परोपकार का फल | अनाथालय से डॉक्टर तक का सफर

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एक दिन सुबह-सुबह राधेश्याम दूध बेचकर वापस अपने घर जा रहा था। बीच रास्ते में उसे एक बच्ची मिली, जोकि बहुत रो रही थी। बच्ची की उम्र लगभग दस साल रही होगी। वह अपना नाम प्रिया बता रही थी। राधेश्याम ने उस बच्ची से पूछा, “तुम कहाँ से आई हो? तुम्हारा घर कहाँ हैं। प्रिया ने कहा, “मेरे मम्मी-पापा नहीं हैं। मैं अपने मामा के घर पर रहती थी। मेरे मामा ने मुझे अनाथालय में छोड़ दिया।” अब मैं वहाँ नहीं रहना चाहती।

इसलिए मैं, अनाथालय से भाग आई। राधेश्याम ने कहा, “चलो मैं फिर तुम्हें अनाथालय छोड़ दूँ।” प्रिया ने कहा, “नहीं मैं अब वहाँ नहीं जाऊँगी।” राधेश्याम अपने घर को जाने लगा। बच्ची भी राधेश्याम के पीछे-पीछे चलने लगी। राधेश्याम ने कई बार उसे मना किया कि वह अपने घर जा रहा हैं। तुम अनाथालय चली जाओ। वहाँ के लोग तुम्हें खोज रहे होंगे। लेकिन बच्ची ने राधेश्याम की एक बात नहीं मानी।

वह उसके घर तक आ गई। राधेश्याम ने अपनी पत्नी से सारी बात बता दी। पत्नी ने कहा, “कोई बात नहीं आज इसे यही रहने दो। अगर अनाथालय के लोग यहाँ आएंगे तो हम उन्हें इसे सौप देंगे।” अगली सुबह राधेश्याम और उसकी पत्नी घूमने के बहाने प्रिया को अनाथालय लेकर जाने लगे। बीच रास्ते में तेज बारिश होने लगी। राधेश्याम उसकी पत्नी और प्रिया एक पेड़ के नीचे रुक गए।

तेज गरज और चमक के साथ बारिश हो रही थी। बारिश देख प्रिया का मन बारिश में भीगने का करने लगा। प्रिय अपना हाथ राधेश्याम से छुड़ाकर खुले मैदान में भीगने के लिए चली गई। राधेश्याम उसे बार-बार बुला रहा था। लेकिन, वह नहीं आ रही थी। तभी उसकी पत्नी ने कहा, “तुम जाओ उसे पकड़ लाओ, नहीं तो बारिश में भीगने से उसकी तबीयत खराब हो जाएगी। राधेश्याम प्रिया को पकड़ने खुले मैदान की तरफ चला गया।

अचानक तेज गरज के साथ पेड़ पर बिजली गिर गई। जिससे राधेश्याम की पत्नी की मृत्यु हो गई। राधेश्याम बहुत उदास हुआ। वह चिल्ला-चिल्ला कर खूब रोया। अब इस दुनिया में राधेश्याम का कोई नहीं था। उसने सोचा, चलो इस बच्ची को अपने घर पर रख लेते हैं। वह उस बच्ची को अपनी पोती की तरह मानने लगा।

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एक दिन प्रिया ने कुछ बच्चों को अपने घर के सामने से स्कूल जाते हुए देखा। बच्चों को स्कूल जाते देख वह बहुत खुश हुई। राधेश्याम ने उसका भी दाखिल स्कूल में करवा दिया। धीरे-धीरे समय बीतता चला गया। प्रिया ने स्कूली शिक्षा पूरी कर ली। उसके स्कूल में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए एक परीक्षा हुई। प्रिया उस परीक्षा को भी पास कर ली। अब वह डॉक्टरी की पढ़ाई करने लगी थी।

लगभग पाँच साल बाद उसने स्कूल टॉप करके डॉक्टरी में गोल्ड मेडल प्राप्त की। उसे किसी हॉस्पिटल में आँख के डॉक्टर के रूप में नियुक्त किया गया। एक दिन उसी हॉस्पिटल में एक बुजुर्ग व्यक्ति आया। उसे कई तरह की बीमारी थी। जिसके कारण उसको अस्पताल में भर्ती कर लिया। उसकी दोनों आँखों से उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

हॉस्पिटल के लोगों ने कहा, “अभी तक तुम्हारा बिल एक लाख रुपये बन चुका हैं।” दो लाख रुपये की व्यवस्था और करो तुम्हारे आँख का ऑपरेशन करना पेड़गा, तभी तुम्हें दिखाई देगा। उस बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा, “मेरे पास पैसे नहीं हैं। वह अब हॉस्पिटल से भी बाहर नहीं जा रहा था।”

एक दिन अस्पताल के लोगों ने उसे जबरदस्ती हास्पिटल से बाहर कर रहे थे। तभी वहाँ पर डॉक्टर प्रिया आई। लोगों ने डॉक्टर से सारी बातें बात दी। डॉक्टर मरीज को देखने गई। वह बुजुर्ग व्यक्ति को देखकर बोली, “जल्दी से स्ट्रेचर लाओ, मरीज को तुरंत ऑपरेशन कक्ष में ले चलो।

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कर्मचारियों ने कहा, “मैडम इसी पेसेन्ट के एक लाख से अधिक पैसे बकाये हैं।” डॉक्टर प्रिया ने कहा, “मैं जो कह रही हूँ, तुम वही करो” डॉक्टर प्रिया ने उस बुजुर्ग व्यक्ति के दोनों आँखों का ऑपरेशन लगभग दो घंटे तक किया। जब बुजुर्ग व्यक्ति को होश आया तो उसने देखा कि प्रिया उसके सामने खड़ी थी।

यह वही लड़की थी, जो राधेश्याम को रोड पर मिली थी। प्रिया अपने दादा के गले लगकर सिसक-सिसक कर रो रही थी। उसने कहा, “दादा जी मैंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद घर गई। लेकिन वहाँ आप नहीं मिले। मैंने आस-पास के लोगों से भी पूछा, लेकिन सभी ने आपके बारे में कुछ बताने से मना कर दिया।” राधेश्याम अपनी पोती को डॉक्टर बने देख बहुत खुश था। उसके आँखों से खुशी के आँसू निकल रहे थे।

उन्होंने कहा, “बेटा! मैं बिना किसी से बताए पैसे कमाने के लिए इस शहर में चल आया” अचानक एक दिन मेरी तबीयत बहुत खरब हो गई। मुझे किसी ने इस हॉस्पिटाल में छोड़कर चला गया। मुझे कुछ दिखाई नहीं देता था। सिर्फ सुनाई देता था। दोनों एक दूसरे के गले लगकर खूब रोए। प्रिया अपने दादा का अच्छे से इलाज किया और वह ठीक हो गए। अब दोनों एक साथ रहने लगे।

नैतिक शिक्षा:

परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता, वह वापस में फल जरूर देता हैं।

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