बड़े लोगों के संस्कार ही बच्चों के अंदर देखने को मिलते हैं। क्योंकि बच्चा अपने परिवार, माता-पिता और आसपास के लोगों को देखकर ही बहुत कुछ सीखता हैं। इसलिए हमारे संस्कार सर्वोत्तम होने चाहिए। जिससे हम अपने और दूसरों के बच्चों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन सके। इसलिए आज हम कुछ अलग stories for adults in hindi में लेकर आए हैं। जोकि हर माता-पिता और बड़ों को सीख दे सकती हैं। जोकि, निम्न प्रकार से लिखित हैं:
1. कर्म का फल:

एक बार वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन कर रहे थे। देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थी। तभी वहाँ नारद मुनि आए, उन्होंने भगवान विष्णु को दोनों हाथ जोड़कर प्राणम किया। नारद मुनि ने कहा, “प्रभु मैं तीनों लोक घूमकर आ रहा हूँ। उन्होंने भगवान विष्णु को बारी-बारी से तीनों लोक की कहानी सुनाई।
नारद मुनि ने कहा- “भगवन् जब मैं मृत्यु लोक में भ्रमण कर रहा था तो मैं देखा। एक सेठ जोकि बहुत कंजूस था। उसकी एक मिठाई की दुकान थी। उसके साथ उसका बेटा भी दुकान पर बैठता था। सेठ की कंजूसी देखकर उसका बेटा उससे भी ज्यादा कंजूस हो बन गया। कुछ समय बाद उस सेठ की मृत्यु हो गई। अब दुकान उसका बेटा चलाने लगा था।
एक दिन उसकी दुकान पर एक कुत्ता आया। वह दुकान के सामने पड़े जूठे पत्तलों को चटने लगा। कुत्ते को देख सेठ का बेटा उसे जोर से डंडा मारकर वहाँ से भगा दिया। नारद मुनि ने कहा- “प्रभु ऐसा क्यों, उस व्यक्ति ने कुत्ते को जूठा पत्तल क्यों नहीं चाटने दिया।” नारद मुनि की बातों को सुनते ही भगवान विष्णु हँसने लगे। उन्होंने कहा, “मुनिवर नारद, कुत्ते के रूप में वह, वही सेठ था जिसका बेटा दुकान में बैठा था।
उस सेठ ने एक-एक पैसे जोड़कर बहुत सारे धन इकट्ठा कर लिए। उसने अपने सांसारिक सुख की सारी व्यवस्था तो कर ली। लेकिन उसने अपने आत्मिक सुख की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। जिससे उसे मानव शरीर छोड़ने के बाद कुत्ते के योनि में जन्म लेना पड़ा। आज वही जीव जब कुत्ते का रूपधारण करके अपनी दुकान पर पत्तल चाटने गया तो उसका बेटा उसे इसलिए मारते हुए भगा दिया कि कही वह उसकी मिठाई को न खा जाए।
सेठ का बेटा भी अपने पिता की तरह पैसों के मोह-माय में लिप्त था। जिसके कारण उसे जूठा भोजन भी नहीं खाने दिया। यह सब कर्म का फल हैं। जो जैसा करेगा वैसा इस जन्म में नहीं तो उसे किसी और जन्म में भुगतना पड़ेगा।
नैतिक सीख:
हमें हमेशा अच्छे कर्म करना चाहिए। क्योंकि बुरे कर्म का बुरा नतीजा होता हैं।
2. अभिमान का नतीजा:

एक समय की बात हैं। गाँव से दूर एक ऋषि का आश्रम था। उस आश्रम में कई कोसों दूर-दूर से बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आते थे। आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के लिए वही पर बच्चों को रुकना पड़ता था। ऋषि अपने शिष्यों को हर प्रकार की शिक्षा प्रदान करते थे। उस आश्रम में शिष्य सूर्योदय होने से पहले से उठते और नित्य क्रिया कर। नदी में नहाने चले जाते थे। वापस आते समय अपने साथ आश्रम के लिए पीने का पानी भी लाते थे।
इसके अलावा उन्हें अपने कपड़े स्वयं धुलना, रहने के स्थान को खुद साफ करना पड़ता था। सारे काम करने के बाद ऋषि के समक्ष सही समय पर पहुंचना पड़ता था। वहाँ की शिक्षा बहुत ही कठोर थी। बहुत कम बच्चे ही वहाँ पर अपनी शिक्षा पूरी कर पाते थे। उसी आश्रम में हरी और श्याम नाम के दो शिष्य भी पढ़ते थे। वे दोनों पढ़ने में बहुत तेज थे। दोनों का आपस में तालमेल अच्छा नहीं था।
वे दोनों हमेशा एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। उन दोनों को अपनी विद्या पर बहुत घमंड था। दोनों की पढ़ाई लगभग पूरी हो चुकी थी। गुरु जी अपने शिष्यों की आखिरी परीक्षा लेना चाहते थे। हर शिष्य को अलग-अलग तरह की परीक्षा ले रहे थे। गुरु जी को दोनों शिष्यों के बारें में अच्छे से पता था। एक दिन गुरु जी ने कहा, ” हरी और श्याम यह तुम्हारी आखिरी परीक्षा हैं। इसमें सफलता प्राप्त करने के बाद तुम्हारी पढ़ाई पूरी मानी जाएगी।
गुरु जी के कहेनुसार, “दोनों को एक राजा के पास जाना था।” उन्हें सत्य का उपदेश देना था। राजा बहुत विद्वान था। वह किसी भी व्यक्ति को देखकर उसके व्यक्तित्व को पहचान जाता था। दोनों शिष्य राजा के पास पहुंचकर अपना परिचय दिया। राजा ने उन दोनों को आदरपूर्वक बैठाया और उनका सेवा सत्कार किया। राजा ने दोनों से बात किया। दोनों अपने आप को बहुत ज्यादा विद्वान समझ रहे थे।
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राजा को उन दोनों के बीच थोड़ा मतभेद लगा। राजा ने दोनों से अकेल में भी बात किया। दोनों एक दूसरे की खूब बुराइयाँ की। राजा दोनों की भावनाओ को अच्छे से समझ गया। फिर भी राजा ने उनके सामने अपनी इच्छा को जाहिर नहीं किया। रात हो चुकी थी। राजा ने दोनों को भोजन ग्रहण करने के लिए कहा। राजा ने दोनों को आदर से भोजन कक्ष में बैठाया। वह दो थाल लेकर आया उसे दोनों के सामने रख दिया।
राजा ने कहा, ज्ञानी महात्मा कृपया भोजन ग्रहण करे। हरी ने अपने थाली में देखा कि उसके थाली में भूसा था, जबकि श्याम ने अपनी थाली में देखा कि उसकी थाली में चारा परोसा था। यह सब देख दोनों राजा के ऊपर क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा, “एक राजा होकर इस तरह से हमारा अनादर करना, आपको सोभा नहीं देता।”
राजा ने कहा- “महात्मन् मैंने आपके कहे अनुसार आपका सम्मान किया हैं। क्योंकि आप दोनों की जब हमारी अकेले में बात हुई तो आप दोनों एक दूसरे को गधा और बैल बताया था। इसलिए मैंने आपके अनुसार भोजन परोसा हैं। राजा की बातों को सुन हरी और श्याम को अपनी गलती का ऐहसास हुआ। वे दोनों राजा के सामने दोनों हाथ जोड़कर नतमस्तक हो गए। वे अपनी गलतियों के लिए राजा से क्षमा मांगी।
नैतिक सीख:
अभिमान व्यक्ति को हमेशा नीचा ही दिखाती हैं।
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