रामनगर गाँव में मोहन और सोहन दो व्यक्ति रहते थे, दोनों पड़ोसी थे। वे दोनों माली का काम किया करते थे। उनके खेतों में फूल हमेशा लहलहाते रहते थे। मोहन अपने फूलों को जरूरत से ज्यादा ध्यान देता था। वह अपने खेत में सोहन से ज्यादा पैदावारी करने के चक्कर में रासायनिक खादों का अंधधुंध प्रयोग करता था।
इसके अलावा वह पौधों पर तरह-तरह के दवाएं भी डालता रहता था। वह पौधों को अपने अनुसार बढ़ने नहीं देता था। उसे वह काटता-छाँटता रहता था। वह अपने खेतों को कभी सूखने नहीं देता था। वह खेतों में निराई-गुड़ाई के अलावा और कई आधुनिक तकनीकों से पौधों का देखभाल करता था। मोहन पौधों को धूप से भी बचाने के लिए उसके ऊपर सेड भी बना रखा था।

जबकि सोहन फूलों को प्राकृतिक तरीके से उगाने की कोशिश करता था। वह अपने खेत में जैविक खाद का प्रयोग करता था। कीड़े-मकोड़े से बचाने के लिए पौधों पर राख डालता था। जिससे कीड़े उसके पौधों को न खाएं। इसके अलावा सोहन पौधों में उसके जरूरत के अनुसार पानी दिया करता था। दोनों के खेतों में सुंदर-सुंदर फूल लग चुके थे।
एक रात तेज आंधी तूफान और बारिश आई। मोहन के अधिकतर पौधे टूटकर नीचे गिर गए। वे तूफान को नहीं सह सके। जबकि सोहन के पौधे उन आंधी-तूफान को आसानी से सहन कर लिए। उसके फूलों को कोई नुकसान नहीं हुआ। क्योंकि वे प्राकृतिक तरीके से उग रहे थे। इसलिए वे तूफ़ान का सामना आसानी से कर लिए।

दोनों अपने-अपने फूलों को तोड़कर बाजार में बेचने के लिए गए। मोहन और सोहन दोनों पास में बैठकर फूल बेच रहे थे। सोहन के फूल में से अत्यधिक खुशबू आ रही थी। जिसके कारण लोग उसके फूलों को खरीदना ज्यादा पसंद कर रहे थे। जबकि मोहन के फूल बड़े जरूर थे। लेकिन उसके फूलों में खुशबू नहीं थी। इसलिए लोग उसके फूलों को नहीं खरीद रहे थे।
कुछ ही घंटों में सोहन अपने सारे फूलों को बेचकर घर वापस चला आया। जबकि मोहन शाम तक भी अपने फूलों को नहीं बेच सका। वह शाम को फूलों के साथ वापस घर आया तो देखा सोहन अपने बेटे को कुछ समझा रहा था। मोहन भी अपने बेटे पर अधिक ध्यान देता था। मोहन और सोहन दोनों के बेटों की उम्र समान थी। वे दोनों अपनी शरीर बनाने में लगे थे।
मोहन का बेटा प्रतिदिन जिम जाता और अपने शरीर को स्ट्रॉंग बनाने के लिए तरह-तरह की दवाइयाँ और पाउडर खाता था। जबकि सोहन का लड़का सुबह-सुबह खुले मैदान में दौड़ लगाता। उसी मैदान में कसरत भी कर लेता था। वह खाने में भीगे हुए चने, दूध और अंडों का ज्यादा इस्तेमाल करता था। जिससे उसका शरीर अंदर से मजबूत बनती जा रही थी।
एक दिन मोहन और सोहन के बेटे कुश्ती लड़ रहे थे। सोहन का लड़का मोहन के लड़के को आसानी से हरा दिया। सोहन ने मोहन से कहा, “भाई मोहन तुमने यहाँ भी फूलों की खेती की तरह गलती कर दी। तुमने अपने बेटे को दवाएं और पाउडर खिलाकर उसके शरीर को फूला दिया। लेकिन उसके अंदर की मजबूती पर ध्यान नहीं दिया। जिसके कारण आज वह कुश्ती में हार गया।
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सोहन फिर से कहता हैं, “प्रकृति ने जीवन दिया हैं। इसे प्राकृतिक तरीके से बनाने को कोशिश करना चाहिए। हमें इसमें आधुनिक तरीके से बदलाव करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अपने बेटे को सुबह-सुबह खुले आसमान में दौड़ लगवाना चाहिए। जिससे उसे ताजी और शुद्ध हवा मिल सके और वह अपने आप को प्रकृति के अनुसार बना सके।
ठीक इसी प्रकार अगर आप अपने फूलों को भी बराबर धूप और हवा लगने दिया होता तो वे पौधे आंधी-तूफान का सामना आसानी से कर सकते थे। जिससे आपके पौधों को नुकसान नहीं होता। जिससे उसके अंदर तूफान से लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती। इसके साथ-साथ आपने अपने पौधों में अत्यधिक रासायनिक खादों का उपयोग किया। जिससे उसके अंदर प्राकृतिक खुशबू नहीं आ सकी। जिसके कारण तुम्हारा फूल बाजार में नहीं बिक रहा था।
मोहन ने सोहन से कहा, भाई सोहन तुमने मेरी आँखें खोल दी। मैं जल्दी और ज्यादा के चक्कर में यह सब करता था। लेकिन अब मुझे विश्वास हो गया हैं कि किसी भी चीज को अपने अनुसार बढ़ने से उसके अंदर परिपक्वता आ जाती हैं। उस दिन से मोहन अपनी सोच और नजरिया बदल दिया। वह अब सोहन के बताएनुसार काम करता था।
नैतिक सीख:
ज्यादा और जल्दी के चक्कर में हम जो रास्ता अपनाते हैं उससे हमें नुकसान ही होता हैं। हर चीज समय के अनुसार मिलती हैं।
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