कई दशकों पहले की बात हैं, किसी राज्य में उदयभान सिंह नाम का एक राजा रहता था। वह बहुत दयालु स्वभाव का इंसान था। उसे हमेशा अपने राज्य के प्रजा की चिंता रहती थी। जिसके कारण उसके राज्य के लोग उसे अपना भगवान मानते थे। राजा उदयभान अक्सर अपनी प्रजा के बीच में ही रहता था। उसे अपने ऐशों-आराम और खाने-पीने की चिंता नहीं रहती थी।
राजा का प्रजा के प्रति प्यार:
उसके इस स्वभाव के कारण उसकी पत्नी “महारानी भानूमति” उससे खुश नहीं रहती थी। धीरे-धीरे समय बीतता गया। लेकिन राजा के कोई संतान पैदा नहीं हुई। राजा उदयभान सिंह को इस बात की कोई फिक्र नहीं थी। एक दिन राजा अपने राज्य में घूमने गए हुए थे। उन्होंने देखा कि उसके राज्य में महामारी फैल रही थी। वह कई दिनों तक वही रुककर महामारी से निपटने का प्लान बनाने लगा।

जिसके कारण वह कई सप्ताह तक अपने महल को नहीं जा सका। महीनों बाद जब वह अपने महल पहुँचा तो उसने देखा कि उसकी पत्नी उससे बहुत नाराज थी। वह उससे बात तक नहीं कर रही थी। राजा ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की। लेकिन उसकी पत्नी उसकी एक बात नहीं मान रही थी। उसकी पत्नी रोते हुए कहती हैं- “महाराज, क्या आपको पता हैं, हमारी शादी को दस साल हो चुके हैं।” लेकिन अभी तक हमारे कोई संतान नहीं हैं। आने वाले समय में आपके राज्य को कौन संभालेगा?
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राजा उदयभान सिंह ने कहा, “महारानी भानूमति, आप चिंता मत करो बहुत जल्द हमारा वंशज पैदा होगा।” राजा अपनी राजकुमारी के साथ समय बिताने लगा। लेकिन उसका ध्यान अक्सर अपने राज्य की प्रजा के ऊपर ही बना रहता था। धीरे-धीरे राजा की शादी के लगभग पंद्रह साल बीत चुके थे। लेकिन उसके राज्य को चलाने वाला उत्तराधिकारी अभी तक पैदा नहीं हो सका था।
राजा की चिंता:
अब राजा उदयभान सिंह चिंतित रहने लगा। उसका ध्यान प्रजा की ओर नहीं जा रहा था। एक दिन वह अपने राज्य की प्रजा से मिलकर वापस अपने महल को जा रहा था। बीच रास्ते में उसे कुछ बेचैनी महसूस होने लगी। उसने अपने रथ को रोककर एक कुटिया में पानी लेने के लिए गया। कुटिया में जाकर देखा कि एक महात्मा ध्यान लगाए बैठे हुए थे। उसके सामने कुछ शिष्य भी साधना में बैठे थे।
राजा महात्मा जी को प्रणाम करके उनके सामने बैठ गए। महात्मा जी ने राजा से पूछा, “कहो राजन, इस कुटिया में आपका कैसे आना हुआ। राजा ने पूरी व्यथा महात्मा जी को सुना दिया। महात्मा राजा की बात सुनकर समझ गये कि राजा को उसके वंशज की चिंता हैं। महात्मा जी ने राजा को पानी पिलाया और उन्हें आशीर्वाद दिया। राजा महात्मा जी के चरण स्पर्श करके वापस अपने महल को निकल गया।
राज्य में खुशियां:
कुछ महीनों बाद राजा के घर में किलकारी गूंजी। राजा को वंशज के रूप में बेटी पैदा हुई। राजा और महारानी दोनों बहुत खुश थे। पूरे राज्य में हर्षो-उल्लास से खुशियां मनाई गई। अब राजा उदयभान बहुत प्रसन्न रहने लगा। अब वह पहले की तरह अपनी प्रजा की देखभाल करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे राजा बूढ़ा होता जा रहा था। उसकी बेटी अब शादी योग्य हो चुकी थी। आसपास के राज्य के राजा अपने राजकुमार की शादी राजा उदयभान के बेटी से करना चाहते थे। जिससे वे राजा उदयभान के राज्य पर अपना अधिकार जमा सके।
लेकिन राजा उदयभान बहुत बुद्धिमान था। वह अपनी बेटी की शादी बहुत सोच समझकर करना चाहता था। क्योंकि उसने अपनी प्रजा को बहुत अच्छे से पाला-पोषा था। जिससे उसकी प्रजा को आने वाले समय में कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। एक दिन राजा उदयभान सिंह की बेटी ”चेतना सिंह” शिकार खेलने गई थी। बीच रास्ते में उसे किसी राज्य के सिपाहियों ने किडनैप कर लिया।

वह मदद के लिए जोर-जोर से आवाज लगाने लगी। उसकी आवाज राजकुमार बलबीर सिंह के कानों में पड़ी, जोकि उस जंगल में भ्रमण कर रहा था। वह एक बहुत बड़ा ज्ञानी और धनुर्धर था। उसने पास जाकर देखा तो एक लड़की जिसे कुछ सिपाहियों ने जबरन पकड़ रखा था। उसने सभी सिपाहियों को अपने धनुष बाण से मारकर आजाद करवा दिया।
चेतना सिंह ने उस व्यक्ति के चेहरे पर तेज देख बहुत प्रभावित हुई। उसने उस व्यक्ति से उसका परिचय पूछा, “उसे अपना परिचय बताते हुए कहा, “मैं यहाँ से कई राज्य दूर केशवगढ़ राज्य के महाराज स्वामीनाथ का श्रेष्ठ पुत्र राजकुमार बलबीर सिंह हूँ।” मुझे मेरे पिता ने इस जंगल से चमत्कारी फल लाने के लिए भेजा था। इसलिए मैं कई महीनों से इस जंगल में घूम रहा था। चेतना सिंह और राजकुमार बलबीर सिंह काफी देर तक एक दूसरे से बात करते रहे।
राज्य का उत्तराधिकारी:
राजकुमारी चेतना सिंह ने राजकुमार बलबीर सिंह को अपना दिल दे बैठी। उसने उसी जंगल में राजकुमार से शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। राजकुमार बलबीर सिंह ने कहा, “मुझे आपका व्यवहार बहुत अच्छा लगा।” लेकिन इतना बड़ा फैसला लेने से पहले मैं आपके पिता से मिलना चाहता हूँ। राजकुमारी चेतना सिंह उसे अपने महल ले गई। उसने अपने पिता से जंगल की सारी बात बता दी।
राजा उदयभान सिंह राजकुमार बलबीर सिंह के पिता महाराज स्वामीनाथ को अच्छी तरह से जानते थे। लेकिन, राजा उदयभान सिंह ने कहा, राजकुमार बलबीर सिंह तुम्हें मेरी बेटी से विवाह करने के लिए अपने बल और साहस की परीक्षा देनी पड़ेगी। तभी मैं अपनी बेटी का विवाह तुम्हारे साथ करूंगा। तभी एक सिपाही आकर राजा उदयभान से कहता हैं, “महाराज, हमारे राज्य के ऊपर किसी दूसरे राज्य के राजा ने हमला कर दिया हैं।
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राजा उदयभान अपने सैनिकों को लेकर युद्ध के लिए चले गए। युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। राजा उदयभान सिंह परास्त होने वाला था। उसकी पूरी सेना मारी जा चुकी थी। उस राज्य का राजा उदयभान से कहता हैं। अगर अपनी जाना प्यारी हो तो अपने आपको नतमस्तक कर अपनी बेटी की शादी मेरे बेटे से कर दो। इस बात की खबर राजकुमार बलबीर सिंह को पता चली।
वह अपना धनुष बाण लेकर युद्ध के मैदान में आ गया। उसने अपनी वीरता और पराक्रम से उस राज्य की सेना को अकेले ही परास्त कर दिया। उसकी वीरता और साहस देख महाराज उदयभान बहुत खुश हुए। लेकिन उसने कहा, अभी तुम्हारी परीक्षा पूर्ण नहीं हुई हैं। तुम्हें कुछ दिन हमारे राज्य में प्रजा के बीच रहना होगा।

राजकुमार बलबीर सिंह कई महीनों तक उस राज्य की प्रजा के बीच में रहे। उसकी प्रजा राजा उदयभान सिंह से भी ज्यादा उसे चाहने लगी। एक दिन राजा उदयभान सिंह ने देखा की राजकुमार बलबीर सिंह एक गरीब परिवार के बीच बैठकर खाना खा रहे थे। उस दिन राजा उदयभान सिंह को पूर्ण विश्वास हो गया की राजकुमार बलबीर सिंह से अच्छा हमारी बेटी के लिए राजकुमार नहीं मिल सकता।
उसने केशवगढ़ राज्य के महाराज स्वामीनाथ को रिश्ता भेजवाया। केशवगढ़ राज्य के राजा को यह रिश्ता बहुत पसंद आया। इस तरह राजकुमार बलबीर सिंह और राजकुमारी चेतना सिंह की शादी हो गई। अब राजकुमार बलबीर सिंह उदयभान सिंह के महल में रहने लगा। वह उस राज्य की प्रजा को महाराज उदयभान सिंह से भी ज्यादा प्यार करता था। इस तरह से राजा उदयभान सिंह ने अपने बुद्धिमानी के बल पर अपने प्रिय राज्य के लिए एक शानदार उत्तराधिकारी और बेटी के लिए राजकुमार मिल गया।
