यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहने वाले विशाल की हैं। जिसका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। उसके पिता रामलाल मोची का काम किया करते थे। बहुत मुश्किलों के बाद उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब होता था। कभी-कभी तो उसका परिवार भूखे पेट ही सो जाता था। एक दिन रामलाल सुबह-सुबह अपनी दुकान खोलकर बैठा था। वह अपने घर के हालात से बहुत मायूस था।
अचानक गाड़ियों का काफिला उसके सामने आकर रुका। काफिले के बीच में चमचमाती कार से एक अधिकारी निकला। उसके साथ कई पुलिस वाले भी थे। वे सभी रामलाल की दुकान की ओर आ रहा थे। उसे लगा शायद मैंने कोई गलती कर दी। अधिकारी रामलाल के पास आकर बहुत नम्र आवाज में कहा, “क्या आप मेरे जूते पॉलिश कर देंगे।” रामलाल ने कहा- “जी साहब! क्यों नहीं।”
रामलाल जूते पॉलिश करने लगा। वह अंदर से बहुत डरा हुआ था। उसने उस अधिकारी के जूते को बहुत अच्छे से पॉलिश किया। अधिकारी खुश होकर उसे सौ रुपये दिया। रामलाल ने कहा- “साहब जूते पॉलिश करने के सिर्फ दस रुपये हुए। हमारे पास छुट्टे नहीं हैं। कृपया दस रुपये दीजिए।” अधिकारी ने कहा, “पूरे पैसे रख लो, मुझे वापस नहीं चाहिए।” इतना कहकर अधिकारी अपने काफिले के साथ निकल गया।
रामलाल अपने आसपास के लोगों से पूछा- “ये अधिकारी कौन हैं।” सभी ने उसे बताया कि वह अपने जिले का मजिस्ट्रेट हैं। उस रात रामलाल को नीद नहीं आई। उसने सोचा ऐसी जिंदगी हमारी क्यों नहीं हो सकती। उसके दिमाग में वह अधिकारी और उसका काफिला घूमता रहा। एक शाम खाना खाते समय उसने उस अधिकारी की पूरी कहानी अपने बेटे विशाल और पत्नी को सुनाया। रामलाल अधिकारी की बात सुनाते समय बहुत भावुक हो गया था।
विशाल ने अपने पिता से कहा, “पिताजी आपके सपने को मैं हकीकत में बदल कर रहूँगा।” उस दिन से विशाल अपने जीवन में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बनने का एक मात्र लक्ष्य निर्धारित कर लिया। उसने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दिन रात एक करके मेहनत करना शुरू कर दिया। कभी-कभी वह अपने शहर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के ऑफिस के सामने जाकर खड़ा हो जाता था।
वह मजिस्ट्रेट के काफिले को देखने का इंतजार करता था। जिससे उसे बहुत ज्यादा प्रेरणा मिलती थी। उसने अपने आपको मजिस्ट्रेट के रूप में देखना शुरू कर दिया। वह अपना हाव-भाव सब बदल चुका था। जिसके कारण उसे लगने लगा था कि वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर चुका हो। उसके सामने पैसों को लेकर कई तरह की परेशानियाँ आई। लेकिन उसके माता-पिता ने उन समस्यों का डटकर सामना किया।
विशाल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पद के लिए आवेदन कर चुका था। उसकी तैयारी भी बहुत शानदार थी। उसने परीक्षा हाल में घुसते ही निर्धारित कर लिया था कि यह मेरी पहली और आखिरी परीक्षा होगी। उसकी परीक्षा बहुत शानदार हुई थी। उसने उसी दिन ही अपने माता-पिता को कह दिया था कि आपके बेटे को डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बनने से कोई नहीं रोक सकता।
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महीनों बाद रिजल्ट घोषित हुआ। विशाल का नाम उस परीक्षा में टॉप 10 में था। उसके गाँव वालों ने विशाल को अपने कंधे पर बैठाकर पूरे गाँव में घुमाया और खुशियां मनाई। विशाल के पिता उसकी सफलता से गदगद थे। उस दिन उन्हें विश्वास हो गया कि सफलता पाने के लिए सपने देखना बहुत जरूरी होता हैं। इस तरह से एक दिन विशाल अपने माता पिता का नाम रोशन करते हुए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बन गया।
अब विशाल गरीब दबे हुए बच्चों को प्रेरित करता और उन्हें भी अपना लक्ष्य निर्धारित करने तथा उसके लिए सपने देखने को कहता था। वह हमेशा एक ही बात सभी बच्चों को समझाता था कि सपने सच होते हैं, बशर्ते उसे पाने के लिए तुम्हारे अंदर किस प्रकार की जिद्द हैं। विशाल की सफलता से बच्चे बहुत प्रेरित होते थे।
कहानी से सीख:
जीवन का मूल मंत्र, लक्ष्य निर्धारित करके उसे प्राप्त करने की जिद्द सफलता की ओर ले जाती हैं।
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