1. Panchtantra ki kahani – टपका का डर:
किसी जंगल में एक बुढ़िया झोपड़ी में रहती थी। वह बहुत ही साहसी, निडर और निर्भीक थी। उस जंगल में बुढ़िया का और कोई नहीं था। एक दिन की बात हैं, जंगल में तेज बारिश हो रही थी। बुढ़िया को बहुत तेज की भूख लगी थी। उसने सोचा बारिश बंद हो जाए तब खाना बनाती हूँ। लेकिन बारिश बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
देखते-देखते बारिश के साथ-साथ बडे-बडे ओले भी गिरने शुरू हो गए। ओले की डर से एक बाघ भागते हुए बुढ़िया के छप्पर के पास आ पहुँचा। अचानक बुढ़िया की निगाह उस बाघ पर पड़ी। उसने सोचा आज तो बाघ मुझे अपना शिकार बना कर ही रहेगा। बुढ़िया खाना बना रही थी। उसके चूल्हे पर पानी टपक रहा था। उसने तेज आवाज में बोली, “हे भगवान! मुझे “टपका” से जितना डर लगता उतना ‘बाघ’ से नहीं”
झोपड़ी के सामने बैठे बाघ ने सोचा, लगता हैं ये टपका मुझसे भी बड़ा कोई जानवर हैं। जिससे बुढ़िया डरती हैं और मुझसे नहीं। बाघ घबरा गया और वह तेजी से जंगल की तरफ भाग गया।
नैतिक शिक्षा:
विषम परिस्थितियों में हमें बहुत ही धैर्य और संयम के साथ फैसला लेना चाहिए।
2. Panchtantra ki kahani – स्वार्थी दोस्त:

मनीष और सुरेश दो दोस्त थे। दोनों हमेशा एक साथ रहते थे। एक दिन दोनों दोस्त जंगल के रास्ते होते हुए कही घूमने जा रहे थे। बीच जंगल में उन्हें अचानक सामने से एक भालू उनकी तरफ आता दिखा। सुरेश बिना देरी किए एक पेड़ पर चढ़ गया। मनीष को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था। मनीष भालू से बचने के लिए बिना देरी किये अपनी सांस रोककर जमीन पर लेट गया।
भालू नजदीक आकर मनीष को चारों तरफ घूमकर देखा। उसके नाक और कान को सूंघा। उसे मरा समझ भालू अपने अगले शिकार की तरफ निकल गया। कुछ समय बाद सुरेश पेड़ से नीचे आया और मनीष से कहा, “दोस्त, तुम सुरक्षित हो भालू ने तुम्हें किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाया। इस बात को लेकर मैं बहुत खुश हूँ।”
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लेकिन, “भालू ने तुम्हारे कान में क्या कहा?” मनीष ने कहा, “कभी भी मतलबी और स्वार्थी व्यक्ति का साथ मत करना, नहीं तो तुम्हें धोखा ही मिलेगा। उसकी बातों को सुनकर सुरेश का सिर शर्म से झुक गया। वह अपने आप को बहुत ही शर्मिंदा महसूस किया।
नैतिक शिक्षा:
मुश्किल समय में साथ देने वाला व्यक्ति ही सच्चा दोस्त होता हैं।
3. Panchtantra ki kahani – प्यासा कौवा:

एक बार की बात हैं। गर्मी का दिन था, एक कौवा आकाश में उड़ रहा था। कौवा बहुत प्यासा था। वह पानी की तलास में कई मील दूर निकल चुका था। लेकिन उसे कही पानी नहीं दिखाई दे रहा था। नदी और झील सूखे पड़े थे। अब कौवे को लगने लगा था की आज मेरे जीवन का आखिरी दिन हैं। क्योंकि, पानी न मिलने के कारण उसका गला सूखे जा रहा था।
तभी उसे एक कुआं दिखाई दिया। उसने नीचे आकर देखा तो उस कुए में पानी नहीं था। उसने भगवान को कोसते हुए कहा, “हे! भगवान अब परीक्षा मत लो, मैं और अधिक देर तक अपनी प्यास बर्दाश्त नहीं कर सकता” इतना कहकर वह उड़ जाता हैं। तभी उसे एक घर के सामने पेड़ के नीचे एक घड़ा रखा हुआ दिखाई दिया।
घड़े के पास जाकर देखा तो घड़े में पानी नीचे था। वहाँ तक कौवे की चोंच नहीं पहुँच सकती थी। उसने बिना देरी किये आसपास पड़े काकड़ को उठा, उठा कर घड़े में डालने लगा। देखते-देखते पानी ऊपर आने लगा। इस तरह से कौवा पानी पी कर भगवान का धन्यवाद कह कर उड़ गया।
नैतिक शिक्षा:
सोच-समझकर बुद्धिमानी से लिया गया फैसला सफलता दिलाती हैं।
4. Panchtantra ki kahani – ईमानदार लकड़हारा और कुल्हाड़ी:

एक लकड़हारा जंगल से लकड़ियाँ काटने गया था। सूखे पेड़ खोजते खोजते वह नदी के किनारे जा पहुँचा। नदी के पानी का बहाव बहुत तेज था। लकड़हारा उसी नदी के किनारे लगे सूखे पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ काटने लगा। अचानक, उसकी कुल्हाड़ी टूटकर नदी में जा गिरी। अब वह मायूस होकर पेड़ से नीचे आकर बैठ गया।
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लकड़हारा भगवान को कोसते हुए कहा, “आज अगर मैं और मेरा परिवार भूखा सोये तो उसके जिम्मेदार आप होंगे।” मैंने सोचा था आज लकड़ियों को बेचकर अपने बच्चों को भरपेट भोजन कराऊँगा। लेकिन, मेरी कुल्हाड़ी ही नदी में गिर गई अब मैं क्या करूँ। तभी बीच नदी से जलदेवी एक सोने की कुल्हाड़ी लेकर निकली। जलदेवी ने लकड़हारे से बोली, “ये लो अपनी कुल्हाड़ी” लकड़हारा कुल्हाड़ी देखकर बोला यह कुल्हाड़ी मेरी नहीं हैं। इसे मैं नहीं ले सकता।
जल देवी पानी में नीचे जाकर चांदी की कुल्हाड़ी लेकर आई, जिसे दिखाते हुए बोली, “क्या यह आप की कुल्हाड़ी हैं?” लकड़हारे ने जबाव दिया नहीं यह भी मेरी कुल्हाड़ी नहीं हैं। जलदेवी फिर से पानी के अंदर गई और लकड़हारे की कुल्हाड़ी ले आई। जलदेवी के हाँथ में अपनी कुल्हाड़ी देख उसके चेहरे पर चमक आ गई। उसने कहा, “हाँ! यह मेरी कुल्हाड़ी हैं। लकड़हारे की ईमानदारी देख, जलदेवी प्रसन्न हो गई। लकड़हारे को तीनों कुल्हाड़ी दे दी।
नैतिक शिक्षा:
ईमानदारी व्यक्ति को कभी निराश करती हैं।
5. Panchtantra ki kahani – गाँव वाले और गड़ेरिया:

भीमा नाम का एक गड़ेरिया था। वह प्रतिदिन अपने भेड़ों को लेकर गाँव के पास वाले जंगल में घास चराने जाता था। जंगल में वह अकेला ही रहता था। जिसके कारण उसे बोरियत महसूस होती थी। एक दिन बैठे-बैठे उसके दिमाग में खुरापात सूझी। उसने सोचा क्यों न गाँव वालों को बुलाया जाए। एकाएक, वह जोर-जोर से चिल्लाया, बचाओ-बचाओ… भेड़िया मेरे भेड़ों को खा रहा हैं।
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भीमा गड़ेरिया की आवाज सुनकर गाँव वाले लाठी-डंडे लेकर उसकी तरफ आए। गाँव वालों को देख भीमा तेज-तेज से हँसने लगा। मैं तो मजाक कर रहा था। यहाँ कोई भेड़िया नहीं आया। गाँव वाले उसे भला-बुरा कहते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं। इसीतरह, एक दिन फिर से भीमा ने चिल्लाने की आवाज लगाई। लेकिन, उस दिन गाँव के कुछ लोग ही आए। फिर से भीमा ने कहा- “मैं तो मजाक कर रहा था।”
एक दिन भीमा अपने भेड़ों को चराने उसी जंगल में ले गया था। अचानक कई भेड़िया उसके भेड़ों पर टूट पड़े और उन्हें मार डाला। भीमा जोर-जोर से चिल्लाता रहा। लेकिन, गाँव वाले इस बात को सोचकर नहीं आए कि वह फिर से मजाक कर रहा होगा।
नैतिक शिक्षा:
किसी भी इंसान को एक बार गुमराह किया जा सकता हैं, बार-बार नहीं।
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