गौतम बुद्ध का जन्म लगभग ‘563 ईसा पूर्व कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी नेपाल’ में हुआ था। इनकी माँ का नाम ‘महामाया’ था। जोकि, कोलीय वंश की थी। बुद्ध के जन्म के लगभग सात दिन बाद इनकी माँ की मृत्यु हो गई। जिसके कारण इनका पालन-पोषण इनकी मौसी ‘गौतमी’ ने किया। इनके बचपन का नाम ‘सिद्धार्थ’ था। इक्कीस साल की उम्र में सिद्धार्थ की शादी ‘यशोधरा’ से हुई। जिससे इनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम ‘राहुल’ रखा गया।
लेकिन, राजकुमार सिद्धार्थ ने संसार के लोगों को दुख दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए सत्य की खोज में निकल गए। वर्षों की कठिन तपस्या के बाद ”बिहार के बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।” तब से वे ‘सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध’ बन गए। उन्होंने लोगों के घर जा-जा कर मोक्ष प्राप्ति का उपदेश दिया। उनके द्वारा दिए गए कुछ उपदेश निम्नलिखित हैं।
1. धनवान और निर्धन में अंतर:

राजा शुद्धोधन अपने ‘राजकुमार सिद्धार्थ’ की सुख सुविधाओं के लिए को कोई कमी नहीं होने देना चाहते थे। वे अपने राजकुमार को दुनिया की हर खुशी देना चाहते थे। लेकिन, राजकुमार उन सब भौतिक चीजों से दूरियाँ बनाए जा रहे थे। एक दिन ‘सिद्धार्थ’ का दोस्त ‘बसंतक’ उनसे मिलने के लिए आया। वह, अपने दोस्त की सुख-सुविधाओं को देख आश्चर्यचकित हो गया।
उसने राजकुमार सिद्धार्थ से कहा- “आपके माता-पिता आप से कितना प्यार करते हैं। जोकि, आपकी हर जरूरत का ख्याल रखते हैं।” राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने दोस्त बसंतक से कहा, “इस दुनिया के हर माता-पिता अपने बच्चे को प्यार करते हैं। लेकिन, क्या तुम्हें पता हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी बिडम्बना क्या हैं?
इस दुनिया में सभी लोग एक समान नहीं हैं, किसी के पास धन इतना हैं कि उससे संभाला नहीं जा रहा। वह समझ नहीं पा रहा हैं कि इसको कैसे खर्च करें।” जबकि, दूसरी ओर वे लोग हैं जो सुबह से शाम तक अपने खाने का जतन नहीं कर पा रहे हैं। बसंतक अपने मित्र की बातों को सुनकर शांत हो गया। और देखता हैं कि राजकुमार इसी बात को लेकर चिंता में डूबे हुए हैं।
इस तरह से राजा शुद्धोधन अपने बेटे का वैभव-विलास के प्रति लगाव न होने के कारण उन्हे ‘ऋषि असित’ की भविष्यवाणी याद आती हैं। राजा शुद्धोधन को लगने लगा था कि उनके बेटे के अंदर सम्राट की अपेक्षा संत के अधिक गुण देखने को मिल रहे हैं। कही वह साधु सन्यासी न बन जाए। शुद्धोधन ने राजकुमार सिद्धार्थ की मौसी प्रजावती से बहुत गहन विचार-विमर्श किया।
प्रजावती ने राजा शुद्धोधन को एक बात सुझाई कि राजकुमार सिद्धार्थ की शादी करवा दी जाए जिससे राजकुमार की मोह-माया उनकी पत्नी की तरफ हो जाए। इस तरह से राजकुमार सिद्धार्थ का स्वयंवर रचा गया। जिसमें यशोधरा नाम की लड़की के साथ विवाह रचाया गया। कुछ समय बाद उन्हें एक पुत्र पैदा हुआ। जिसका नाम “राहुल” रखा गया। लेकिन, फिर भी उनको यह सब मोह-माया लगता हैं। जिसके कारण राजकुमार सिद्धार्थ अपने बच्चे और पत्नी को छोड़कर सत्य की खोज में निकल गए।
2. क्रोध से नुकसान:

महात्मा बुद्ध लोगों को मोक्ष दिलाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर लोगों को सत्य का उपदेश देते थे। एक बार गौतम बुद्ध किसी गाँव में अपने उपदेश दे रहे थे। वहाँ पर अधिक संख्या में लोग उपस्थति हुए थे। जोकि, भगवान बुद्ध के द्वारा दिए जाने वाले उपदेशों को बैठ कर श्रवण कर रहे थे। भगवान बुद्ध अपने उपदेश में लोगों को बता रहे थे कि, “हमें एक दूसरे प्रति प्रीत, प्यार और नम्रता की भावना रखनी चाहिए।”
क्योंकि, ईर्ष्या, द्वेष, नफरत और क्रोध व्यक्ति को अग्नि की तरह जला देती हैं। जिससे मनुष्य खुद का और दूसरों का भी नुकसान करता हैं। इस बात को और सरल तरीके से बताते हुए कहते हैं, “क्रोध, अग्नि में जलते हुए कोयले के समान होता हैं। जिसे मनुष्य अपने हाथ में लेकर किसी दूसरे के ऊपर फेंकता हैं तो दोनों को नुकसान होता हैं।”
प्रवचन सुनने बैठे लोग बहुत ध्यान से भगवान बुद्ध की बातों को सुन रहे थे। उन्ही लोगों में से एक व्यक्ति ऐसा बैठा था, जिसे भगवान बुद्ध की बातें पसंद नहीं आ रही थी। वह अचानक एकाएक उठा और महात्मा बुद्ध को भला बुरा कहने लगा। वह कहता हैं, “ये पाखंडी हैं, इसकी बातों को मत मानो यह लोगों को भ्रमित कर रहा हैं। सभी लोग उठो और यहाँ से चलो।”
उस व्यक्ति की बातों को सुनकर भगवान बुद्ध बिल्कुल शांत हो गए। जिससे वह और क्रोधित हो गया। वह गौतम बुद्ध के पास जाकर और भला-बुरा कहने लगा। जिसका अब भी कोई जबाब न मिलने के कारण वह भगवान बुद्ध पर थूककर अपने घर चला गया। गौतम बुद्ध लोगों को फिर से अपना प्रवचन देने लगते हैं। उस व्यक्ति को अपने घर पहुंचकर अपनी गलती का ऐहसास हुआ।
वह तुरंत भागते हुए उसी गाँव में जाकर देखा कि भगवान बुद्ध वहाँ से जा चुके हैं। वह व्यक्ति कई गांवों में बुद्ध को खोजने के लिए निकल गया। उसे एक जगह भगवान बुद्ध दिखाई दिए। वह जाकर उनके चरणों में गिर गया और अपनी गलती की क्षमा मांगते हुए कहने लगा- “हे, महात्मा मुझे माँफ कर दो, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”
भगवान बुद्ध उससे पूछते हैं- “तुम कौन हो? वह व्यक्ति कहता हैं, “आप भूल गए, कल मैंने आपके ऊपर थूका था और आपको भला-बुरा भी कहा था।” महात्मा बुद्ध ने उसे जबाब दिया, मैं उस कल को वहीं छोड़ आया। उसके चक्कर में आज को नहीं खराब करना चाहिए। जिससे हमारा भविष्य बर्बाद हो सकता हैं।
महात्मा बुद्ध आगे कहते हैं, “आप ने अपने किए पर पछतावा कर लिया तो तुम क्षमा योग्य हो” इस तरह से महात्मा बुद्ध के विचारों से वह प्रभावित होकर उनके बताए मार्ग पर चलने लगा।
3. जीवों पर दया करो:

एक बार राजकुमार सिद्धार्थ किसी उपवन में विचारशील अवस्था में बैठे हुए थे। अचानक उनके पास एक हंस आकर गिरा और वह तड़फड़ाने लगा। जिसे देख सिद्धार्थ ने हंस को उठाकर उसके घाव को साफ किया और लगे हुए तीर को बाहर निकाल दिया। जब वह हंस को पानी पीला रहे थे तो अचानक सिद्धार्थ का चचेरा भाई देवदत्त अपने हाथ में धनुष बाण लिए हुए उसके सामने आया और कहने लगा, “यह हंस मेरा हैं लाओ मुझे दे दो” मैंने इसे अपना शिकार बनाया हैं।
राजकुमार सिद्धार्थ, देवदत्त से कहते हैं- “हमें जीवों पर दया करनी चाहिए, बेजुबान पशु-पक्षियों को नहीं मारना चाहिए। देवदत्त कहता हैं, “कृपया आप मुझे उपदेश न दे, मेरा हंस वापस कर दो” सिद्धार्थ कहता हैं, “मैंने इसकी जान बचाई हैं इसलिए, यह हंस मेरा हैं।” इसे मैं आपको नहीं दे सकता। देवदत्त कहता हैं, “मैंने इस पर तीर चलाया हैं, जिसके कारण यह नीचे गिरा इसलिए, इस हंस पर मेरा अधिकार हैं।”
दोनों में जुबानी बहस छिड़ गई। लेकिन, दोनों ही किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे। तो वें दोनों हंस को लेकर राजा शुद्धोधन के दरबार गए। वहाँ पहुंचकर देवदत्त कहता हैं, “महाराज” शिकार करते वक्त मैंने इस हंस पर तीर चलाया जिससे वह गिर गया। लेकिन, सिद्धार्थ अब इस हंस पर अपना अधिकार दिखा रहा हैं, कृपया न्याय करें। महाराज शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को अपनी बात रखने का मौका दिया।
उसने कहा, “मैं वन में साधना कर रहा था। अचानक यह हंस मेरे पास आकार गिरा, मैंने इस हंस का उपचार किया और उसे पानी पिलाया इसलिए, इस हंस पर मेरा अधिकार होना चाहिए।” दोनों की बातों को सुनकर राजा शुद्धोधन अपने मंत्रियों से सलाह लेते हुए कहा, “इस हंस को दरबार के बीचों-बीच छोड़ दिया जाए यह जिसके पास जाएगा हंस उसी का होगा।”
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हंस को राजा के दरबार में बीचों-बीच छोड़ा गया। हंस चलकर राजकुमार सिद्धार्थ के पास आ गया। राजा अपना फ़ैसला सुनाते हुए कहा, “न्याय हो चुका हैं, यह हंस राजकुमार सिद्धार्थ का हैं। क्योंकि, “मारने वाले से बड़ा, बचाने वाला होता हैं।” इस तरह से देवदत्त भरी सभा में लज्जित होकर चला गया।
4. मौत का डर:

एक बार भगवान बुद्ध किसी गाँव में उपदेश दे रहे थे। उन्होंने अपने उपदेश में लोगों को एक कहानी सुनाई, “किसी शहर में एक बनिया रहता था। जोकि, जन्मजात कंजूस था, उसे हर समय पैसे का ही ध्यान बना रहता था। वह बहुत अधिक पैसा कमाना चाहता था। वह हमेशा अपने शहर के सबसे बड़े सेठ के बराबर होना चाहता था। जिसके कारण वह एक-एक पैसे को एकठ्ठा किए जा रहा था।”
एक दिन उसे खबर मिली कि उसके शहर के सबसे बड़े सेठ की मृत्यु हो गई। अब बनिया सोचने लगा कि उसके पास इतनी सारी धन-दौलत, गहने, महल, और हवेली सब किस काम के बचे, सब यही छोड़कर चला गया। उसका मन अब डगमगाने लगा और वह सोचने लगा मैं भी सेठ के नक्शे-कदम पर चल रहा हूँ। क्या जाएगा मेरे साथ, मैं भी यहीं पर सब कुछ छोड़कर चला जाऊंगा।
अब बनिया को मौत का डर सताने लगा, उसे प्रतिदिन लगने लगा की आज मैं मर जाऊंगा। जिसके कारण अब उसकी तबीयत दिनों-प्रतिदिन खराब होती जा रही थी। देखते-ही-देखते वह मौत के डर से खाना-पीना भी छोड़ चुका था। जिसके कारण अब वह बिस्तर पर पड़ गया। उसका बहुत इलाज कराया गया। लेकिन उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा था।
एक दिन उसके दरवाजे से एक साधु महात्मा गुजर रहे थे। उन्होंने बनिया को अपने दरवाजे के सामने खाट पर बैठे देख पूछा- “लालाजी क्या हुआ, कुछ दिक्कत हैं क्या? आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं लग रहा हैं।” बनिया ने साधु महात्मा को अपनी पूरी व्यथा रो-रोकर बताई। उसकी बातों को सुनकर साधु ने हँसते हुए कहा- “तुम्हारे रोग का इलाज बहुत साधारण हैं।”
बनिया ने साधु महात्मा से बड़ी लालसा के साथ पूछा। महाराज, कृपया मुझे इलाज बताए। साधु महात्मा ने उससे कहा, “जब भी तुम्हारे मन में मौत का ख्याल आए तो तुम जोर से कहना, “जब तक मौत नहीं आएगी, मैं जिंदा रहूँगा।” इस नुस्खे को आप दस दिन तक आजमा कर देखो। अगली बार जब बनिया साधु से मिला तो वह उनके चरणों में गिर गया। उसने कहा- “महाराज मुझे एक नई जिंदगी मिल गई, मैं अब बहुत स्वस्थ हूँ। आपकी बताई तरकीब बहुत काम करती हैं।”
साधु ने बनिया को समझाते हुए कहा- “शिष्य, जीवन का सत्य यही हैं कि लोग मौत से नहीं मरते, बल्कि उसके डर से मर जाते हैं। इसलिए, मौत एक कटु सत्य है, जो आनी ही हैं। लेकिन, उससे डरना और उसका इंतजार करना गलत हैं। इस तरह से बनिया अब खुशी-खुशी अपना जीवन दुबारा से यापन करने लगा।
5. त्याग का महत्व:

महात्मा बुद्ध भ्रमण पर निकले थे कि उनकी मुलाकात एक शिष्य से होती हैं। उसने महात्मा बुद्ध से त्याग के बारें में जानने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने शिष्य को एक स्थान पर बैठने के लिए कहा। और उसे समझाते हुए एक कथा सुनाई। किसी राज्य में एक बहुत ही शक्तिशाली राजा रहता था। जिसके पास अथाह सम्पति, धन-दौलत और कई राज्यों के राजा से बड़ी सेना थी। उसके महल को चलाने के लिए बहुत सारे दरबारी और नौकर-चाकर भी थे।
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राजा शक्तिशाली होने के कारण अभिमान से भरा हुआ रहता था। जिसके कारण वह अपने सामने हर किसी को बहुत छोटा समझता था। वह सत्ता के नशे में इतना चूर था कि उसकी खुली आँखों से सिर्फ माया-ही-माया दिखती थी। जबकि, उसकी अंतरात्मा वाली आँखे बंद रहती थी। एक बार उसके दरबार में एक फकीर आया, वह राजा से मिलकर उसके अंदर चल रहे मायाजाल को समझ जाता हैं। फकीर बहुत ऊर्जावान और तेज प्रवृत्ति का था।
राजा ने अभिमान से भरी आवाज में फकीर से पूछा, “क्या चाहिए तुम्हें, क्यों आए हो यहाँ पर, फकीर अपनी नम्र आवाज में कहा- “हे राजन! मैं कुछ लेने नहीं, बल्कि कुछ देने आया हूँ। उसकी बातों को सुनकर राजा के अभिमान को बड़ी चोट लगी। उसने फकीर से चीख भरी आवाज में कहा, “हे फकीर! तुम्हारी इतनी बड़ी हिम्मत, छोटी मुंह बड़ी बात करें” तुम दर-दर भटककर भीख मांगकर अपना पेट पाल रहे हो और तुम मुझे कुछ देने की बात कर रहे हो।
फकीर राजा से कहता है- “निर्धन के पास भी कुछ होता हैं। जोकि दुनियावी माया से परे होता हैं। फकीर की बातों को सुनते ही वह लाल-पीला हो गया।” फकीर फिर से ऊर्जावान शब्दों में कहता हैं कि- “महाराज, त्याग के बिना मोहमाया सब व्यर्थ हैं। जिस तरह रोगी को ठीक होने के लिए उसकी कई पसंदीदा चीजों का त्याग करना पड़ता हैं।”
ठीक उसी प्रकार, से हमें भोग-विलास, वैभव और सुख को पाने के लिए अपने अंदर छिपे अहंकार को त्यागना पड़ता हैं। फकीर की बातें राजा के दिमाग में घर कर जाती हैं। जिससे राजा के जीवन में एक नया सवेरा दिखने लगा।
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