आज्ञाकारी पुत्र श्रवण कुमार की कहानी

📅 Published on October 15, 2025
🔄 Updated on February 16, 2026
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श्रवण कुमार व्यक्तित्व:

श्रवण कुमार का चरित्र रामायण में पढ़ने को मिलता हैं। श्रवण कुमार अपने माता-पिता की बहुत सेवा करता था। वह अपना जीवन अपने माता-पिता की सेवा के लिए निवछावर कर दिया था। उसके माता-पिता अंधे थे। उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता था। श्रवण कुमार एकलौता बेटा था, वह अपने माता-पिता की हर बता को मानता था।

आज्ञाकारी पुत्र:

एक बार श्रवण कुमार के माता-पिता का तीर्थयात्र पर जाने का मन किया। श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को तीर्थयात्रा पर ले जाने के लिए तराजू की तरह कांवर बनाया। एक तरफ अपने पिता को और दूसरी तरफ अपने माता को बैठकर तीर्थयात्रा पर निकल गया। जंगल के रास्ते धीरे-धीरे श्रवण कुमार अयोध्या क्षेत्र में पहुँच चुका था।

रास्ते में श्रवण के माता-पिता को प्यास लगी। उसने अपने माता-पिता को एक पेड़ की छाव में छोड़कर सरयू नदी के तट पर पानी भरने चला गया। अयोध्या के राजा दशरथ शिकार खेलने गए थे। वह शिकार खेलते-खेलते अपने साथियों से दूर भटक गए। सुबह से शाम होने को आ चुकी थी। लेकिन उनके हाथ कोई शिकार नहीं लगा था।

श्रवण कुमार की मृत्यु:

राजा निराश होकर वापस अपने महल जाने लगे। अचानक नदी के किनारे से पानी की कल-कल की आवाज आई। राजा आवाज सुनकर सोचे नदी के किनारे जरूर कोई जानवर पानी पी रहा हैं। उन्होंने अपना सबसे शक्तिशाली शब्दभेदी बाण चला दिया। बाण जाकर श्रवण कुमार के पेट से आरपार हो गया। वह मूर्छित होकर वही गिर पड़ा।

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तभी उसके पास राजा दशरथ पहुँचे श्रवण को देख उन्होंने कहा, “हे भगवन यह तो अनर्थ हो गया। मुझसे बहुत बडा पाप हो गया।” श्रवण कुमार राजा दशरथ को एक पेड़ दिखाते हुए कहा, “महाराज आप इस कमंडल के पानी को उस पेड़ के नीचे बैठे मेरे माता-पिता को पीला दो। अगर उन्हे अतिशीघ्र पानी नहीं पिलाया गया तो उनके प्राण निकल जायेगे। कृपया उन्हें पानी पीला दो।

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कमंडल का जल लेकर राजा दशरथ श्रवण कुमार के माता-पिता के पास गए। माता-पिता ने पूछा- “बेटा श्रवण, तुम आ गए। पानी लाने में इतनी देर क्यों लगा दी।” राजा दशरथ की आँखों से आँसू बह रहे थे। उधर श्रवण की तड़प-तड़प कर जान निकल गई। राजा ने श्रवण के माता-पिता को पानी पीने के लिए उनके हाथ में दिया। लेकिन उनके माता-पिता पूछते रहे तुम कौन हो? तुम बोलते क्यों नहीं हो।

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राजा दशरथ को श्राप:

तुम मेरे बेटे श्रवण नहीं हो। तुमने जरूर मेरे बेटे को मर दिया। राजा दशरथ रोते हुए सारी कहानी सुना दी। श्रवण के माता-पिता ने पानी पीने से माना कर दिया। दोनों राजा दशरथ को श्राप देते हुए कहा- “जिस तरह हम दोनों अपने बेटे के वियोग में मर रहे हैं। एक दिन तुम भी अपने बेटे के वियोग में मरोगे।” इस तरह दोनों अपने प्राण त्याग दिए। राजा दशरथ बहुत दुखी हुए। वे अपने महल अयोध्या आ गए।

आगे चलकर श्रवण के माता-पिता का श्राप सच हुआ। राजा दशरथ के बेटे प्रभु श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास हो गया। अपने बेटों के वियोग में राजा दशरथ तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग दिए।

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