यह ईर्ष्या करने वाले का अंत कहानी हमें बताती है कि जलन और छल से किसी का भला नहीं होता। राजा रणजीत सिंह के राज्य में रहने वाले एक नाई ने अपने पड़ोसी भोले पंडित से ईर्ष्या करके उसे नुकसान पहुँचाने की योजना बनाई, लेकिन अंत में वही चाल उसी पर भारी पड़ गई। यह कहानी सिखाती है कि दूसरे के लिए बुरा सोचने वाला एक दिन स्वयं अपने कर्मों का फल जरूर पाता है। तो चलिए देखते हैं कैसे:
एक बार की बात हैं, किसी राज्य में राजा उदयराज सिंह नाम का एक परोपकारी राजा रहता था। उसने अपने राज्य को व्यवस्थित ढंग से बसाया था। उसके राज्य में एक ऐसा गाँव भी था। जिसमें हर वर्ग के लोग जैसे- कुम्हार, लोहार, पंडित, नाई और धोबी जैसे अनेकों जाति के लोग रहते थे। वे सभी प्रतिदिन राजा के महल में अपने-अपने कर्म के अनुसार काम करते थे। जिसके बदले में राजा सभी को कुछ न कुछ जरूर देता था।
इस तरह से राजा का राज्य बहुत अच्छी तरह से चल रहा था। जिसके कारण राजा राज करते थे और प्रजा सुख भोगते थे। राजा के द्वारा बसाए गए गाँव में पंडित और नाई का घर पास-पास में था। नाई अपने पड़ोसी पंडित से ईर्ष्या करता था। क्योंकी, पंडित सुबह-सुबह राजा के दरबार में कथा सुनाकर जल्दी चला जाता था। जिसके बदले में राजा, पंडित को प्रतिदिन एक सोने का सिक्का दिया करते थे।
पंडित के पास अधिक समय होने के कारण वह और कई जगहों पर कथा सुनाने चला जाता था। जिससे उसकी आमदनी और अधिक हो जाती थी। जबकि, नाई का पूरा दिन राजा से लेकर उनके दरबारी और मंत्रियों के दाढ़ी और बाल काटने में ही बीत जाता था। जिसकी वजह से उसे कहीं और जाने का मौका नहीं मिल पाता था।
एक दिन नाई ने अपना ईर्ष्यालु दिमाग लगाया। उसने ब्राम्हण से कहा, “पंडित जी! कल राजा के बाल काटने गया था तो वे आपके बारें में कह रहे थे कि पंडित जब कथा सुनाता है तब उसके मुँह से बदबू आती हैं।” इसलिए, आप जब भी राजा को कथा सुनाने जाया करो अपनी नाक और मुँह पर कपड़ा बांधकर जाया करो। पंडित बहुत सीधा और भोला था। वह नाई की बातों में आ गया।
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उधर नाई ने राजा से कहा- “महाराज! आपका पंडित बहुत दुष्ट हैं। वह आज मुझसे कह रहा था कि राजा के मुँह से बहुत गंदी दुर्गंध आती हैं। इसलिए, कल से मैं नाक और मुँह पर कपड़ा बांध कर कथा सुनाने जाया करूंगा। नाई की बात सुनकर राजा गुस्से से लाल-पीला हो गए। राजा ने कहा – “तुच्छ प्राणी पंडित की इतनी हिम्मत कि मेरे बारें में ऐसी सोच रखें।”
अगले दिन पंडित अपने मुँह और नाक पर कपड़ा बांधकर कथा सुनाने पहुँचा। कथा खत्म होने के बाद राजा ने पंडित को दो सोने का सिक्का और एक पत्र देते हुए कहा, “इसे जल्द से जल्द कोतवाल के पास पहुँचा दो।” पंडित को दी गई सजा के बारें में जानने के लिए नाई महल के बाहर पंडित का बेसब्री से इंतजार कर रहा था।

जब पंडित बाहर निकल कर आया तो उसने नाई से कहा- “तुम्हारी सलाह सही थी, देखो आज महाराज ने मुझे दो सोने के सिक्के दिए हैं।” नाई पंडित की बातों को सुनकर अंदर ही अंदर ईर्ष्या से भर गया। लेकिन, नाई बहुत चालाक था, उसने ब्राम्हण से कहा- “पंडित जी अब तो आपको प्रतिदिन दो सोने के सिक्के मिलेंगे, आपको सलाह मैंने दी थी। इसलिए एक सोने का सिक्का मेरा भी बनता हैं।
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पंडित बहुत भोला और सीधा था। वह नाई को एक सोने का सिक्का देते हुए कहता हैं- “इस पत्र को जल्दी से कोतवाल के पास पहुँचा दो और बता देना की राजा रणजीत सिंह ने भिजवाया हैं।” नाई सोने का सिक्का पाने के बाद भागते हुए कोतवाल के पास पहुँचा। वह पत्र को कोतवाल को देते हुए कहा- “यह पत्र महाराज रणजीत सिंह ने भेजा हैं।”
कोतवाल पत्र को खोलकर देखता हैं। उस पत्र में लिखा था कि पत्र देने वाले का दाहिना हाँथ काट लिया जाए। कोतवाल तुरंत अपने सिपाहियों से उसके दाहिने हाँथ को कटवा दिया। प्रतिदिन की भांति पंडित अगले दिन भी राजा के दरबार में कथा सुनाने पहुँचा। ब्राम्हण का हाथ सही सलामत देख राजा ने पंडित से पूरी घटना के बारें में पूँछा।
पंडित ने सही-सही पूरी बात को बता दिया। राजा पंडित की बुद्धिमानी देख बहुत प्रसन्न हुआ। दगेबाज नाई को अपने किए की सजा मिल ही गई। बेचारा निर्दोष भोला ब्राम्हण बच गया।
नैतिक शिक्षा:
दूसरे के लिए गड्ढा खोदने वाला खुद-ब-खुद एक दिन उसी गड्ढे में गिरता हैं।
🙋♂️ FAQs – ईर्ष्या करने वाले का अंत कहानी
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