सच्चाई की जीत : ईमानदार लकड़हारा और जलपरी

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बहुत समय पहले की बात हैं। एक घने जंगल के किनारे बस हरिहरपुर नामक गाँव में रामू नाम का एक गरीब लकड़हारा रहता था। उसके घर में उसकी पत्नी और तीन बच्चे थे। वह अपना जीवन लकड़ियों को बेचकर यापन करता था। वह कभी हरे-भरे पेड़ों को नहीं काटता था। उसे यह पता था कि पेड़ हमारे जीवन के लिए कितना बहुमूल्य हैं। जो हमें ऑक्सीजन और कई तरह के लाभ पहुंचाते हैं।

रामू बहुत मेहनती तथा ईमानदार व्यक्ति था। वह सुबह होते ही अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर जंगल की तरफ निकल जाता था। वह पूरे दिन सूखे पेड़ की तलाश में जंगल में भटकता रहता था। वह लकड़ियों को बेचकर थोड़ा-बहुत पैसे कमाता था। जिससे उसका गुजरा ठीक से नहीं चल पाता था। लेकिन फिर भी वह हमेशा खुश रहता था। वह पत्नी और बच्चों को भी ईमानदारी के पाठ पढ़ाता था।

वह अक्सर अपनी पत्नी और बच्चों से कहता था। “ईमानदारी से बढ़कर कोई धन नहीं होता” इसलिए हमें अपने जीवन में ईमानदारी का दामन थामकर चलना चाहिए। उसकी सोच और ईमानदारी के चर्चे पूरे गाँव में होते थे। जिसके कारण लोग उसकी तारीफ करते थे।

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एक दिन की बात हैं सुबह-सुबह रामू लकड़ियाँ काटने के लिए जंगल की तरफ निकल गया। सुबह से दोपहर हो गई लेकिन उसे कोई सूखा पेड़ दिखाई नहीं दिया। रामू बहुत थक चुका था। उसे प्यास भी लग रही थी। वह नदी के किनारे पानी पीने के लिए गया। उसने देखा की नदी के किनारे एक पेड़ की कुछ टहनियाँ सूखी थी। वह उन टहनियों को काटने के लिए पेड़ पर चढ़ गया।

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वह टहनियों को काट रहा था कि अचानक उसकी कुल्हाड़ी टूटकर नीचे नदी में गिर गई। पानी का बहाव तेज होने के कारण उसकी कुल्हाड़ी मिल नहीं सकी। वह मायूस होकर नदी के किनारे बैठ था। वह अपनी किस्मत को कोसे जा रहा था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा हैं। अचानक से नदी में से एक जलपरी निकली। वह अपने हाथ में तीन कुल्हाड़ी ली हुई थी।

उसने लकड़हारे को सोने की कुल्हाड़ी दिखाते हुए पूछी- “क्या यह कुल्हाड़ी तुम्हारी हैं?” लकड़हारे ने वह कुल्हाड़ी लेने से मना कर दिया। जलपरी ने उसे चांदी की कुल्हाड़ी दिखाई। लेकिन इस बार भी लकड़हारे ने मना कर दिया। जलपरी ने लकड़हारे को उसकी कुल्हाड़ी दिखाई तो उसने कहा, हाँ! यह मेरी कुल्हाड़ी हैं।

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लकड़हारे की ईमानदारी देख जलपरी बहुत प्रसन्न हुई। उसने लकड़हारे को तीनों कुल्हाड़ी दे दी। वह जलपरी को हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया। घर पहुँचकर उसने जंगल की सारी बात अपनी पत्नी से बता दी। देखते-देखते उसकी गरीबी दूर हो गई, लेकिन उसका स्वभाव पहले जैसा सरल और विनम्र ही था। वह अब भी ईमानदारी के साथ जीवन जीता था।

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रामू की गरीबी दूर होते देख उसका पड़ोसी श्याम कुल्हाड़ी की बात पता कर ली। अगले दिन वह कुल्हाड़ी लेकर नदी के किनारे लकड़ियाँ काटने गया। लकड़ी काटते समय उसने अपनी कुल्हाड़ी जानबूझकर नदी में गिरा दिया और वह जोर-जोर रोना शुरू कर दिया। अचानक उस नदी से एक जलपरी निकली। उसने उसे सोने की कुल्हाड़ी दिखाते हुए पूछा- “क्या यह कुल्हाड़ी तुम्हारी हैं। श्याम तुरंत बोला, “हाँ! यही मेरी कुल्हाड़ी है।”

जलपरी समझ गईं कि श्याम झूठ बोल रहा है। वह क्रोधित हो उठी उसने कहा “तुम लालची और बेईमान हो। तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा।” यह कहकर वह श्याम की लोहे की कुल्हाड़ी भी लेकर चली गई। श्याम खाली हाथ घर लौट आया और अपनी गलती पर पछताने लगा।

कहानी से सीख:

ईमानदारी से बढ़कर कोई बड़ा धन नहीं होता।

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