तपती गर्मी का मौसम था। मानो आकाश से आग के गोले गिर रहे हो। एक कौवा आसमान में उड़ रहा था। उड़ते-उड़ते उसे जोरों की प्यास लगी। उसने कहा, “हे भगवान! कहीं से पानी पीला दो, नहीं तो मेरी जान निकल जाएगी।” कुछ दूर आगे जाने के बाद उसे एक कुआं दिखाई दिया। वह कुएं के पास आकर देखा तो कुएं सूखा पड़ा था। वह मायूस होकर वहाँ से उड़ गया।
उड़ते-उड़ते उसे नीचे नदी दिखाई दिया। कौवा नीचे आकर देखा तो नदी सूखी हुई थी। वहाँ की जमीन में दर्रे फटे हुए थे। कौवा अपनी किस्मत को कोसने लगा। उसे लगने लगा आज तो पानी न मिलने के कारण शरीर से प्राण निकल ही जाएगा। कौवे ने उम्मीद नहीं छोड़ी। उसने अपने पंख फैलाया और फिर से आकाश में उड़ गया।
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काफी समय बाद बड़ी मुश्किल से उसे पेड़ के नीचे एक मटका रखा दिखाई दिया। उसने मन ही मन में कहा, भगवान अब मेरी परीक्षा मत लो। मुझे जल्द से जल्द पानी पीला दो। प्यासा कौवा पेड़ के नीचे रखे मटके पर आकर बैठ गया। उसने देखा की घड़े में पानी बहुत कम था। वहाँ तक उसी चोंच नहीं पहुँच सकती थी।
वह भगवान ने कहने लगा, “भगवान आपने मुझे बड़ी मुश्किलों के बाद पानी भी दिया तो उसे मैं पी नहीं सकता।” वह मटके पर बैठे-बैठे सोचे जा रहा था। तभी अचानक उसकी नजर घड़े के आसपास पड़े कंकड़ पर गई। उसने बिना देर किए उन कंकड़ों को उठा-उठा कर घड़े में डालने लगा। देखते-देखते पानी ऊपर आने लगा। पानी ऊपर आते देखे उसके अंदर उम्मीद की किरण जग गई।
वह जल्दी-जल्दी सारे कंकड़ को उस मटके में डाल दिया। जिसके कारण घड़े का पानी ऊपर आ गया। इस तरह कौवा अपनी बुद्धिमानी के बल पर पानी पी लिया।
नैतिक सीख:
मेहनत लगन और बुद्धिमानी के साथ सफलता प्राप्त की जा सकती हैं।

