बच्चों को कहानियां सुनना और पढ़ना बहुत पसंद होता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे न केवल मनोरंजन करते हैं बल्कि उन्हें जीवन की अच्छी सीख भी मिलती है। इस लेख में हम बच्चों के लिए 5 मजेदार और नैतिक कहानियां पढ़ेंगे जो नैतिक शिक्षा और मनोरंजन से भरपूर हैं।
1. बुढ़िया की चतुराई:

किसी राज्य में एक मूर्ख राजा रहता था। उसका न्याय बहुत अटपटा होता था। इसलिए, लोग उसे मूर्ख कहते थे। जब भी लोग उसके पास अपनी फ़रियाद लेकर जाते थे तो वह हमेशा बेतुका फैसला सुनाता था। उसके गलत फैसले के कारण पूरे राज्य के लोग उससे परेशान हो गए थे। उसी राज्य में एक गरीब बुढ़िया अपनी झोपड़ी में रहती थी।
उसकी झोपड़ी से सटा हुआ एक तीनमंजिला आलीशान मकान बना हुआ था। बुढ़िया लकड़ी और कोयले को जलाकर खाना बनाती थी। वह सुबह-शाम जब भी खाना बनाती, उसके चूल्हे से उठने वाला धुआँ सेठ के तीन मंजिले मकान की खिड़कियों से होकर कमरों में भर जाता था।
सेठ धुएँ से परेशान होकर, एक दिन बुढ़ियाँ के पास जाकर बोला- “तुम्हारे चूल्हे का धुआँ हमारे घर के कमरों में भर जाता हैं। इसका कुछ जतन करो। बुढ़िया ने जवाब देते हुए कहा, “आप ही बताएं मैं क्या करूँ?” उसने सेठ से फिर कहा- “आप सुबह शाम अपने कमरों की खिड़कियों को बंद रखा करो” सेठ ने गुस्से से भरी आवाज में कहा- “तुम्हारी वजह से मैं अपने घर की खिड़कियों को क्यों बंद करूँ?”
बुढ़िया सेठ को कोई जवाब नहीं दी। अब सेठ बुढ़िया को परेशान करने लगा। जिससे वह इस झोपड़ी को बेचकर चली जाए। लेकिन बुढ़िया उसे हमेशा अनसुना करके छोड़ देती थी। एक दिन सेठ ने बुढ़िया से कहा- “तुम इस झोपड़ी को बेचने के लिए कितने पैसे लोगी” बुढ़िया सेठ से कहती हैं जब तक मैं जीवित हूँ इस झोपड़ी को मैं कभी नहीं बेचूँगी।
एक दिन सेठ ने अपने राज्य के राजा के पास पहुंचकर बुढ़िया की शिकायत लगा दी। जिसके लिए राजा ने अपने सिपाहियों को भेजकर बुढ़िया को बुलवाया। राजा बुढ़िया के ऊपर गुस्सा होते हुए कहा- “तुम अपने चूल्हे के धुएं का बंदोबस्त करो जिससे तुम्हारे चूल्हे का धुआँ सेठजी के कमरे में न जा सके। अगर तुम ऐसा नहीं करती हो तो तुम्हारी झोपड़ी वहाँ से हटवा देंगे।
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बुढ़िया को पता था कि राजा महामूर्ख इंसान हैं। वह कभी भी कुछ भी फैसला दे सकता हैं। इसलिए, वह राजा के फैसले से घबराई नहीं।बुढ़िया कुछ सोच-समझकर बोली, महाराज! मेरी भी एक फ़रियाद हैं। जब से सेठजी ने मेरी झोपड़ी के बगल में अपना तीन मंजिला मकान बनाया हैं, तब से मेरे आँगन में सूरज की रोशनी नहीं आती हैं। जिसके कारण मैं आए दिन बीमार रहती हूँ।
इसलिए महाराज! मेरी आप से विनती हैं अगर सेठजी अपने मकान के दो मंजिलों को तुड़वा दें तो सूरज की रोशनी हमारे घर के आँगन तक आ जाएगी और सेठ जी के मकान में मेरे घर से धुआँ भी नहीं जाएगा। बुढ़िया की सलाह सुनकर राजा सेठजी के ऊपर भड़क गया। उसने कहा कि तुम्हारी वजह से बुढ़िया को धूप नहीं मिल पा रहा हैं। और तुम अपने कमरे में धुएँ की शिकायत लेकर आए हो।
तुम अपने घर के दो मंजिल को तुड़वा दो। राजा के फैसले को सुनकर सेठ अचरज में पड़ गया। बुढ़िया अपनी अक्लमंदी के लिए अपने आप पर खुश हुई। बुढ़िया और सेठ दोनों अपने-अपने घर को गए। अगली सुबह सेठ बुढ़िया को गैस चूल्हा और सिलेंडर देते हुए आपस में समझौता कर लिए। उस दिन से सेठ, बुढ़िया को परेशान करना छोड़ दिया।
नैतिक सीख:
अक्लमंदी के साथ बड़ी सी बड़ी समस्या का हल आसानी से निकाला जा सकता हैं।
2. कौवा और कोयल:

किसी नदी के किनारे वन में एक विशाल पीपल का पेड़ था। उस पेड़ पर तरह-तरह के पक्षी रहते थे। वे सभी पक्षी सुबह सूर्योदय होने के साथ ही भोजन की तलाश में दूर निकल जाते थे। शाम होने से पहले उस विशाल वृक्ष पर आ जाते थे। सभी पक्षी आपस में बहुत मिलजुलकर रहते थे। वे हर एक के सुख-दुख में साथ देते थे।
उन्ही पक्षियों में एक कोयल और कौवे का भी परिवार रहता था। दोनों का रंग काला होने के कारण अन्य पक्षियों को उन दोनों में अंतर कर पाना बहुत मुश्किल होता था। पक्षी सिर्फ उनकी आवाज से ही दोनों को पहचान पाते थे। लेकिन, कोयल की मधुर आवाज के कारण उसके साथ अधिक पक्षी रहना पसंद करते थे।
जबकी, कौवे की कर्कश आवाज के कारण उसके साथ कोई पक्षी रहना पसंद नहीं करता था। जिसके कारण कौवे को कोयल से जलन होने लगी। एक दिन कौवा पेड़ पर बैठा हुआ कांव-कांव कर रहा था। वह सोचता हैं कि मेरा रंग और कोयल का रंग एक जैसा हैं। फिर भी अन्य पक्षी कोयल से ज्यादा लगाव रखते हैं। जबकी, मेरे साथ कोई रहना नहीं चाहता हैं।
उसके दिमाग में ईर्ष्या से भरा हुआ एक विचार आया। वह सोचता हैं, क्यों न हम कोयल के पूरे वंश को खत्म कर दें। इस तरह से वह इसी इंतजार में रहता था। कोयल अपने घोंसले में अंडे दी थी। एक दिन वह भोजन की तलाश में बहार गई हुई थी। उस वृक्ष पर और कोई पक्षी भी नहीं था। कौवे ने मौका पाकर कोयल के अंडे को नीचे गिराकर नष्ट कर दिया।
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शाम को जब कोयल अपने घोंसले में आई तो नीचे टूटे पड़े अंडे देखकर बहुत दुखी हुई। वहीं अपने घोंसले में बैठा कौआ कांव-कांव किए जा रहा था। एक बार कोयल ने फिर से अंडे दिए। इस बार वह वृक्ष के पत्तों में छिपकर अपने अंडे की निगरानी करती थी। एक दिन जब कौवा कोयल के अंडे को तोड़ने के लिए उसके घोंसले पर आकर बैठा तो तुरंत उसके पास कोयल आ गई, दोनों में भयंकर लड़ाई हुई।
लेकिन कौवे ने कुछ और कौवों को बुलाया हुआ था। जिसके कारण कोयल अपने अंडों को उन कौवों से नहीं बचा पाई। एक दिन कोयल बहुत निराश होकर उसी वृक्ष पर बैठी थी। उसने देखा कि कौवे ने घोंसले में अंडे दिए हुए हैं। उसके दिमाग में एक ख्याल आया क्यों न हम अपने अंडे कौवे के घोंसले में डाल दें। जिससे कौवे को पता भी नहीं चलेगा और अंडे से चूजे भी आ जाएंगे। कोयल ठीक ऐसा ही करती हैं।
वह दूर से अपने बच्चे के ऊपर निगरानी भी रखती थी। जब बच्चे बड़े हुए तो कुछ बच्चे कोयल की आवाज निकलते हुए अन्य कोयल के साथ रहना शुरू कर देते हैं। इस तरह से आज भी कोयल अपने अंडे कौवे के घोंसले में देती हैं। और उनका पालन-पोषण कौवे से ही करवाती हैं।
नैतिक सीख:
किसी के प्रति ईर्ष्या रखना हमारे लिए घातक हो सकता हैं।
3. स्वामी विवेकानंद और बंदर:

महान व्यक्तित्व के धनी स्वामी विवेकानंद अपने आप में एक महापुरुष थे। उनका जीवन लोगों को सही मार्ग बतलाने के लिए समर्पित था। एक बार स्वामी विवेकानंद अपनी तीर्थ यात्रा पर निकले थे। कई मंदिरों के दर्शन करने के बाद वे बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचे। वहाँ दर्शन और पूजा-पाठ करके निकले ही थे तो उनके पीछे कुछ बंदर पड़ गए।
क्योंकि, स्वामी विवेकानंद के वस्त्र बड़े तथा उनके गुठनों तक थे। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था। इसलिए, वे अपने साथ हमेशा एक थैले किताबें भी लिए होते थे। इस तरह से बंदरों को लगता हैं की स्वामी विवेकानंद के थैले में कुछ खाने की चीज हैं। जिसके लिए वे उनके पीछे पड़ गए। वें धीरे-धीरे आगे चल रहे थे कि बंदरों ने उनका पीछा किए जा रहे थे।
कुछ दूर तक बदरों ने उनका पीछा करना नहीं छोड़ तो वें अधिक डर गए। स्वामी विवेकानंद अब तेज से भागने लगे बंदरों ने भी उनके पीछे और तेज-तेज भागना शुरू कर दिया। स्वामी जी पीछे मुड़कर देखा तो उनके पीछे कई सारे बंदर पड़े थे। लेकिन, उन्हें कोई बचाने वाला नहीं था। सभी लोग खड़े होकर सिर्फ तमाशा देख रहे थे। कोई उनकी सहायता के लिए नहीं आ रहा था।
अचानक किसी व्यक्ति की स्वामी जी को आवाज सुनाई देती हैं। ‘रुको’ डटकर सामना करो भागो मत, जैसे ही स्वामी के कान में यह आवाज पड़ी। वह तुरंत रुक गए, वें देखते हैं की बंदर भी रुक गए तथा कुछ तो पीछे लौटना शुरू कर देते हैं। स्वामी जी को याद आया कि “जब हम मुसीबत से डरकर भागते हैं तो, मुसीबत और पीछा करती हैं।”
उस घटना से स्वामी जी का विश्वास और दृढ़ हो गया। उन्होंने जहाँ-जहाँ पर बुराइयाँ देखी उसका डटकर सामना किया न की उसको छोड़कर पीछे भागे।
नैतिक सीख:
मुसीबतों से डरने के बजाय अपनी पूरी क्षमता के साथ उसका सामना करना चाहिए।
4. जैसी संगत वैसी रंगत:

एक जंगल में एक शेरनी रहती थी। उसका प्रसावकाल निकट था। एक दिन वह जंगल में शिकार करने के लिए घूम रही थी। तभी उसे एक भेड़ों का झुंड दिखाई दिया। उसने तेजी से दौड़कर उन भेड़ों पर छलांग लगा दी। परंतु वह ऊपर से नीचे गिरने के कारण बुरी तरह जख्मी हो गई। वह मरते-मरते एक शावक को जन्म देकर दम तोड़ दी।
उस शावक को भेड़ों ने अपने साथ रख लिया उसे अपने दूध को पिलाकर बड़ा किया। वह भेड़ों के साथ रहने की वजह से अब वह और सभी भेड़ों की तरह ही बोलना-चालना तथा बात व्यवहार रहता था। धीरे-धीरे समय बीता वह शावक शक्तिशाली और बलवान हो गया। लेकिन, अब भी वह भेड़ों की झुंड में ही रहता था।
एक दिन एक शेर शिकार के चक्कर में उसकी तरफ आ पहुंचा। वह देखता हैं कि एक शेर भेड़ों के बीच में हैं। शेर को देखकर सभी भेड़ों के साथ वह भी भागने लगा। जंगली शेर दौड़कर उसके पास पहुंचा और भेड़सिंह को समझाया कि तुम भेड़ नहीं हो तुम सिंह हो। लेकिन, उसने कहा मेरा जन्म इन लोगों के बीच हुआ हैं। मैं जन्म से इन्ही लोगों के बीच पला बड़ा हूँ। मैं कैसे मान लू की मैं सिंह हूँ।
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तब जंगली सिंह ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा, “वह भेड़सिंह को अपने साथ एक नदी के किनारे ले गया।” उसे नदी के पानी में उसका और अपना प्रतिबिंब दिखते हुए कहा। “देखो, हमारे और तुम्हारे में क्या अंतर हैं? तुम मेरी तरह ही हो” इस तरह से जंगली सिंह ने जोर से गरजा उसकी आवज सुनकर भेड़सिंह ने भी जोश में कर तेज से गरजा। अब भेड़सिंह को यह विश्वास हो गया की वह भेड़ नहीं बल्कि शेर हैं। उसे अपने वास्तविकता की पहचान हो गई।
नैतिक सीख:
संगत का असर बहुत प्रभवशाली होता हैं। इसलिए, हमें अच्छी संगत में रहना चाहिए।
5. नकल करने के लिए अकल चाहिए:

दूर पहाड़ी की चोटी पर एक बाज रहता था। वही चोटी के नीचे एक बरगद के पेड़ पर एक कौवा अपने घोंसले में रहता था। बाज अक्सर देखा करता था कि वह कौवा बहुत आलसी था। जोकि, बिना अधिक भूख लगने पर वह भोजन के तलास में नहीं जाता था। कौवा हमेशा यही सोचता था कि उसका भोजन अपने आप उसके पास आ जाएगा। जिसके लिए उसे कही जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
एक दिन बाज पहाड़ी की चोटी पर बैठे-बैठे देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे खरगोश के छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे हैं। उन्हें देखे बाज के मुँह में पानी आ गया। वह मौका पाकर अपने मजबूत पंजों से एक खरगोश के बच्चे को दबोच कर उड़ गया। जिसे वह अपना भोजन बना लिया। चूंकि, खरगोश के बच्चे बरगद के पेड़ के नीचे खेलते थे।
इसलिए, पेड़ पर बैठा हुआ कौवा सोचा, क्यों न मैं भी बाज की तरह इन खरगोश के बच्चों का शिकार बना लूँ। एक दिन मौका पाकर कौवा उन खरगोश के बच्चों पर टूट पड़ा। लेकिन, उसे इस तरह से शिकार करने का अभ्यास नहीं था। जिसके कारण कौवा एक बड़े से पत्थर से टकरा गया। जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
नैतिक सीख:
किसी की नकल करने के लिए हमें अपने आप की क्षमता को सबसे पहले पहचानना चाहिए।
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