1. कुम्हार की सीख:
ईश्वरपुर गाँव में देवतादीन नाम का एक कुम्हार रहता था। वह मूर्तियों को बनाकर बेचता था। उसी से उसका भरण-पोषण होता था। उसका एक बेटा था जिसका नाम रमेश था। जब वह बड़ा हो गया तो देवतादीन ने उसे भी मिट्टी की मूर्तियाँ बनाना सीखाना शुरू कर दिया।
लेकिन, शुरू के दिनों में उससे मूर्तियाँ ठीक नहीं बनती थी। जिसके कारण उसके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की कीमत मात्र पाँच रुपये ही मिलती थी। जबकि उसके पिता के द्वार बनाई गई मूर्तियों की कीमत दस रुपये मिलती थी।
कुम्हार देवतादीन अपने बच्चे रमेश को बहुत बड़ा मूर्तिकार बनाना चाहता था। इसलिए वह हमेशा उसे मूर्तियों के बारें में कुछ न कुछ समझाता रहता था। रमेश अपने पिता की बातों का पालन भी बहुत ध्यान से करता था। इस तरह से धीरे-धीरे एक समय ऐसा आया कि रमेश द्वारा बनाई गई मूर्तियों की कीमत, उसके पिता से भी ज्यादा पंद्रह और बीस रुपये तक मिलने लगी थी।
अब वह खुशी-खुशी और अधिक मूर्तियाँ बनाया करता था। लेकिन, उसके पिता अब भी उसे मूर्तियाँ बनाते समय कुछ न कुछ कमियों के बारे में समझाते रहते थे। एक दिन रमेश ने खीझकर अपने पिता से कहा- “मेरी मूर्तियाँ आप से अच्छी बनती हैं और उसके दाम भी आप से ज्यादा मिलते हैं फिर भी आप मेरी मूर्तियों में कमियाँ निकालते रहते हैं।
रमेश की बातों को सुनकर देवतादीन उसे समझाते हुए बोला- “बेटा तुम्हारी तरह ही मुझे भी युवावस्था में अपनी कलाकारी का अभिमान हो गया था कि मुझसे ज्यादा अच्छी मूर्तियाँ कोई नहीं बना सकता। इसलिए, आज मेरी मूर्तियाँ सिर्फ दस रुपये तक ही बिकती हैं। आपकी कमियाँ निकालने का मेरा मकसद आपको नीचा दिखाना नहीं हैं। बल्कि, मैं चाहता हूँ कि आप एक श्रेष्ठ मूर्तिकार बन सको।
पिता की बातों को सुनकर रमेश ने कहा- “पिताजी आज आपने मेरी आँखें खोल दी, मुझे भटकने से बचा लिया” मैं आपकी यह सीख जीवन पर्यन्त याद रखूँगा। उसका अहंकार दूर हो गया। देवतादीन ने अपने बेटे को गले से लगा लिया। इस तरह रमेश एक दिन बहुत बड़ा मूर्तिकार बना।
नैतिक सीख:
जीवन के किसी भी पड़ाव पर इंसान कभी पूर्ण नहीं होता। इसलिए वह सीखता रहता हैं।
2. आत्मनिर्भर व्यक्ति की पहचान:

एक बार की बात हैं, कुशी नगर में एक राजा रहता था। जिसका नाम उदयभान सिंह था। उसे अपनी प्रजा से बहुत अधिक लगाव था। इसलिए, उसके राज्य की जनता भी उसे बहुत चाहती थी। राजा अक्सर अपना वेष बदलकर अपने राज्य में घूमा करता था। जिससे वह समझ सके कि उसके राज्य में किसी को कोई दिक्कत तो नहीं हैं।
एक दिन राजा उदयभान सिंह शाम के समय एक रईस व्यक्ति का रूप बदलकर अपने राज्य में घूमने निकले। राजा को बीच रास्ते में एक बुजुर्ग लकड़हारा मिला। वह जंगल से लकड़ियों का एक गट्ठर अपने सिर पर रखकर चला आ रहा था। उसे देख राजा ने पूछा- “बाबा आप इतने बुजुर्ग हो गए हैं फिर भी इस तरह की मेहनत करते हैं, आपको कष्ट नहीं होता हैं।”
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“भगवान ने हमें सुंदर-सुंदर हाथ पैर क्यों दिए हैं?” मेहनत करने के लिए, अगर मैं मेहनत नहीं करूँगा तो मेरे घर में खाना कहाँ से आएगा। लकड़हारे ने कहा। आप किसी की मदद क्यों नहीं ले लेते, राजा ने कहा। लकड़हारे ने जबाब दिया- “मैं ठहरा गरीब आदमी इस दुनिया में मेरा कोई नहीं हैं, मेरी मदद कौन करेगा।”
राजा ने लकड़हारे से पूछा- “क्या आपको मालूम हैं कि आपके राज्य के राजा बहुत दयालु हैं। वे गरीब बेसहारा लोगों की सहायता करते हैं।” लकड़हारे ने कहा- “यह बात मुझे अच्छे से पता हैं कि हमारे राज्य का राजा बहुत दयालु हैं। उनके पास जो भी जाता हैं कभी निराश नहीं लौटता।” लेकिन, जब तक मेरे हाथ पैर चल रहे हैं। मैं खुद परिश्रम करके अपना जीवन यापन करना चाहता हूँ।
किसी के ऊपर निर्भर रहकर मुझे उसके ऊपर भार बनना मेरे वसूलों के खिलाफ हैं। इसलिए, मैं राजा के पास मदद मांगने के लिए नहीं जा रहा हूँ। उसकी बातों को सुनकर राजा नतमस्तक हो गया। उसने कहा- “काश! इस राज्य में तुम्हारे जैसे और लोग होते तो राजा को प्रजा के बारें में अधिक चिंता नहीं होती।”
नैतिक शिक्षा:
आत्मनिर्भर तथा स्वावलम्बी व्यक्ति दूसरों से मदद लेने के बजाय मदद करने की कामना करते हैं।
3. कापी-किताब का दुबारा उपयोग:

किसी शहर में राहुल पाँचवी कक्षा में पढ़ता था। गर्मियों की छुट्टियाँ हुई। राहुल गाँव में अपने मामा के घर गया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि, खुले-खुले खेत खलिहान, बागों में पेड़ों पर पके हुए आम लटक रहे हैं। यह सब देख राहुल खुशी से झूम उठा। उसे कोयल की मीठी-मीठी कू-कू की आवाज भी सुनाई दे रही थी। शाम की हवा भी ठंडी-ठंडी चल रही थी।
यह सब देख राहुल से रहा नहीं गया। और उसने अपने साथ लाई कापियों के पेज को फाड़कर जहाज बनाकर उड़ाना शुरू कर दिया। हवा तेज चल रही थी, जिससे राहुल को पेपर का जहाज उड़ाने में बहुत मजा आ रहा था। देखते-देखते राहुल ने अपनी कापी के सभी पेज फाड़कर जहाज बना दिया।
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तभी राहुल के मामा आफिस से घर आए। राहुल को पेज फाड़ते देख बोले- “राहुल तुम पेज क्यों फाड़ रहे हो?” मामा जी मैं पेज के जहाज बना रहा हूँ।” राहुल ने जबाब दिया। उसके मामा ने उसे समझाते हुए कहा- देखो बेटा, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, तुमने कितने पेज फाड़ दिए। तुम्हें पता हैं, इस दुनिया में कितने बच्चे ऐसे हैं जो कापी, पेंसिल न मिल पाने की वजह से स्कूल नहीं जाते।
राहुल को उसके मामा ने और समझाते हुए कहा- ”बेटा तुम ये जो हरे-भरे पेड़ पौधे देख रहे हो, इन्ही को काटकर उनसे ही कापियाँ बनाई जाती हैं।” जरा सोचो तुम्हारी तरह ही अगर सभी बच्चे नए-नए पेजों को फाड़कर उसकी नाव और जहाज बनाकर बर्बाद करेंगे तो कितना नुकसान होगा। राहुल अपने मामा से पूछता हैं- “फिर हम पुरानी कापियों को फाड़कर जहाज बना सकते हैं न?”
उसके मामा राहुल से कहते हैं- “हम लोग पुरानी कापियों को रफ के लिए उपयोग करते थे। उसके बाद हम लोग कापियों को रद्दी वाले को बेच देते थे। जिससे हमें कुछ पैसे भी मिल जाते थे और वह कापी फिर से रीसाइक्लिंग होकर उसके अखबार बन जाते हैं। इस तरह पेड़ों की कटाई कुछ हद तक कम हो जाती हैं।
क्योंकि पेड़ से ही हमें ऑक्सीजन मिलते हैं। यही वह कारण है कि हमें स्कूल में अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता हैं। राहुल अपने मामा से वादा किया कि अब वह किसी तरह के पेज को बर्बाद नहीं करेगा। और वह अपने मामा को वचन देता हैं कि मैं अपने स्कूल में ऐसा करने वाले बच्चों को भी रोकेगा।
नैतिक सीख:
हमें कापी किताब को बर्बाद नहीं करना चाहिए। बल्कि उसको रीसाइक्लिंग करना चाहिए।
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