में रहने के लिए आए तो मैं उसे अपना शिकार बना लूँगा।
कुछ समय बाद गुफा के पास हायना सियार आ पहुँचा। वह गुफा के बाहर शेर के पैरों के निशान देख समझ गया कि उसकी गुफा में शेर गया हैं। सियार ने आवाज लगाई, कैसे हो गुफा भाई? लेकिन आगे से कोई आवाज नहीं आई। सियार ने कहा- “अरे! गुफा भाई तुम सो गए क्या? तुम्हारी आवाज क्यों नहीं आ रही हैं? प्रतिदिन जब मैं तुम्हारा हालचाल पूछता हूँ, तो तुम कहते हो ‘सब खैरियत हैं!’ आज क्यों नहीं बोल रहे हो?
अगर तुम नहीं बोलोगे तो मैं यहाँ से चला जाऊँगा। गुफा में बैठा शेर सोचने लगा कि यह सियार गुफा में घुसने से पहले प्रतिदिन हालचाल पूछता होगा। इसलिए आज भी पूछ रहा हैं। मेरे गुफा में होने के कारण गुफा डर गया होगा। इसलिए नहीं बोल रहा हैं। चलो मैं ही बोल देता हूँ। मुझे यहीं बैठे बिठाए शिकार भी मिल जाएगा। सुबह से मैं बहुत भूखा हूँ।
सियार ने पूछा- “गुफा भाई आखिरी बार पूछ रहा हूँ, इस बार नहीं बोले तो मैं चला जाऊंगा।” सियार ने जैसे बोला- “कैसे हो गुफा भाई” आगे से शेर की आवाज आई ‘सब खैरियत हैं’। सियार को पता चल गया कि इस गुफा में शेर हैं। वह यह कहते हुए तेजी से भागा कि इस गुफा में रहते हुए मैं बूढ़ा हो गया परंतु आज तक मैंने किसी गुफा को बोलते हुए नहीं सुना।
नैतिक सीख:
चतुराई और दिमाग से काम लेने वाला कभी बड़ी मुश्किल में नहीं पड़ सकता।
2. बूढ़ा गिद्ध और बिल्ली:

किसी नदी के किनारे एक विशाल बरगद का पेड़ था। वह पेड़ पक्षियों से भरा होता था। सारे पक्षी बहुत मिल-जुलकर उस पेड़ पर रहते थे। एक दिन उस पेड़ पर कही से भटकता हुआ एक गिद्ध आ पहुँचा। जिसे देख सारी चिड़िया एक हो गई। उसे उस पेड़ से जाने के लिए कहने लगी।
लेकिन, बूढ़ा गिद्ध अपने दोनों हाथों को जोड़कर सभी चिड़ियोंं से विनती करने लगा। मैं बहुत बूढ़ा हो चुका हूँ, अगर मैं कही दूर किसी जंगल में रहूँगा तो मुझे इस नदी से पानी पीने के लिए आना पड़ेगा। अब मुझसे अधिक दूर तक उड़ा नहीं जाता। आप लोग मेरा विश्वास करो मैं आप लोगों को किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुचाऊँगा। बल्कि मैं आप लोगों के न रहने पर आपके बच्चों का ख्याल भी रखूँगा।
उसकी बातों का सभी चिड़ियोंं ने विश्वास कर लिया और उसे उस पेड़ पर रहने की इजाजत दे दी। धीरे-धीरे उसे वहाँ पर बहुत अच्छा लगने लगा। चिड़ियाँ उसे खाने के लिए भी दे देती थी। इस तरह से कई महीनों तक चलता रहा। एक दिन उस वन में एक बिल्ली आ गई। जिसे देख चिड़िया के बच्चे जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
बच्चों की आवाज को सुनकर बूढ़ा गिद्ध बाहर आया और बिल्ली से कहा, “जितनी जल्दी हो सके यहाँ से निकल जाओ, तुम्हारा इस पेड़ के नीचे कोई काम नहीं हैं। लेकिन, वह बिल्ली बूढ़े गिद्ध से प्रार्थना करने लगी कि मैं किसी प्रकार से पक्षियों को नुकसान नहीं पहुंचाऊँगी। बूढ़ा गिद्ध बोला ठीक हैं, लेकिन तुम्हें सिर्फ मेरे पेड़ के नीचे रहना होगा और किसी जगह पर नहीं जाना हैं।
बिल्ली बूढ़े गिद्ध की बात मान गई उस दिन से बिल्ली गिद्ध के पेड़ के नीचे रहने लगी। देखते ही देखते बिल्ली ने बूढ़े गिद्ध का विश्वास जीत लिया। लेकिन, एक दिन बिल्ली ने किसी चिड़िया के बच्चे को पेड़ के नीचे बैठे देख लपक कर पकड़ लिया तथा उसे मारकर खा गई। अब बिल्ली बिना किसी पक्षी को खाए नहीं रह पाती थी।
इस तरह से वह चिड़ियाँ के बच्चों को प्रतिदिन मार कर खाती थी। जिसकी भनक बूढ़े गिद्ध को नहीं मिली। धीरे-धीरे चिड़ियाँ के बच्चे गायब होते चले गए। बिल्ली को ऐहसास हो गया की अब यहाँ से चले जाने में ही भलाई हैं। वह उस पेड़ को छोड़कर चली गई।
एक दिन सभी चिड़ियाँ मिलकर अपने-अपने बच्चे को पूरे वन में खोजती हैं। लेकिन कहीं भी चिड़ियाँ के बच्चे नहीं मिलते। सभी चिड़ियोंं ने सोचा, चलो बूढ़े गिद्ध से पूंछते हैं। जैसे ही सभी चिड़िया उस बूढ़े गिद्ध के पेड़ के पास गई तो उन्हें पेड़ के नीचे हड्डियों का ढेर लगा हुआ दिखा। सभी चिड़ियोंं ने बूढ़े गिद्ध पर हमला कर दिया और उस गिद्ध को मार डाला।
नैतिक सीख:
किसी अंजान व्यक्ति पर भरोसा करने का नतीजा खुद को भुगतना पड़ता हैं।
3. चतुर लोमड़ी और बकरी:

एक लोमड़ी बहुत उछल-कूद करते हुए जंगल जा रही थी, अचानक वह बीच रास्ते में एक गड्ढे में जा गिरी। गड्ढा ज्यादा गहरा नहीं था। वह बार-बार बाहर निकलने का प्रयास करने लगी लेकिन वह उस गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाई। कुछ समय बाद उसी रास्ते से एक बकरी गुजरी। जिसे देख लोमड़ी ने कहा- बहन कहाँ जा रही हो? बकरी ने कहा – “मैं नदी से पानी पीने जा रही हूँ।”
लोमड़ी को एक तरकीब सूझी। वह जोर-जोर से हँसने लगती हैं। बकरी लोमड़ी से पूछती हैं, “बहन आप इतनी तेज-तेज क्यों हँस रही हो? लोमड़ी बोली- गंगा जैसा निर्मल जल छोड़कर गंदगी वाला पानी पीने जा रही हो।” देखो मैं, यहाँ पर पानी पीने के लिए आई थी। अगर तुम चाहो तो तुम भी साफ और निर्मल पानी पी सकती हो।
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बकरी बोली हाँ, हाँ क्यों नहीं? मैं भी शुद्ध पानी पीना चाहती हूँ। लोमड़ी ने अपना हाथ बकरी को पकड़ाया और बकरी गड्ढे में आ गिरी। मौका पाते ही लोमड़ी बकरी के ऊपर चढ़कर छलांग लगा दी और वह गड्ढे से बाहर आ गई। बकरी को समझ में आ गया कि वह मूर्ख बन गई। बाहर निकलकर लोमड़ी बोली मूर्ख बकरी तुम्हें एक बार जरूर सोचना चाहिए था कि जमा हुआ पानी कभी साफ होता। यह कहते हुए लोमड़ी तेजी से जंगल की तरफ भाग निकली।
नैतिक सीख:
बिना बिचारे जो करें सो पाछे पछताए।
4. बारहसिंघा और शेर:

किसी नदी में एक बारहसिंघा पानी पी रहा था। उसने परछाई में देखा कि उसके सींग राजा के मुकुट के समान हैं। बारहसिंघा मन ही मन बहुत खुश हुआ। लेकिन इतने में उसकी नजर अपने पैरों पर पड़ी। जिसे देख वह बहुत दुखी हो हुआ। वह अपने आप से कहता हैं कि मेरे पैर बकरी के पैर की तरह क्यों हैं। वह अपने आप को कोसने लगता हैं कि भगवान को हमें घोड़े की तरह पैर देना चाहिए था।
जब वह पानी पीकर बाहर निकला तो उसने अपनी तरफ दबे पाँव एक शेर को आते देखा। वह घबरा गया तथा छलांग लगाते हुए जंगल की तरफ भाग निकला। कुछ दूर जाने के बाद जंगल की झाड़ियों में उसके सींग फँस गई। जिसे वह बहुत निकालने की कोशिश करता हैं। लेकिन, निकाल नहीं पाता हैं। इतने में शेर वहाँ आकर खड़ा हो जाता हैं।
शेर को अपने पास देख बारहसिंघा अपनी जान की भीख माँगने लगा। शेर अपना रूप श्रीकृष्ण के रूप में बदलता हैं। जिसे देख बारहसिंघा आश्चर्यचकित हो जाता हैं। भगवान श्रीकृष्ण बारहसिंघा से कहते हैं- “हमें हमेशा अपने हर एक अंग के ऊपर नाज करना चाहिए” क्योंकि, हमें जैसा भी भगवान ने बनाकर भेजा हैं उसी रूप में हमें अपने आप को स्वीकार करना चाहिए।
हमें कभी भी अपने किसी अंग का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। बल्कि हमें उस पर नाज करना चाहिए। इतना कहते हुए भगवान श्रीकृष्ण अदृश्य हो गए। बारहसिंघा अपनी सोच के ऊपर बहुत शर्मिंदगी महसूस किया। अब से वह अपने हर एक अंग से प्यार करने लगा।
नैतिक सीख:
जिस तरह समाज में रहने के लिए हमें हर तरह के लोगों की जरूरत पड़ती हैं। ठीक उसी तरह हमें अपने शरीर के हर एक अंग की जरूरत होती हैं। क्योंकि हमारा शरीर बिना किसी एक अंग के अधूरा हैं।
5. लोमड़ी और बगुला:

किसी नदी के किनारे एक लोमड़ी और बगुला रहते थे। दोनों में बहुत गहरी दोस्ती थी। बगुला नदी से मछलियों को पकड़कर लोमड़ी को खिलाता तथा लोमड़ी उसे नदी के बाहर की कुछ चीजे खिलाती थी। एक दिन लोमड़ी ने बगुले से कहा- “कल आप हमारे यहाँ दावत पर आइए। मैं आपकों अपने हाथों से अच्छा पकवान बनाकर खिलाऊँगी। बगुला लोमड़ी की बातों को मान गया।
अगले दिन जब वह लोमड़ी के घर पर पहुँचा तो लोमड़ी उसे एक थाली में सूप पीने के लिए दिया। सूप थाली की सतह पर फैला होने के कारण बगुला अपनी चोंच से सूप नहीं पी सका। बगुला बहुत भूखा था, उसके साथ ऐसे व्यवहार को देखकर वह बहुत दुखी हुआ। बगुला लोमड़ी से कहा,”चलता हूँ दोस्त! कहकर उड़ गया।”
बगुला नदी पहुँचकर कहा- “लोमड़ी ने उसके साथ ठीक नहीं किया, उसने मेरा अपमान किया हैं।” बगुला अब लोमड़ी को मजा चखाना चाहता था। अगले दिन लोमड़ी से बगुले ने कहा – “दोस्त कल तुम मेरे यहां दावत पर आना मैं तुम्हें कुछ अच्छे पकवान खिलाऊँगा।” उसकी बातों को सुनकर लोमड़ी बहुत खुश हुई।
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लोमड़ी अपने घर पहुँचकर सोचती हैं, अब मैं कल तक कुछ नहीं खाऊँगी। जिससे अधिक भूख लग सके और कल अपने दोस्त के घर भरपेट भोजन करूंगी। अगले दिन भूखी लोमड़ी बगुले के पास पहुंची। बगुले ने मछली बनाई थी, जिसकी खुशबू इतनी अच्छी थी कि लोमड़ी के मुँह से पानी टपक रहा था। बगुले ने लोमड़ी को एक लंबे गिलास में कुछ पकी हुई मछलियों को डालकर खाने के लिए दिया।
लेकिन गिलास इतना गहरा था कि उसका मुँह नीचे तक नहीं जा पा रहा था। बगुला उसे खाने की विधि बताते हुए अपनी चोंच गिलास में डालकर सभी मछलियों को खा गई। अब लोमड़ी को ऐहसास होने लगा जैसा करोगे, वैसा भरोगे। उसने अपने किए पर बगुले से माँफी मांगी। बगुला उसे माँफ कर दिया। फिर से उन दोनों के बीच दोस्ती हो गई।
नैतिक सीख:
अगर आप मान सम्मान पाना चाहते हैं तो, पहले आपको दूसरों को सम्मान देना पड़ेगा।
6. दो मूर्ख बकरी:

दो जंगल के बीच एक गहरी खाई थी। खाई में नीचे पानी का तेज बहाव रहता था। जिसके कारण एक जंगल से दूसरे जंगल में कोई जानवर नहीं जा पाते थे। एक बार किसी अंजान व्यक्ति ने एक जंगल से दूसरे जंगल को जोड़ने के लिए खाई के ऊपर एक पेड़ को रख दिया। उस पेड़ के ऊपर से एक बार में कोई एक व्यक्ति ही एक जंगल से दूसरे जंगल को जा सकता था।
एक दिन एक बकरी जंगल के इस पार से उस पार जा रही थी। इतने में उस पार से इस पार के लिए एक बकरी और भी आ रही थी। दोनों की मुलाकात खाई के बीचों-बीच लकड़ी के रास्ते में हो गई। दोनों बकरियाँ एक दूसरे को पीछे हटने के लिए कहने लगी। लेकिन, दोनों ही पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हो रही थी।
देखते ही देखते दोनों में तू तू, मैं मैं होने लगी। जिसके कारण दोनों अपने सिंह से एक दूसरे के ऊपर वार कर दिया। दोनों बकरियों का सींग एक दूसरे के सींग में फँसने के कारण दोनों खाई में जा गिरी। पानी का बहाव तेज होने के कारण दोनों पानी में बह गई।
नैतिक सीख:
परिस्थितियों के अनुसार कभी-कभी पीछे हट जाने में ही भलाई होती हैं।
7. प्यासा कौवा:

एक बार की बात हैं एक कौवा आसमान में उड़ रहा था, जोकि बहुत प्यासा था। उड़ते-उड़ते उसे एक कुआँ दिखाई दिया। कौए ने सोचा चलो इस कुएं पर अपनी प्यास बुझा लेता हूँ। कौवा कुएं पर आकर देखता हैं कि वह कुंआ तो सूखा होता हैं। कौवा दुखी हो जाता हैं उसकी प्यास और बढ़ती जाती हैं। कौवा फिर से उड़ान भरता हैं।
वह उड़ते-उड़ते काफी दूर आगे निकल आया। नीचे देखता हैं तो नदियाँ तालाब सब सूखे हुए थे। कौवा सोचता हैं अब तो प्यास के कारण जान निकल जाएगी। कुछ दूर और आगे जाने के बाद उसे एक नीम के पेड़ के नीचे एक घड़ा रखा हुआ दिखाई दिया। कौए के मन में एक आस जागी। वह सोचता हैं कि उसे यहाँ पर पीने के लिए पानी जरूर मिल जाएगा।
जब वह घड़े के ऊपर जाकर बैठा तो देखा कि घड़े में पानी तो हैं लेकिन उसकी चोंच वहाँ तक नहीं पहुँच पा रही थी। कौवा भगवान को कोसने लगा। वह कहता हैं- हे भगवान, अब हमारी परीक्षा मत लो, मुझे पानी पीने का जतन बताओ। कौवा बहुत मायूस हो गया। उसकी आँखों में आँसू भर आए।
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तभी कौवे की नजर घड़े के आसपास पड़े छोटे-बड़े पत्थरों पर पड़ी। कौवा बिना देर किए एक-एक करके पत्थरों को घड़े में डालना शुरू कर दिया। देखते ही देखते घड़े का पानी ऊपर आना शुरू हो गया। इस तरह से कौवे को पीने के लिए पानी मिल गया। कौवा भगवान का शुक्रिया अदा किया और वह वहाँ से उड़ गया।
नैतिक सीख:
बुद्धिमानी के साथ लिया गया फैसला सफलता की ओर ले जाता हैं।
8. अंगूर खट्टे हैं:

पहाड़ियों में घनश्याम नाम का एक माली रहता था। वह अपनी झोपड़ी के किनारे चहरदीवार के अंदर फल-फूल के पेड़-पौधे लगाए हुए थे। माली की झोपड़ी हर मौसम में फलों और फूलों से भरी रहती थी। उसकी झोपड़ी के आस-पास से जो भी गुजरता था। वहाँ के मनमोहक दृश्य तथा पेड़ों पर लगे फल और फूलों को देख मंत्रमुग्ध हो जाता था।
माली के बगीचे में आम, केला, संतरे, अंगूर जैसे अनेकों फलों के पेड़ लगे हुए थे। इन्ही पेड़ों के साथ-साथ किस्म-किस्म के फूल भी लगे हुए थे। माली अपना जीवन यापन फलों और फूलों को बेचकर करता था। एक बार कहीं से एक लोमड़ी माली के घर के पास आ पहुंची। लोमड़ी लटकते हुए अंगूर के गुच्छे देखे उसके मुंह में पानी आ गया।
लोमड़ी मन ही मन सोचने लगी कि आज तो मैं पेट भरकर अंगूर खाऊँगी। लोमड़ी इधर-उधर देखती हैं। जब उसे आसपास कोई दिखाई नहीं दिया। वह अंगूर की बेल के नीचे जाकर अंगूर को तोड़ने के लिए उछलने लगी। लेकिन, अंगूर के गुच्छे ऊपर होने के कारण वह अंगूर नहीं तोड़ सकी। इस तरह से लोमड़ी कई बार अंगूर तोड़ने का प्रयास की। लेकिन वह एक भी अंगूर नहीं पाई।
अंत में थक हार कर लोमड़ी अपने आप को समझाने के लिए कहती हैं- “अच्छा हुआ मुझे अंगूर नहीं मिला, मुझे पता हैं कि ये अंगूर खट्टे हैं।” यह कहते हुई लोमड़ी तेजी से जंगल की तरफ भाग गई।
नैतिक सीख:
किसी भी व्यक्ति या वस्तु में कमियाँ निकालने से अच्छा हैं, आपको अपनी कमियों को देखना चाहिए।
9. शेर और चूहा:

किसी जंगल में एक शेर रहता था। जिससे जंगल के सभी जानवर बहुत डरते थे। शेर दूर-दूर के जंगलों में शिकार करने जाया करता था। उसकी खूंखार दहाड़ से सभी सुरक्षित स्थान पर चले जाते थे। एक दिन शेर जंगल में किसी जानवर का शिकार करके धूप सेकते-सेकते सो गया। कही से एक चूहा आया वह उसके ऊपर चढ़कर उछल-कूद करने लगा।
ऐसा करने में उसे बहुत मजा आ रहा था। अचानक शेर नीद से जग गया। वह चूहे को अपने नुकीले पंजों में दबोच लिया। चूहा अपने जीवन की भीख माँगने लगा। वह कहता हैं- “हे राजन! मुझे छोड़ दो कभी मैं आपकी मदद जरूर करूंगा।”
शेर जोर-जोर से हँसने लगा। उसने कहा- “तुम इतने छोटे प्राणी हो तुम मेरी क्या मदद करोगे” फिलहाल मैंने अभी-अभी भोजन किया हैं। इसलिए आज मैं तुम्हें छोड़ता हूँ। लेकिन एक बात ध्यान रखना, आगे से कभी मेरे सोने में विघन डाला तो मैं तुम्हें खा जाऊंगा। इस तरह से शेर चूहे को छोड़ दिया। चूहा तेजी से भागकर अपने बिल में घुस गया।
कुछ दिन बाद शेर को शिकारियों ने जाल में फंसा दिया। शिकारी बहुत खुश थे। वे शेर को ले जाने के लिए गाड़ी लाने चले गए। शेर जोर-जोर से दहाड़ने लगा। उसकी आवाज सुनकर चूहा अपने दोस्तों के साथ तेजी से भागते हुए जंगल की तरफ आया। चूहा जाल को चारों तरफ से काटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते चूहे ने पूरे जाल को काटकर शेर को मुक्त कर दिया।
शेर जाल से निकलकर चूहे का धन्यवाद किया। चूहा कहता हैं- “महाराज मैंने आप से वादा किया था कि कभी न कभी आपके बुरे वक्त में जरूर काम आऊँगा। फिर आपने मुझे जीवनदान दिया था। आज मैंने आप से किया हुआ वादा निभा दिया।
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शेर ने चूहे से शुक्रिया किया। उसने चूहे से कहा, “आज से तुम हमारे दोस्त हो, तुम चाहे तो मेरे ऊपर उछलो-खेलों कूदो मैं तुम्हें मना नहीं करूंगा। चूहे ने राजा शेर सिंह का शुक्रिया अदा किया।
नैतिक सीख:
किसी भी इंसान को कम नहीं समझना चाहिए कौन, कब, कहाँ काम आ जाए, इसे कोई समझ नहीं सकता।
10. बगुला और भेड़िया:

एक भेड़िया शिकार करके मांस को खा रहा था। लेकिन वह बहुत डरा हुआ था। कहीं राजा शेर सिंह मेरे पास न आ जाए, नहीं तो वह मेरा शिकार कर लेंगे। इसी सोच में वह जल्दी-जल्दी मांस खा रहा था। अचानक भेड़िए के गले में मांस के साथ हड्डी फँस गई। अब भेड़िया कुछ खा नहीं पा रहा था।
उसके गले का दर्द धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। उसने सोचा अगर गले से हड्डी नहीं निकली तो मेरी जान भी जा सकती हैं। उसे कुछ सुझाई नहीं दे रहा था कि वह क्या करें? एकाएक उसके दिमाग में विचार आया कि अगर वह बगुले के पास जाए तो वह अपनी लंबी चोंच उसके गले में डालकर हड्डी निकाल सकती हैं।
वह तुरंत भागते हुए नदी के किनारे पहुंचा। बगुले को देखकर भेड़िया रोते हुए कहा- “बगुले भाई मेरे गले में एक हड्डी फंस गई हैं।” कृपया अपनी लंबी गर्दन वाली चोंच से हड्डी को बहार निकाल दो, मैं आपका आभारी रहूँगा।
बगुले ने कहा- “तुम्हारा क्या भरोसा मेरी गर्दन अपने मुंह के अंदर पाकर दबोच लिया तो मैं क्या करूंगा।” भेड़िया बगुले को विश्वास दिलाया कि वह ऐसा किसी भी हाल में नहीं करेगा। बल्कि, इसके बदले में उसे बहुत बड़ा इनाम भी देगा। उसका दर्द और बढ़ता ही जा रहा था।
उसकी हालत देख बगुले को भेड़िया के ऊपर दया आ गई। उसने अपनी चोंच उसके मुँह में डालकर उसके गले की हड्डी निकाल दिया। भेड़िया राहत की साँस लिया और वह वहाँ से जाने लगा। बगुला कहता हैं- भेड़िया भाई तुमने हड्डी निकालने के बदले इनाम देने की बात कही थी।
मेरा ईनाम कहाँ हैं? बगुला बदले हुए स्वर मे बोला – “भूल गए तुम, तुम्हारी गर्दन मेरे मुहँ में थी, मैंने तुम्हें जीवनदान दे दिया” मैं चाहता तो तुम्हें खा सकता था। तुम्हारे लिए इससे बड़ा इनाम क्या होगा। ऐसा कहते हुए भेड़िया जंगल की तरफ भाग गया।
नैतिक सीख:
हमें किसी भी इंसान की मदद बहुत सोच समझकर करनी चाहिए।
🙋♂️ FAQs – बच्चों की रात की कहानियां हिन्दी में
Hello, I’m Reeta, a passionate storyteller and a proud mom of two. For the past 8+ years. I have been writing Hindi stories that teach moral values and bring happiness to children. On Kahanizone, I share Hindi kahaniyan, Panchatantra stories, bedtime tales and motivational kahaniyan that parents trust and kids enjoy. As a mother, I know what children love to hear, and through my stories I try to give them imagination, values, and joy. My aim is to entertain, inspire, and connect with readers of all ages.

