हिन्दी कहानी – परिवार ही असली धन है

📅 Published on January 16, 2026
🔄 Updated on February 16, 2026
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हरीपुर गाँव में मोहन नाम का एक लड़का रहता था। उसके घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। उसके पिता एक छोटी सी दुकान चलाते थे। किसी तरह से उसके घर का गुजर-बसर होता था। मोहन धीरे-धीरे बड़ा हो चुका था। अब वह भी अपने पिता के काम में हाथ बटाने लगा था। जिससे उसके पिता का व्यापार धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हो चुका था। मोहन की शादी रेनू नाम की लड़की के साथ हो गई।

मोहन के पिता की तबीयत ठीक नहीं रहती थी। समय ने करवट बदली एक दिन मोहन के पिता की मृत्यु हो गई। अब मोहन के ऊपर घर की सारी जिम्मेदारी आ चुकी थी। जिसके कारण वह परेशान रहने लगा था। उसकी पत्नी ने उसे समझाया कि होनी को कोई टाल नहीं सकता। अब आपको आगे आना पड़ेगा और घर की सारी जिम्मेदारियों को खुद संभालना पड़ेगा।

उसी दिन से वह अपने पिता के व्यापार को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। देखते-देखते उसका व्यापार ऊँचाइयों को छूने लगा। वह अपने पिता से कई गुना ज्यादा तरक्की कर लिया। कुछ ही महीनों में उसने अपने पुराने घर को तुड़वाकर बड़ा घर बनवा दिया। अब उसका परिवार भी बढ़ चुका था। उसके घर में उसकी माँ, पत्नी और एक बेटा, बेटी थे।

मोहन अपने व्यापार में इतना व्यस्त हो गया कि उसे अपने परिवार की कोई चिंता नहीं रहती थी। वह अपने पत्नी और बच्चों के साथ समय नहीं बीताता था। उसकी पत्नी ने कई बार उसे समझाया की पैसों के साथ-साथ आपको अपने परिवार का भी ध्यान रखना चाहिए। लेकिन वह चाहकर भी अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाता था।

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एक दिन मोहन सुबह-सुबह जल्दी तैयार होकर अपनी दुकान पर जा रहा था। उसने देखा की उसकी बेटी घर में खिलौने से खेल रही थी। मोहन ने अपनी बेटी को आवाज देते हुए कहा- “सानू बेटी! आज तुम चीज खरीदने के लिए मुझसे पैसे नहीं लोगी क्या? लेकिन वह अपने पिता की बातों को नजरअंदाज कर दी। उसके पापा सौ रुपये का नोट उसे देते हुए कहा- “सानू बेटा अब तो खुश हो जाओ”

बेटी ने अपने पापा को एक मिनट रुकने के लिए कहा- “वह दौड़कर पूजा घर में गई उसने खुद से जमा किए पैसों का गुल्लक तोड़कर सारे पैसे ले आई। उन पैसों अपने पिता को देते हुए बोली, “क्या आप हमारी खुशी के लिए आज का दिन हमारे साथ बिताएंगे” जिसके लिए मैं आपको यह सारे पैसे दे रही हूँ। बेटी की बातों सुनकर मोहन को बहुत आश्चर्य हुआ। उसे समझ में आ गया कि पैसों से खुशी नहीं खरीदी जा सकती।

उसके अगले दिन उसकी माँ का देहांत हो गया। उस दिन उसे महसूस हुआ कि उससे कितनी बड़ी गलती हो गई। उसने अपनी माँ के साथ समय नहीं बिताया वह सिर्फ पैसों के पीछे ही भागता रहा। अब आए दिन वह मायूस रहने लगा। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अपनी गलतियों को कैसे सुधारे।

एक रात उसे नीद नहीं आ रही थी। वह अपने बेड से उठकर ड्राइंगरूम में जाकर सोफ़े पर बैठा था। वह अपनी गलतियों के बारे में बार-बार सोचे जा रहा था। तभी उसकी पत्नी वहाँ आई, उसे समझाते हुए कहा- “मैंने आपको कई बार बताया था कि पैसा सबकुछ नहीं हैं।” जिसके पास कम पैसे हैं, वह भी अपना जीवन व्यतीत कर रहा हैं। लेकिन आप ज्यादा पैसों के चक्कर में घर की खुशियों को पीछे छोड़ दिये।

उसकी पत्नी कहा- “जो हुआ सो हुआ, अब हम उसको ठीक नहीं कर सकते” लेकिन हमें अपने वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए। जिससे हम अपने जीवन का एक भी वक्त बर्बाद न करे। उस दिन से मोहन अपने व्यापार के साथ-साथ अपनी पत्नी और बच्चों के साथ भी समय बिताने लगा।

इस तरह से मोहन को ऐहसास हो गया कि हमें पैसा कमाने के साथ-साथ घर की खुशियों पर भी ध्यान देना चाहिए। अब मोहन अपने परिवार के साथ बहुत खुश रहने लगा। उसे पता चल चुका था कि पैसों की खुशी से बढ़कर परिवार की खुशी होती हैं। जोकि पैसों से भी नहीं खरीदी जा सकती।

नैतिक सीख:

परिवार की खुशी ही असली धन हैं।

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