अगर आप बच्चों के लिए अच्छी Stories with Moral in Hindi खोज रहे हैं, तो यहाँ 10 चुनिंदा हिन्दी कहानियाँ दी गई हैं। ये कहानियाँ मनोरंजन के साथ जीवन की महत्वपूर्ण सीख भी देती हैं। हर कहानी छोटी, सरल और याद रखने योग्य है। जोकि बच्चों और बड़ों के दिलों दिमाग में घर कर जाएगी। तो चलिए देखते हैं सभी कहनियों को:
1. जो हो गया सो हो गया:

किसी पेड़ के नीचे एक साधु महात्मा ध्यानमग्न साधना में बैठे थे। गुस्से से भरा एक आदमी आया और उसने महात्मा के शरीर पर थूक दिया। उसने उन्हें अनेकों गालियां भी दी। जब वह चुप हुआ तो महात्मा ने थूक को चादर से पोंछते हुए कहा- “मित्र! कुछ और भी कहना चाहते हो?” महात्मा की बात सुनकर वह आदमी चौक गया।
उसने सोचा थूकने और गाली देने वाले को भी कोई इतने प्यार से ‘मित्र’ कैसे कह सकता है?” वह चुपचाप वहाँ से चला गया। महात्मा जी का एक शिष्य यह सब कुछ देख रहा था। वह क्रोध से भर उठा उसने कहा- “गुरुदेव! वह दुष्ट आदमी आप पर थूक कर गया और आप पूछते हैं कि मित्र कुछ और कहना है?”
यह सुनकर महात्मा ने शिष्य से कहा- “कभी-कभी भाव इतना बड़ा होता है कि सब कुछ छोटे हो जाते हैं।” कोई प्रेम से इतना भर जाता है कि शब्दों में नहीं कह पाता। इसलिए वह गले लगा लेता है। जबकि, “कोई क्रोध से इतना भर जाता है कि शब्दों के द्वारा कुछ कह नहीं पता, इसलिए थूककर कहता है।”
महात्मा पर थूकने वाला व्यक्ति रात भर सो नहीं सका। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी आदमी हो सकता है, जो थूकने पर गुस्सा करने के बजाय मित्र कहकर पुकारे और पूछे कि कुछ और कहना है। सुबह होते ही वह महात्मा के पास पहुँचा और अपने किए की माफी मांगने लगा।
महात्मा जी ने उस आदमी को सच्चे दिल से क्षमा करते हुए कहा- “जो हो गया, सो हो गया। हम तो आगे बढ़ गए हैं, कल की बात भूल गए हैं। लेकिन तुम कल की बात पर क्यों रुके हो? आप खुशी-खुशी जाओ और नेक काम करो, इसी में तुम्हारी भलाई है।”
इतना कहकर महात्मा जी अपने शिष्य के संग आगे कदम बढ़ाने लगे…। वह आदमी खुद को ही घृणा से देखने लगा। दूसरे ही पल जब उसके मस्तिक में महात्मा के ये शब्द गूंजे- “जो हो गया, सो हो गया…” इन शब्दों की ऊर्जा से उसने अपने आपको बदल दिया।
नैतिक शिक्षा:
पुरानी बातों के चक्कर में आज का समय खराब न करे।
2. मन निर्मल तो तन निर्मल:

कृष्णा नदी के किनारे एक महर्षि का आश्रम था। उस आश्रम में दूर-दूर से शिष्य शिक्षा ग्रहण करने आते थे। आसपास के गांवों में उनकी काफी ख्याति थी। साल में एक बार महर्षि गाँवों में जाकर लोगों के दुख दर्द को सुनते एवं उन्हें उचित सलाह भी देते। बदले में गाँव वाले उन्हें कुछ-ना-कुछ चीजें उपहार में दिया करते थे।
हर साल की तरह इस साल जब महर्षि गाँव में पहुँचे तो लोगों को बिजली की तरह उनके आने की सूचना मिल गई। खुली जगह में एक घने पेड़ के नीचे उन्होंने अपना आसन जमाया। देखते-ही-देखते गाँव वालों की भीड़ वहाँ जमा हो गई। एक-एक कर महर्षि सबका दुख दर्द सुनाने लगे। उन्हें उचित सलाह भी दे रहे थे। साथ ही उनके द्वारा लाए गए उपहार को स्वीकार करते जा रहे थे।
काफी देर बाद एक जमींदार साहब सुसज्जित रथ पर सवार होकर वहाँ पहुँचे। उनके तन पर बेशकीमती वस्त्र थे। गले में मोतियों की माला और दोनों हाथों की अंगुलियों में हीरे जड़ित अंगूठियां थी। रथ से उतरकर महर्षि के करीब आकर उन्हें प्रणाम कर बोले, “महाराज, मेरे पास सब कुछ है। मगर मन अशांत है। कुछ उपाय बताइए।”
जमींदार की क्रूरता और उसकी दुष्ट नीयत से महर्षि भली-भाँति अवगत थे। महात्मा ने कहा, “तुम्हारी मूर्खता की वजह से तुम्हारे मन में अशान्ति है।” कैसी मूर्खता? किसी तरह उसने अपने क्रोध को दबाकर महर्षि से पूछा। महर्षि ने अपने पास रखे नारियल को हाथ में लेकर कहा, “अगर इसका बाहरी हिस्सा साफ-सुथरा हो और अंदर का फल सड़ा हो तो उसका क्या महत्व है?”
“कुछ नहीं।” बाहरी हिस्सा तन है और अंदर का फल इसका मन। तुम्हारी मूर्खता यही है कि तुमने अपने तन को तो साफ-सुथरा रखा मगर मन को सड़ा दिया। मन के मैल की वजह से तुम्हारे जीवन में ‘आशांति’ है। तुमने गरीब जनता का शोषण ही नहीं किया है, उन पर अत्याचार और अन्याय भी किया है। जिनसे तुम्हारा मन काफी मैला हो चुका है।
मन में, जब मैल हैं तो वहाँ शांति कहाँ से, कैसे आएगी?” महर्षि ने दो टूक बात कही। जमींदार सहम गया। उसने कहा – “महाराज, अब मैं क्या करूँ?” सदव्यवहार और परोपकार करके ही अपने मन की मैल को धोकर साफ कर सकते हो। तभी सच्ची शांति तुम्हें मिलेगी। अपनी भूल का एहसास जमींदार को हो गया। उन्होंने महर्षि की बात मान ली। और उनके बताए रास्ते पर चलना शुरू कर दिया।
नैतिक शिक्षा:
बाहरी दिखावे से अच्छा हैं आंतरिक मजबूती।
और कहानियाँ देखें: 5 नैतिक शिक्षा वाली कहानियाँ
3. जल्दी अमीर बनने की लालच:

अलगू चौधरी का एक बैल मर गया था। खेती-बाड़ी के लिए उसको एक बैल की बहुत जरूरत थी। अतएव एक दिन वह पाँच हजार रुपये लेकर घर से बैल खरीदने के लिए निकला। रास्ते में उसे कुछ ठग मिल गये। उनमें से एक ने उससे कहा- “तुरंत अमीर बनने का एक अच्छा तरीका है।”
अलगू चौधरी उत्सुक होकर पूछा वह कौन सा तरीका हैं। आओ मेरे साथ- कहकर ठग ने उसे एक ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ जुए का खेल हो रहा था। कई खिलाड़ी वहाँ मौजूद थे। अलगू चौधरी ने देखा, तुरंत कुछ खिलाड़ियों के रुपये दोगने हो गये। तभी ठग ने उससे कहा- “अगर तुम्हारे पास भी रुपये हैं तो अपनी तकदीर को आजमा लो।”
अगर तकदीर ने साथ दिया तो अमीर बनते देर नहीं लगेगी। खेती-बाड़ी करते-करते मर जाओगे, मगर अमीर कभी नहीं बन पाओगे। बस, किसी तरह पेट भर सकोगे। जैसे-तैसे दिन काटेंगे। ठग की बात अलगू चौधरी के दिमाग में बैठ गई। वह बोला- ‘ठीक कहते हो भाई।’ फिर देर क्यों करते हो। निकालो रुपये और आजमा लो अपनी तकदीर! ठग ने उसे प्रेरित किया।
रुपये निकाल कर अलगू चौधरी जुआ खेलने बैठ गया। शुरू में उसकी जीत होती रही। मनोबल खूब बढ़ गया। खुशी भी हुई, मगर लालच ने उसका पीछा नहीं छोड़ा, नतीजा हुआ कि आखिर में वह सभी रुपये हार गया। खूब पछताया, उसके पास सिर्फ पाँच रुपये बचे थे।
सिर पीटते हुए वह वहाँ से निकला। समय काफी हो चुका था। उसे ज़ोर से भूख लगी थी। मगर खाने के लिए पास में कुछ नहीं था। आसपास कोई दुकान भी नहीं थी। निराश होकर वह घर लौट रहा था। एक आदमी बेल नामक फल बेचता हुआ उसके करीब से गुजरा। उसने उसे रोका।
चुनकर दो बेल उसने पाँच रुपए देकर खरीदें। पास ही एक घने पेड़ की छांव में बैठकर उसने एक बेल खाया। बेल खूब मीठा और स्वादिष्ट था। पास के कुएं पर जाकर उसने हाथ-मुँह धोया। बेल खाकर उसकी भूख शांत हुई। बचा हुआ एक बेल लेकर वह अपने घर पहुँचा।
तब तक संध्या हो चुकी थी, घर पर उसका दोस्त सोहन इंतजार कर रहा था। अलगु चौधरी की नजर पड़ते ही वह चहक उठा। उसने कहा- “घर में पूछने पर मालूम हुआ कि तुम कोई बैल खरीदने गए हो, मगर देखता हूँ खाली हाथ लौट रहे हो, बैल नहीं मिला क्या?
गया तो था जरूर बैल खरीदने मगर लौटा हूँ एक बेल लेकर। कह कर अलगू चौधरी ने आपबीती सुनाई। सुनकर सोहन जोर से हँसा फिर गंभीर होकर बोला- भाई लालच कभी अच्छा नहीं होता। जुआ खेलना अच्छी बात नहीं है। जो मेहनत और ईमान की कमाई से अमीर नहीं हो पाया, वह जुए से कभी नहीं हो पाएगा। अलगू चौधरी को सोहन की बात को गांठ बांध लिया।
नैतिक शिक्षा:
सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता। उसके लिए मेहनत करनी पड़ती हैं।
4. क्रूर जागीरदार और दयालु बेटा:

काफी समय पहले की बात हैं। राजपूताना क्षेत्र में मान सिंह नाम का एक जागीरदार था। उसका एक पुत्र था जिसका नाम शेरसिंह था। शेरसिंह बड़ा होनहार और दयालु स्वभाव का था। एक बार राजपूताना में बरसात नहीं हुई, अकाल पड़ गया। किसान जागीरदार को लगान नहीं दे सके।
जागीरदार के कर्मचारियों ने जबरदस्ती किसानों के घरों में जो कुछ भी था वह उठा लाए और किसानों को पकड़कर जागीरदार के सामने पेश किया। शेरसिंह ने देखा की उन गरीब और लाचार किसानों को सताया जा रहा हैं। उन्हें देखकर उसे दया आई। उसने उनकी मदद करने की सोची। शेरसिंह उन दिनों घुड़सवारी सीख रहा था।
जागीरदार अपने बेटे शेरसिंह से कहा- “जिस दिन तुम घुड़सवारी अच्छी तरह सीख लोगों मैं तुम्हें मुँह-माँगा ईनाम दूंगा।” शेरसिंह ने अभ्यास करके घुड़सवारी में निपुणता हासिल कर ली। एक दिन उसने जागीरदार के सामने अपनी घुड़सवारी का प्रदर्शन किया। जागीरदार ने खुश होते हुए कहा- “बेटा! मैं बहुत खुश हूँ, बोलो क्या ईनाम चाहते हो?
शेरसिंह ने कहा- पिताजी! इस वर्ष वर्षा न होने से किसानों के पास खाने को कुछ नहीं हैं तो लगान कहाँ से दे? इन किसानों का लगान माँफ कर दीजिए और हो सके तो इन गरीब किसानों की मदद भी कीजिए। शेरसिंह की बात सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। ये सब तो मैं अभी कर देता हूँ। परंतु बेटा, तुमने अपने लिए तो कुछ नहीं मांगा, कुछ तो मांगों।
इन्हें भी देखें: 10 Lines Short Moral Stories for Kids | 1 Minute Read
इस पर शेरसिंह ने कहा- पिताजी! आप प्रसन्न है तो यह नियम बना दें कि जिस वर्ष फसल अच्छी न हो उस वर्ष लगान न लिया जाए। जागीरदार ने ऐसा ही किया, किसानों की जब्त की हुई चीजें लौटा दी और भविष्य में फसल न होने पर लगान न लेने का नियम बना दिया। शेरसिंह जैसे दयालु स्वभाव के लोग दिलों पर राज करते हैं। जबकि, शक्ति वाले लोग डरा-धमका कर क्रूर व्यवहार से लोगों को केवल डरा सकते हैं।
नैतिक शिक्षा:
विनम्र स्वभाव के लोग सभी के दिलों पर राज करते हैं।
5. इज्जत से बढ़कर कुछ नहीं:

एक बार एक लकड़हारा एक गाँव से दूसरे गाँव को जा रहा था। उस पर चार चोर टूट पड़े। लकड़हारे ने बड़ी वीरता से चोरों का मुकाबला किया। वह चोरों से लड़ते-लड़ते थक गया। तब चोरों ने उस पर काबू पा लिया। काफी उत्साह से चोरों ने लकड़हारे की जेब टटोलनी शुरू की। लकड़हारे ने जिस वीरता से उनका मुकाबला किया था। उससे चोरों ने यह समझा था कि जरूर इसके पास काफी धन हैं।
लेकिन, चोर उस समय ठगे से रह गए। जब उन्होंने लकड़हारे की पूरी तलाशी में मुश्किल से चार-पाँच सिक्के मिले। एक चोर से रहा नहीं गया, उसने लकड़हारे से पूछ ही लिया- “हद हो गयी। इतनी मामूली सी रकम बचाने के लिए तुमने इतने जोरो से मुकाबला किया? यदि तुम्हारी जेब में सोने के दो-तीन सिक्के होते तो जरूर तुम हम चारों को जान से मार डालते।
लकड़हारे ने जवाब दिया- “नहीं, सवाल इज्जत का हैं। मैं अपनी गरीबी अजनबियों के सामने जाहिर नहीं होने देना चाहता था। मेरी जेब में क्या हैं, क्या नहीं यह मेरा रहस्य था।” किसी के भी सामने मैं इस रहस्य को क्यों खोलता? इज्जत की खातिर तो मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ। ‘इज्जत’ की बात सुनते ही चारों चोर स्तब्ध रह गए और चुपचाप वहाँ से निकल गए।
नैतिक शिक्षा:
पैसे से बड़ी इज्जत होती हैं।
6. राजगद्दी योग्य राजकुमार:

एक राजा था। उसकी उम्र बहुत हो चुकी थी। उसके तीन पुत्र थे। उसने सोचा कि अब राजगद्दी, योग्य पुत्र के हाथ में सौंप दूँ। यह सोचकर राजा ने तीनों पुत्रों को बुलाया और कहा- जो भी मेरी परीक्षा में खरा उतरेगा, उसको ही राजगद्दी का अधिकारी बनाऊंगा।
राजा ने उन्हें पाँच वर्ष का समय दिया। तीनों पुत्र राजमहल छोड़कर चले गए। “पहले ने सोचा की बहुत सारा धन कमाऊँगा, धन को देखकर पिताजी खुश होंगे।” दूसरे ने सोचा कि अधिकतर लोग शक्तिशाली व्यक्ति को पसंद करते हैं, तो क्यों ना मैं एक शक्तिशाली सेना तैयार करूँ। उसने एक सेना तैयार करनी शुरू कर दी।
तीसरे ने सोचा कि धन तो हाथ का मैल है और शक्ति से भी बड़ी बुद्धि का सदाचार है। अतः वह दूसरे राज्य में जाकर बस गया। बड़ी मेहनत करके वह जो भी कमाता, उसमें से आधा धन दीन-दुखियों की सेवा में लगाता। वह सब की सहायता के लिए हर समय तत्पर रहता। उसका परिश्रमी स्वभाव, दयालु तथा परोपकारी और सेवाभाव को पूरा राज्य जान गया था।
राजा के कानों में भी इस बात की खबर पहुंच गई थी। राजा ने अपने गुप्तचर भेज कर भी पता लगाया कि वह परोपकारी दयालु पुरुष कौन है? पाँचवा वर्ष बीतने वाला था। दूसरे पुत्र ने अपने बड़े भाई के ऊपर आक्रमण करके सेना के बल पर सारी कमाई छीन ली और पैसों को लेकर पिता के पास पहुँचा। इसी बीच फटेहाल निर्धन व्यक्ति की अवस्था में तीसरा पुत्र भी आ पहुंचा।
राजा अपने तीनों पुत्रों के कार्य, स्वभाव और व्यवहार की तुलना कर रहा था कि पड़ोस के राजा के आने का समाचार मिला। पड़ोसी राजा का स्वागत-सत्कार कर उसे राजमहल में ठहराया गया और उसके आने का कारण जानना चाहा तो पड़ोसी राजा ने कहा- आपसे निवेदन करने आया हूँ कि अपने छोटे बेटे का विवाह मेरी पुत्री से करने की कृपा कीजिए।
और पढ़ें: बच्चों के लिए 10 मजेदार कहानियां
राजा ने कहा- वह तो निर्धन और फटेहाल लौटा है। वह आपकी राजकुमारी की योग्य कहाँ? पड़ोसी राजा ने उत्तर दिया- वह मेरे ही राज्य में पिछले पाँच वर्षों से रह रहा था। मेरे राज्य में उसका बहुत आदर-सत्कार है। मुझे तो ऐसे ही दामाद की आवश्यकता है। विवाह के बाद अपना राजकार्य संभालने की प्रार्थना उसी से करने वाला हूँ।
राजा ने कहा- आप कुछ दिन मेरे ही अतिथि बन कर रहने की कृपा करें। मैं उसी को अपनी राजगद्दी भी सौंप रहा हूँ। क्योंकि, मेरी कसौटी पर मेरा छोटा बेटा ही खरा उतरा है। दूसरे दिन भरे दरबार में राजा ने घोषणा की कि जो व्यक्ति सिर्फ धन बटोरता है। वह जनता की रक्षा नहीं कर सकता। उसके धन को कोई भी किसी समय लूट सकता हैं।
इसी प्रकार जो शक्ति के बल पर अत्याचार करता है और दूसरों का धन लूटता है। वह भला प्रजा के सुख के लिए क्या करेगा? हाँ, जिसने हर स्थिति में दीन दुखियों की सेवा अपने कष्टों से भी प्रिय हो, वह महान है। क्योंकि, संसार में सेवा ही महान धर्म है। राजा ने अपने छोटे बेटे को अपना राज्य सौंप दिया। पड़ोसी राजा ने भी उससे अपनी बेटी का विवाह संपन्न करवा दिया।
नैतिक शिक्षा:
लोगों का दुख दर्द समझने वाला ही न्यायप्रिय हो सकता हैं।
7. सीखने की तीव्र इच्छा:

मिस्टर मल्होत्रा एक होटल के मालिक थे। उनको खीर बहुत पसंद थी। उनके होटल में जो भी रसोइये (कुक) आता। सभी खूब प्रशिक्षित होते परंतु उनके द्वारा बनाई गई खीर मिस्टर मल्होत्रा को कभी पसंद नहीं आई। इसलिए कुछ ही दिनों में उनका हिसाब कर दिया जाता था।
एक दिन मिस्टर मल्होत्रा अचानक दौरे पर आए। अपने होटल में ही खाना खाने की इच्छा व्यक्त की। उसने मैनेजर को भोजन की व्यवस्था करने को कहा। मैनेजर ने कहा- सर! भोजन तैयार है पर आपकी मनपसंद खीर में कुछ समय लग जाएगा।
मिस्टर मल्होत्रा जी के पास पर्याप्त समय था। उन्होंने प्रतीक्षा कर ली, कुछ देर बाद मैनेजर ने उनके टेबल पर वेटर से खाना लगवा दिया। मिस्टर मल्होत्रा ने भोजन में सबसे पहले खीर को चखा इस बार खीर स्वादिष्ट थी। मिस्टर मल्होत्रा ने पूछा- यह खीर किसने बनाई है। ऐसी स्वादिष्ट खीर पहले कभी नहीं बनी।
मुझसे पूछे बिना क्या कोई नया कुक रख लिया गया है क्या? मैनेजर ने कहा नहीं सर, आज कुक को कहीं जाना था। इसलिए, कुक ने खीर नहीं बनाई। वह अपना बाकी काम समाप्त करके चला गया। परंतु अचानक आपके कहने पर यह खीर मोहन ने बनाई है।
वह बचपन से ही यहाँ काम कर रहा है। तब मोहन को बुलाकर मल्होत्रा जी ने पूछा- “तुमने यह खीर कैसे बनाई? मोहन ने कहा- “सर! जब मैंंने यह सुना कि आपके लिए खीर बनाना है तो मैं खुशी से फूला न समाया। मेरा हृदय ही नहीं रोम-रोम पुलकित हो उठा और भगवान को मैंने धन्यवाद दिया कि आज मुझे मलिक के लिए खीर बनाने का अवसर मिल रहा है।”
फिर मैं पूरी लगन से खीर बनाने में जुट गया। खीर में जो सामान मैंने उस्ताद को डालते हुए देखा था। वही डाल दिया और जैसे-जैसे वे करते थे। मैंने धैर्यपूर्वक वही किया और खीर बन गई। मेरे पास खुद का कोई सर्टिफिकेट नहीं है। बस काम को सीखने की तीव्र इच्छा व लगन अवश्य है। बस इसी से ये थोड़ा बहुत सीख गया हूँ।
मल्होत्रा जी ने खुश होकर उसे अपने होटल में सदा के लिए मुख्य रसोइया नियुक्त कर दिया। सत्य यही है कि किसी भी कार्य के प्रति ठीक नीयत, तीव्र इच्छा व लग्न तथा विनम्रता हो तो सफलता अवश्य मिलती है।
नैतिक शिक्षा:
मेहनत और लगन कभी खराब नहीं जाती हैं।
इन्हें भी देखें: आत्मविश्वास बढ़ाने वाली 10 छोटी कहानियाँ
8. महान कौन – Mahan kaun:

दीपावली का समय था। चारों ओर दीपक ही दीपक झिलमिला रहे थे। तभी उनमें से एक दीपक ने कहा- “देखो, मैं अंधेरे को दूर करके प्रकाश फैला रहा हूँ।” इतना सुनते ही बत्ती बोली, “दीपक भैया, प्रकाश तो मैं भी फैला रही हूँ, देख लो मैं ही जल रही हूँ।” बत्ती की बात सुनकर तेल झट से बोल पड़ा- “बत्ती तुम भी मेरे बिना नहीं जल सकती। तुम मेरे माध्यम से ही जल कर प्रकाश फैला रही हो।
इसलिए, तुमसे मैं महान हूँ।” इस प्रकार तीनों आपस में बहस करने लगे। दीपक ने कहा- “मैं महान हूँ मेरे बिना तुम्हारी कोई सार्थकता नहीं, तो तेल और बत्ती भी अपने आपको महान कहने लगे। उनकी बातें सुनकर मिट्टी बोली “दीपक तुम महान हो क्योंकि तुमने तेल और बत्ती दोनों को आश्रय दे रखा है। लेकिन मेरे बिना तुम्हारा भी अस्तित्व नहीं हो सकता।
इसलिए अपनी अपनी जगह सभी का महत्व होता है और अपनी-अपनी जगह सभी महान होते हैं। यदि हम सब आपस में एक दूसरे का सहयोग न करें तो यह प्रकाश उत्पन्न नहीं हो सकता। प्रकाश के लिए हमारा आपस में सहयोग नितांत आवश्यक है। अब मिट्टी की बात सुनकर सब चुप हो गए।
नैतिक शिक्षा:
एक दूसरे के बिना हर कोई अधूरा हैं।
9. अनोखी तरकीब का कमाल:

एक सनकी राजा था। वह अक्सर अपने पड़ोसी राज्य के राजा के पास तरह-तरह की धमकियां भेजा करता था। कई बार तो वह उल्टे-सीधे प्रश्न भी पूछता था। जिनका जवाब धमकी पाने वाले राजा को भेजना पड़ता था। ऐसे ही एक बार उसने रूपा नगरी के राजा के यहाँ एक सफेद बिल्ली भेजी और कहा- “कि इसे अच्छे से अच्छा स्वास्थ्यवर्धक भोजन दिया जाए। लेकिन इस बात का ध्यान रहे की दो महीने के अंदर इसका एक रत्ती भी वजन न बढ़ें। यदि वजन बढ़ गया तो रूपा नगरी पर हमला बोलकर सब कुछ लूट लिया जाएगा।
रूपा नगरी के राजा ने इस समस्या का समाधान बताने के लिए अपने दरबार के मंत्रियों से कहा। उस राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा- “महाराज! एक अनोखी तरकीब है, जिसके माध्यम से बिल्ली का वजन एक रत्ती भी नहीं बढ़ेगा।” भला वह कौन सी तरकीब है राजा ने पूछा। मुख्यमंत्री ने बताया- बिल्ली को बांधकर कर रखा जाए उसके दोनों ओर कुत्ते भी बांध दिए जाएं।
लेकिन कुत्ते इतनी दूरी पर रहे कि वह बिल्ली को चीर फाड़ ना सके, जैसे मुख्यमंत्री ने कहा राजा ने वैसा ही किया। ठीक दो महीने के बाद उस बिल्ली को वापस सनकी राजा का राजदूत ले गया। सनकी राजा ने बिल्ली को तौलने पर देखा कि उसका वजन रत्ती भर भी नहीं बढ़ा था। बात यह थी कि बिल्ली को अच्छे-अच्छे खाने के साथ-साथ रात दिन दूध मलाई भी खाती थी।
इससे उसके अंदर खून बनता तो था, लेकिन वह सारा खून उसे घुर्राते कुत्तों के कारण सूख जाता था और बिल्ली वैसी ही रह गई। रूपा नगरी के मुख्यमंत्री की इस विचित्र बुद्धिमत्ता के लिए सनकी राजा ने एक लाख सोने के सिक्के ईनाम में भिजवाए।
नैतिक शिक्षा:
सोच समझकर धैर्य के साथ लिया गया फैसला कामयाबी की तरफ ले जाता हैं।
10. गुरुजी को गुरु दक्षिणा:

इस बार एक शिष्य ने गुरुजी से पूछा- “गुरुजी”! कुछ लोग कहते हैं जीवन संघर्ष हैं। कुछ जीवन खेल है और कुछ उत्सव, इनमें कौन सही है। गुरुदेव? पुत्र जिन्हें गुरु नहीं मिला, उनके लिए जीवन संघर्ष हैं। जिन्हें मिल गया उनके लिए खेल और जो लोग गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चल पाते हैं। वही केवल जीवन को उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं।
गुरु जी के उत्तर के बाद भी शिष्य संतुष्ट नहीं लग रहा था। तभी गुरुजी ने शिष्य को एक कहानी सुनाई। एक बार की बात है गुरुकुल में तीन शिष्यों ने पढ़ाई पूरी कर गुरुजी को गुरु-दक्षिणा देना चाहते थे। गुरुजी ने कहा, “शिष्यों मुझे सूखी पत्तियों से भरा एक थैला चाहिए।” वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए। क्योंकि उन्हें लगा कि वह आसानी से अपने गुरुजी की इच्छा पूरी कर सकेंगे।
वे बड़े ही उत्साहपूर्ण स्वर में बोले… जी गुरु जी! और वे जंगल की ओर निकल पड़े। लेकिन वहाँ यह देखकर हैरान रह गए कि जंगल में सूखी पत्तियां तो केवल मुट्ठी भर ही थी। तभी उन्हें वहाँ एक व्यक्ति दिखा। शिष्य ने उस व्यक्ति से पूछा, कि जंगल में सूखी पत्तियां कौन ले गया?
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि सूखी पत्तियां ईधन के रूप में पहले ही उपयोग हो चुकी है। अब वे तीनों पास के गाँव में इस आशा से चल पड़े कि उन्हें वहाँ एक थैला सूखी पत्ती जरूर मिल जाएगा। गांव पहुंचते ही उन्होंने एक व्यापारी से एक थैला सूखी पत्तियों को देने को कहा। परंतु वहाँ भी निराशा हासिल हुई। क्योंकि व्यापारी कुछ देर पहले ही सूखी पत्तियों को औषधि बनाकर बेच चुका था।
और कहानियां देखें: 10 दिल छू लेने वाली Short Moral Stories in Hindi
जो हो सकता था वह तीनों कर चुके थे। परंतु उन्हें कहीं से एक थैला सूखी पत्ती नहीं मिली। आखिरकार वह थक हारकर वापस गुरुजी के पास लौट गए। “अरे आ गए पुत्रों, आओ ले आए थैला। तीनों के सिर झुके रह गए। पूछने पर एक शिष्य ने बताया कि… हम लोगों को लगा की सुखी पत्तियां तो ऐसे ही व्यर्थ पड़ी रहती है। वह हमें शीघ्र मिल जाएंगी। परंतु हमें कहीं नहीं मिली।
गुरु जी मुस्कुराए और बोले, बच्चों जैसे पेड़ की सूखी पत्तियां व्यर्थ नहीं होती। ऐसे ही ज्ञान रूपी वृक्ष की सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करती, बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं। जाओ ज्ञान का प्रकाश फैलाओ। मेरे लिए यही गुरु दक्षिणा है।
तीनों शिष्य प्रसन्न हो गए। गुरु को प्रणाम करके खुशी-खुशी घर चले गए। इस दुनिया में कुछ भी व्यर्थ नहीं है। हर चीज महत्वपूर्ण है।
नैतिक शिक्षा:
हर चीज का अपना महत्त्व हैं।
🙋♂️ FAQs – Stories with Moral in Hindi
Hello, I’m Reeta, a passionate storyteller and a proud mom of two. For the past 8+ years. I have been writing Hindi stories that teach moral values and bring happiness to children. On Kahanizone, I share Hindi kahaniyan, Panchatantra stories, bedtime tales and motivational kahaniyan that parents trust and kids enjoy. As a mother, I know what children love to hear, and through my stories I try to give them imagination, values, and joy. My aim is to entertain, inspire, and connect with readers of all ages.
